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गुरुवार, 6 नवंबर 2014

चर्चित पुस्तके

चर्चित पुस्तके
(1)'प्ले एट माय वे'
भारत रत्न सचिन तेंदुलकर की आत्म कथा जो हाल ही में चर्चा का विषय बनी है।
(2) ए गाइड टू प्राइवेट इक्विटीज
भारतीय चार्टर्ड एकाउटेंट नेहा भुवानिया द्वारा लिखित पुस्तक ‘ए गाइड टू प्राइवेट इक्विटीज’ नवंबर 2014 के प्रकाशित की गई।
(3)हाफ गर्लफ्रेंड
चेतन भगत द्वारा लिखित इस उपन्यास का 1 अक्टूबर 2014 को अनावरण किया गया।
(4)‘द नैरो रोड टू द डीप नॉर्थ'
ऑस्ट्रेलियाई लेखक रिचर्ड फ़्लैनागन को उनके उपन्यास ‘द नैरो रोड टू द डीप नॉर्थ' के लिए वर्ष 2014 का मैन बुकर पुरस्कार प्रदान किया गया।
(5) 'अनटोल्ड स्टोरी ऑफ इंडियन पब्लिक सेक्टर'
डॉ. यू.डी.चौबे द्वारा लिखित इस पुस्तक का विमोचन 14 अक्टूबर 2014 को किया गया।
(6)‘फाइनल टेस्ट : एक्जिट सचिन तेंदुलकर’
‘फाइनल टेस्ट : एक्जिट सचिन तेंदुलकर’ नामक पुस्तक लेखक एवं पत्रकार दिलीप डिसूजा द्वारा लिखी गई है।
(7) ‘ए मैन एंड ए मोटरसाइकिलहाउ हामिद करजई केम टू पावर'
बीट डैम द्वारा रचित पुस्तक ‘ए मैन एंड ए मोटरसाइकल, हाउ हामिद करजई केम टू पावर’ का लोकार्पण सितंबर 2014 में किया गया।
(8) ‘वर्थी फाइट्स: ए मेमॉयर ऑफ लीडरशिप इन वार एंड पीस’
लियोन पेनेटा एवं जिम न्यूटन की पुस्तक ‘वर्थी फाइट्स: ए मेमॉयर ऑफ लीडरशिप इन वार एंड पीस’ प्रकाशित की गई।
(9) ‘एंड देन वन डे: ए मेमौर’
बॉलीवुड अभिनेता नसीरुद्दीन शाह ने अपनी आत्मकथा ‘एंड देन वन डे: ए मेमौर’ को 12 सितम्बर 2014 को जारी किया।
(10)‘गॉड ऑफ अंटार्कटिका’
दिल्ली के 13 वर्षीय छात्र यशवर्धन शुक्ला द्वारा लिखित ‘गॉड ऑफ अंटार्कटिका’ उपन्यास प्रकाशित किया गया।
(11)‘नाट जस्ट ऐन एकाउंटेंट’
‘नाट जस्ट ऐन एकाउंटेंट’ नामक पुस्तक भारत के पूर्व नियंत्रक-महालेखा परीक्षक (कैग) विनोद राय द्वारा लिखी गई है।
(12)एसासिनेशन ऑफ राजीव गांधी, एन इनसाइड जॉब
'एसासिनेशन ऑफ राजीव गांधी, एन इनसाइड जॉब' नाम की किताब का लोकार्पण 19 अगस्त 2014 को किया गया।
(13)'स्ट्रिक्टली पर्सनल : मनमोहन एंड गुरशरण'
दमन सिंह कौर द्वारा लिखित ‘स्ट्रिक्टली पर्सनल : मनमोहन एंड गुरशरण’ नामक पुस्तक पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की जीवनी है।
(14)' मुंगेर थ्रू दि एजेज’
डीपी यादव द्वारा लिखित पुस्‍तक ‘मुंगेर थ्रू दि एजेज’ पुस्‍तक की पहली प्रति राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को 7 जुलाई 2014 को भेंट की गई।
(15)‘वन लाइफ इज नॉट इनफ: एन आटोबायोग्राफी’
यह पुस्तक पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह द्वारा लिखित उनकी एक आत्मकथा है।यह पुस्तक राजनीतिक हलकों में चर्चित रही।
(16) ‘द विजय माल्या स्टोरी’
के. गिरिप्रकाश द्वारा लिखित ‘द विजय माल्या स्टोरी’ पुस्तक को वर्ष 2014 में पेंगुइन बुक्स लिमिटेड द्वारा लोकार्पण किया गया।
(17) ऐ बेड करैक्टर
दीप्ति कपूर ने उपन्यास ऐ बेड करैक्टर की रचना की. इसका प्रकाशन अगस्त 2014 में किया जाएगा।
(18) ब्लड फ्यूड: ओबामा बनाम क्लिंटन
एडवर्ड क्लेन द्वारा लिखित पुस्तक ब्लड फ्यूड: ओबामा बनाम क्लिंटन जारी की गई।
(19) ‘वॉरियर स्टेट’
टी वी पॉल की किताब ‘वॉरियर स्टेट' 13 जून 2014 को उप–राष्ट्रपति हामिद अंसारी के समक्ष प्रस्तुत की गयी।
(20)‘गेटिंग इंडिया बैक ऑन ट्रैक’
'गेटिंग इंडिया बैक ऑन ट्रैक–एन एक्शन अजेंडा फॉर रिफॉर्म' नाम की किताब का विमोचन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नई दिल्ली में 8 जून 2014 को किया।
(21) ‘सब्स्टांस एंड शेडो’
फिल्म अभिनेता दिलीप कुमार की जीवनी ‘सब्स्टांस एंड शेडो’ का 10 जून 2014 को मुंबई में आयोजित एक समारोह में लोकार्पण हुआ।
(22) ‘ग्रीन पोयम्स’
कवि और गीतकार गुलजार द्वारा लिखित पुस्तक ‘ग्रीन पोयम्स’ का विमोचन पटना में 5 जून 2014 को किया गया।

क्या है ई-वेस्ट

आइये जानते है ई-वेस्ट या ई - कचरा के बारे में :---
क्या है ई-वेस्ट ?
इसके स्रोत क्या है ?
ई कचरा के नुकसान :- 
निराकरण के उपाय क्या है ? 
ई-वेस्ट का अर्थ है ऐसा कबाड़ जिसमें इलेक्ट्रानिक सर्किट बोर्ड मौजूद हो। सभी किस्म के ई-वेस्ट में सर्वाधिक विषैला कचरा माना गया है कंप्यूटर का
सस्ती तकनीक ने आज इलेक्ट्रानिक उत्पादों को सर्वसुलभ कर दिया है, लेकिन इसके साथ ही एक बहुत बड़ी समस्या सामने आई है और वह है ‘ई-वेस्ट की। ई-वेस्ट से तात्पर्य है कबाड़ घोषित किए गए इलेक्ट्रानिक उत्पाद। जैसे-जैसे नई-नई तकनीक सामने आती जाती हैं, पुरानी तकनीक के इलेक्ट्रानिक उत्पाद हटा दिए जाते हैं या इन्हें अपग्रेड कर दिया जाता है। दोनों ही परिस्थितियों में इलेक्ट्रानिक कबाड़ उत्पन्न होता है, जो सही ढंग से निस्तारण न किए जाने पर काफी विषैला सिद्ध होता है।
शाब्दिक रूप में देखा जाए तो ई-वेस्ट का अर्थ है ऐसा कबाड़ जिसमें इलेक्ट्रानिक सर्किट बोर्ड मौजूद हो। ई-वेस्ट टीवी, फ्रिज, मोबाइल फोन, कंप्यूटर, स्टीरियो से लेकर इलेक्ट्रानिक खिलौनों की विशाल श्रंखला तक फैला हुआ है। भारत में अभी ई-वेस्ट की मात्रा कुल उत्पादित कचरे का मात्र एक प्रतिशत है, लेकिन यह कोई खुश होने की वजह नहीं है। कारण यह है कि विकसित देश भारत और ऐसे ही अन्य एशियाई देशों में अपना ई-वेस्ट भेज देते हैं। इसका मतलब यह हुआ कि अपना देश एक बहुत ही जहरीले कबाड़ का अड्डï बनता जा रहा है और अगर समय रहते इससे निपटने के उपाय नहीं किए गए तो विकराल समस्या खड़ी हो जाएगी।
ई-वेस्ट के रूप में दो किस्मों का कबाड़ भारत में लाया जाता है। पहला वह, जो टूट-फूट के रूप में है और दूसरा वह, जो थोड़ी सी रिपेयरिंग के बाद दोबारा इस्तेमाल में लाया जा सकता है। पहली किस्म के कबाड़ से काम की चीजें अलग कर ली जाती हैं और शेष को भट्टियों में झोंक दिया जाता है। दूसरी किस्म का कबाड़ उन सस्ते कंप्यूटरों के रूप में आता है जिन्हें हम बहुत सस्ते दामों पर सेकेंड में बिकते हुए देख सकते हैं।यह भी तीन चार साल में कूड़ा हो जाते हैं, वजह पुरानी तकनीक हो या पुर्जों का लगातार खराब होते जाना। अंत में इनकी भी गति टूटफूट वाले ई-वेस्ट की तरह ही होती है।
आखिर ई-वेस्ट इतना अधिक खतरनाक क्यों माना जा रहा है? जवाब है कि इसके निस्तारण में विषैली गैसें और हजारों किस्म के नुकसानदेह रसायनों का निकास होता है। इन सभी किस्म के ई-वेस्ट में सर्वाधिक विषैला कचरा कंप्यूटर का माना गया है। जहां पर ई-वेस्ट को जलाया-गलाया नहीं जाता, वहां पर इसको जमीन में गाड़ दिया जाता है। यहां पर इस कचरे से धीरे-धीरे रिसने वाले प्रदूषक तत्व जमीन की उत्पादकता को कम करने के साथ ही भूगर्भ जल भी दूषित कर देते हैं। ई-वेस्ट के धुंए से डायाक्सिन जैसी जहरीली गैसें निकलती हैं और इससे सिलिकॉसिस, अस्थमा तथा कई बार हवा में लेड की अधिकता के कारण मौत तक हो जाती है।
अब जरा इस आंकड़े पर नजर डालो। एशिया में प्रतिवर्ष अमेरिका से 102 लाख से भी अधिक पुराने कंप्यूटर आयात किए जाते हैं। अगर इन्हें एक साथ रखकर ढेरी बनाई जाए तो यह एक वर्ग एकड़ जगह को घेर लेंगे और इस ढेरी की ऊंचाई होगी लगभग 674 फीट।
भारत की बात करें तो यहाँ आयात किए सस्ते कंप्यूटरों के अलावा हर साल लगभग पन्द्रह लाख अतिरिक्त कंप्यूटर कबाड़ हो जाते हैं। अब जरा इसी में हर छह महीने में बदले जाते मोबाइल फोन, फेंके जाते इलेक्ट्रानिक खिलौने तथा बैटरियां और ऐसे ही ढेर सारे इलेक्ट्रानिक उत्पादों को जोडऩा शुरू करो। थक गए न, पर्यावरण वैज्ञानिक भी इस बात का अंदाज लगाते-लगाते थक गए हैं कि आखिर इस जहर से मुक्ति कैसे मिलेगी।
ई-वेस्ट को अगर ठीक से निस्तारित किया जाए तो यह द्वितीयक उत्पाद निर्माण में काम आ सकता है, लेकिन यह एक लंबी और गैर लाभदायक प्रक्रिया होने के कारण कोई भी इसका सिरदर्द नहीं लेना चाहता। एक दूसरा सरल उपाय यह है कि इलेक्ट्रानिक उत्पादों को महज शौक के लिए बार-बार बदलने की बजाय उपयोग के लिए खरीदना चाहिए। इनमें छोटी-मोटी खराबी हो तो फेंकने की जगह सुधरवा लेना चाहिए। इसके साथ ही वैज्ञानिक ऐसे तत्वों के विकास में जुटे हुए हैं जिससे ई-वेस्ट को पूरी तरह और सुरक्षित ढंग से रिसाइकिल किया जा सके। तब तक तो सावधानी ही इससे होने वाले नुकसान का सबसे बड़ा बचाव साबित होगी। साभार :- जागरण ।

ध्यानाकर्षक संरक्षण विधेयक, 2011

भ्रष्टाचार से निपटने के लिए उठाया गया एक और कदम

ध्यानाकर्षक संरक्षण विधेयक, 2011 को राष्ट्रपति की मंजूरी-

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने ध्यानाकर्षक संरक्षण विधेयक, 2011 (व्हिसल ब्लोअर्स संरक्षण विधेयक 2011, Whistleblowers Protection Bill 2011) को 12 मई 2014 को मंजूरी प्रदान की. इस मंजूरी के साथ ही यह विधेयक ध्यानाकर्षक संरक्षण अधिनियम, 2011 (Whistleblowers Protection Act 2011) बन गया.

ध्यानाकर्षक संरक्षण विधेयक, 2011 को लोकसभा ने 11 दिसंबर 2011 को जबकि दो संशोधनों के साथ राज्य सभा ने 21 फरवरी 2014 को पारित किया था.

ध्यानाकर्षक संरक्षण अधिनियम, 2011 के मुख्य बिंदु -

• इस अधिनियम में मंत्रियों सहित सरकारी अधिकारियों द्वारा भ्रष्टाचार या अधिकारों के दुरूपयोग से संबंधित सूचना देने वाले व्यक्ति को संरक्षण देने के लिए नियमित व्यवस्था करने का प्रावधान है.
• अधिनियम में सरकार को हुए नुकसान की जानकारी देने वाले व्यक्ति को पर्याप्त संरक्षण देने का भी प्रावधान है.
• यह अधिनियम जनता को मंत्रियों और लोकसेवकों द्वारा अधिकारों का जानबूझकर दुरुपयोग करने के बारे में या भ्रष्टाचार के बारे में जानकारी का खुलासा करने के लिए उत्साहित करने की प्रणाली प्रदान करता है.
• कोई व्यक्ति किसी सक्षम प्राधिकार के समक्ष भ्रष्टाचार के मामले में जनहित में जानकारी सार्वजनिक कर सकता है.
• शिकायत करने हेतु केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) सक्षम प्राधिकरण है.
• भारत सरकार अधिसूचना जारी करके भ्रष्टाचार के बारे में इस तरह की शिकायतें प्राप्त करने के लिए भी किसी को नियुक्त कर सकती है.
• इस कानून में झूठी या फर्जी शिकायतों के मामले में दो वर्ष तक की कैद और 30000 रूपए तक के जुर्माने का प्रावधान है.

केंद्रीय सतर्कता आयोग को सशक्त करने के लिए यह विधेयक वर्ष 2004 में संघ सरकार द्वारा प्रस्तुत किया गया था.

भारत की उर्जा जरूरते और पूर्ण विद्युतीकरण का सपना

भारत की उर्जा जरूरते और पूर्ण विद्युतीकरण का सपना

पर्याप्त संसाधनों की कमी की वजह से भारत में क़तार के आख़िर लोगों तक बिजली पहुंचाना सिर्फ एक सपना बन कर ही रह गया है और इसकी भी संभावनाएं भी कम हैं कि अगले 15 सालों में भी यह संभव हो पाएगा.

योजना आयोग के आंकड़ों के अनुसार लगभग चालीस करोड़ लोग यानी आबादी के एक तिहाई लोग भारत में आज भी ऐसे हैं जिनके पास बिजली नहीं पहुंच पाई है. इनमे ज़्यादातर वो लोग हैं जो सुदूर ग्रामीण अंचलों में रहते हैं.

जिन 80 करोड़ लोगों तक बिजली पहुंच भी पा रही है, उन्हें ये पर्याप्त तौर पर नहीं मिल पाती है. ख़ास तौर पर उन लोगों को, जो शहरों में नहीं रहते हैं.

मनमोहन सिंह ने वर्ष 2004 में कहा था कि 2009 तक सरकार हर नागरिक तक बिजली पहुंचा पाएगी. वर्ष 2009 में उन्होंने कहा की 2011 तक ये संभव हो पाएगा.

2011 में उन्होंने कहा कि 2012 तक भारत का पूरी तरह विद्युतीकरण हो जाएगा. वर्ष 2012 में उन्होंने कहा कि शायद 2017 तक ऐसा संभव हो पाए. मगर अब जब 2014 के कई महीने भी बीत चुके हैं तो ऐसा लगता है कि अगले पंद्रह सालों भी इसके आसार दूर दूर तक नहीं हैं.

बिजली का हिसाब किताब

पिछले 25 सालों पर अगर नज़र डाली जाए तो पूर्ण विद्युतीकरण की दिशा में हुए प्रयास लक्ष्य के 50 प्रतिशत टार्गेट तक भी नहीं पहुंच पाए हैं.

भारत में ऊर्जा की कुल स्थापित क्षमता (इन्सटाल्ड कैपेसिटी) 234602 मेगावाट की है जबकि ज़रूरत के हिसाब से वर्ष 2030 तक 8 लाख मेगावाट तक की स्थापित क्षमता की ज़रूरत होगी.

मौजूदा क्षमता में कोयले पर आधारित 160,484 मेगावाट है जबकि पन-बिजली पर 39,875 मेगावाट, सौर ऊर्जा की 29,463 और परमाणु पर सिर्फ 4780 मेगावाट है.

ऊर्जा मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि भारत में ऊर्जा की कुल स्थापित क्षमता (इन्सटाल्ड कैपेसिटी) का 54 प्रतिशत कोयले पर आधारित है जबकि 24 प्रतिशत पन-बिजली पर, 12 प्रतिशत सौर ऊर्जा पर, 8 प्रतिशत गैस पर और मात्र 2 प्रतिशत परमाणु ऊर्जा पर.

आंकड़े बताते हैं कि आज भी परमाणु ऊर्जा को वैकल्पिक ऊर्जा के रूप में नहीं देखा जा सकता है क्योंकि यूरेनियम की आपूर्ति के लिए रूस, मंगोलिया, कज़ाकिस्तान, उज़्बेकिस्तान और ऑस्ट्रेलिया पर निर्भर होना पड़ेगा.

वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने संसद में वर्ष 2014-15 का अंतरिम बजट पेश करते हुआ कहा था कि भारत की विद्युत उत्पादन की स्थापित क्षमता दस सालों में दोगुनी हो गई है.

उनका कहना था कि दस साल पहले ये क्षमता सिर्फ 112,700 मेगावाट ही थी. चिदंबरम का दावा है कि सिर्फ़ पिछले वित्तिय वर्ष में ही 29,000 मेगावाट की क्षमता जोड़ी गई.

कोयले के अलावा चारा नहीं

केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण के सदस्य रहे अलोक गुप्ता का कहना है कि आने वाले कई सालों तक विद्युत उत्पादन के लिए कोयले और गैस पर ही निर्भर रहना पड़ेगा. बीबीसी से उन्होंने कहा, "अभी तो इन दो संसाधनों पर ही पूरी निर्भरता रहेगी. सौर ऊर्जा पर लम्बे समय तक निर्भर नहीं रहा जा सकता है. ये पूरी तरह से मौसम के भरोसे ही चलती है."

मगर गुप्ता का कहना है कि कोयला और गैस के संसाधन भी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं हैं इसलिए ऊर्जा का संकट बना ही रहेगा.

कोयले की अगर बात की जाए तो भारत के पास कोयले के भण्डार हैं तो ज़रूर, मगर यह सब उन इलाक़ों में ज़्यादा हैं जहां जंगल हैं. इसलिए ये फैसला करना कठिन होगा की हमें कोयला चाहिए या पर्यावरण.

दूसरी तरफ कोयले के जो भंडार भारत में मौजूद हैं वो उतनी अच्छी गुणवत्ता वाले नहीं हैं और निर्भरता आखिरकार दूसरे देशों पर बनी हुई है. चूंकि आयात किए हुए कोयले का मूल्य अधिक पड़ता है इसलिए आने वाले दिनों में भी बिजली की कीमतों में बढ़ोतरी होती रहेगी.

ऊर्जा क्षेत्र पर नज़र रखने वाले केशव चतुर्वेदी का कहना है कि सौर ऊर्जा से औद्योगिक ज़रूरतें पूरी नहीं हो सकती हैं, इसलिए उस पर पूरी तरह निर्भर भी नहीं रहा जा सकता है.

वो कहते हैं, "हमारे पास यूरेनियम के उतने भंडार नहीं हैं, और ना ही उतना कोयला ही है. पन-बिजली के लिए बड़े बड़े बांध बनाने पड़ेंगे जो किफ़ायती भी नहीं हैं और उनके बनने से पर्यावरण पर भी प्रतिकूल असर पड़ेगा."

बिजली के उत्पादन के लिए जो मुख्य स्रोत बचता है वो है कोयला और कोयले का निर्यात करने के अलावा भारत के पास कोई दूसरा चारा नहीं है.

सौर ऊर्जा से करें रोशन

जानकारों का कहना है कि इस परिस्थिति से निपटने का उपाय है कि सौर ऊर्जा का ज़्यादा से ज़्यादा इस्तेमाल ग्रामीण इलाक़ों में विद्युतीकरण के लिए किया जाना चाहिए जिससे काफी राहत मिल सकती है और कोयले से उत्पादित बिजली औद्योगिक ईकाइयों के लिए मुहैया करायी जा सकती है. सौर ऊर्जा का इस्तेमाल उन इलाक़ों तक बिजली पहुंचाने में किया जा सकता है.

अलोक गुप्ता का कहना है कि राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना के तहत ग्रामीण इलाक़ों में बिजली के तार तो पहुँच चुके हैं. लेकिन एक बड़े इलाक़े में आपूर्ति शुरू नहीं हो पाई है
बीबीसी हिन्दी सेवा से साभार
क्या भारत में क्षेत्रीय दलों की राजनीति ढलान पर है

लेखक और पत्रकार साइमन डेनयर लिखते हैं, "भारत के आम चुनाव में नरेंद्र मोदी की जीत ने साबित कर दिया है कि भारत का जनतंत्र अच्छे प्रशासन के लिए जनादेश दे सकता है."

दुनिया भर में भारतीय लोकतंत्र लगातार ग़लत वजहों से सुर्ख़ियों में रहा है, जिनमें से कुछ समझे जाने लायक वजहें हैं.

इस बहस के केंद्र में राजनेताओं को भ्रष्टाचार और संरक्षण देने के मामले, नीति की जगह लोकप्रियता, संसद का अक्सर स्थगित होना और मर्यादाहीन विरोध प्रदर्शन रहे हैं.

पिछले एक दशक में कांग्रेस की दमघोटू वंशवादी राजनीति जो ऐसा लगता है विश्वास और स्थिरता खो चुका था, के ख़िलाफ़ एक हिंदू राष्ट्रवादी विपक्ष खड़ा हुआ है.

गठबंधन का दौर

दोनों ब्रांडों के बीच एक ठोस राष्ट्रीय राजनीति की पटकथा लिखने के संघर्ष के बीच क्षेत्रीय और जाति आधारित पार्टियों ने खाई को भरा था.

मगर यह राजनीति अब ढलान पर है और ऐसा लगता है गठबंधन सरकार के तहत कमज़ोर और दिशाहीन शासन का दौर ख़त्म हो गया है.

मतदाताओं ने केवल अपने संकीर्ण हितों को देखा है, जिसके बारे में आमतौर पर कहा जाता है लोग सिर्फ़ अपनी जाति को मत देने के लिए मत देते हैं.

उद्यमी वर्ग सिर्फ़ यह चाहता था कि सरकार उनको अकेला छोड़ दे और वे शायद ही मत देते थे.

चीन में कई लोग भारतीय जनतंत्र को निर्णायक और सत्तावादी शासन के तौर पर देख रहे हैं.

हालांकि 2014 के आम चुनाव ने, भारत का लोकतंत्र निर्णायक रूप से गिरावट की ओर है, का मिथक तोड़ दिया है.

लोकतंत्र में गिरावट

स्थापित पश्चिमी लोकतांत्रिक देशों में दशकों से मतदान एक दीर्घकालिक गिरावट की ओर रहा है, वहीं भारत में मतदान में महिलाओं की अधिकाधिक भागीदारी से, और पहली बार मतदान करने वाले मतदाताओं की बदौलत 66.5 फ़ीसदी का रिकॉर्ड मतदान हुआ.

देश में तेज़ी से बढ़ते मध्यम वर्ग के बीच भी इसे लेकर उत्साह पाया गया. बदलाव की ज़मीन सालों से तैयार हो रही थी.

चौबीस घंटे चलने वाले समाचार चैनलों ने राजनीति को सनसनी में तब्दील कर दिया है, लेकिन इसने भ्रष्टाचार के मामलों को बेनकाब करने में मदद की है.

सूचना के अधिकार ने ग़रीब भारत की जनता को नौकरशाही के ख़िलाफ़ सवाल पूछने का अधिकार देकर सशक्त बनाया है.

बूढ़े और जवानों ने एकजुट होकर हज़ारों की संख्या में सड़कों पर निकलकर भ्रष्टाचार और महिलाओं की सुरक्षा को लेकर विरोध प्रदर्शन किया.

भारतीय जनता पार्टी के नरेंद्र मोदी ने इस विरोधी लहर बखूबी लाभ उठाया. उन्होंने उन सीटों पर अपना ध्यान केंद्रित किया, जहां उनको जीतने की उम्मीद थी और लोकसभा में बड़ी चतुराई से 31 फ़ीसदी मत लेने में कामयाब रहे.

राष्ट्रीय पृष्ठभूमि में राजनीति

लेकिन सबसे अहम रहा कि यह चुनाव स्थानीय मुद्दों और जाति आधारित नहीं रहा. यह राष्ट्रीय पृष्ठभूमि में लड़ा गया चुनाव था, जिसमें भ्रष्ट और अकुशल सरकार को ख़ारिज कर दिया गया है.

जनादेश में एक ऐसे व्यक्ति में विश्वास जताया गया, जो साफ़, निर्णायक नेतृत्व, अच्छा प्रशासन और विकास का दावा करता है.

मोदी सब्सिडी की राजनीति से अलग हैं और इसके बजाए सभी वर्गों के भारतीयों अमीर और ग़रीब, शहरी और ग्रामीण को शिक्षा, नौकरियों और इससे अधिक मौलिक मसलों एक बेहतर जीवन, बिजली और साफ़ पानी जैसी उनकी आकांक्षाएं साकार करने का मौक़ा देने का वादा करते हैं.

अपने अभियान में मोदी ने एक शक्तिशाली ब्रांड बनाया है और एक महत्वाकांक्षी वादा किया है.

उम्मीदों पर खरा उतरना मोदी के लिए इतना आसान नहीं होगा, लेकिन उनको मिला जनादेश स्पष्ट है.

भारतीय मतदाताओं ने अपने नेताओं को एक स्पष्ट संदेश दिया है कि वे भ्रष्टाचार के बजाय शासन और दान के बजाय अवसर चाहते हैं.

भारत के लोकतंत्र ने अपना काम किया

क्या है धारा 370 और उससे जुड़ा विवाद

क्या है धारा 370 और उससे जुड़ा विवाद

धारा 370 और उपजा विवाद:

धारा 370 पर विवाद फिर से गहरा गया है इसी आलोक में राजस्थान पत्रिका में छपा लेख प्रस्तुत कर रहा हूँ ।

हाल ही में क्यों चर्चित हुवा--

भारतीय संविधान की धारा-370 इस बार के लोकसभा चुनाव में एक चर्चा का विषय रही। संविधान की इस धारा के तहत जम्मू-कश्मीर को एक विशेष राज्य का दर्जा दिया गया है। अब भाजपा सरकार बनने के बाद केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने इस मुद्दे को फिर उठाया है। सिंह ने कहा कि सरकार में जम्मू-कश्मीर के धारा-370 पर चर्चा करने के लिए आम सहमति बन गई है। सिंह के इस बयान पर जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री ने धमकी दी है कि या तो 370 रहेगा या जम्मू-कश्मीर भारत का हिस्सा नहीं रहेगा।

*संविधान की धारा 370 क्या है--

आजादी के वक्त जम्मू-कश्मीर भारत का हिस्सा नहीं था। ऎसे में राज्य के पास दो विकल्प थे या तो वह भारत में शामिल हो जाए या फिर पाकिस्तान में शामिल हो जाए। वहां की जनता अधिकत्तर मुस्लिम थी जो कि पाक में शामिल होना चाहती थी लेकिन वहां के राजा हरि सिंह हिंदू होने के नाते उनका झुकाव भारत की तरफ था। जिसके बाद राजा सिंह ने भारत में राज्य का विलय करने की सोची और विलय करते वक्त उन्होंने "इंस्टूमेंट ऑफ एक्ंसेशन" नाम के दस्तावेज पर साइन किए थे। जिसका खाका शेख अब्दुल्ला ने तैयार किया था। जिसके बाद भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्ज दे दिया गया। शेख अब्दुल्ला को हरि सिंह और तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने जम्मू-कश्मीर का प्रधानमंत्री बना दिया था। 1965 तक जम्मू और कश्मीर में राज्यपाल की जगह सदर-ए-रियासत और मुख्यमंत्री की जगह प्रधानमंत्री हुआ करता था। अनुच्छेद 370 की वजह से ही जम्मू-कश्मीर का अपना अलग झंडा और प्रतीक चिह्वन भी है।

*केंद्र के कानून लागू नही--ं

धारा 370 के तहत भारत के सभी राज्यों में लागू होने वाले कानून इस राज्य में लागू नहीं होते हैं। भारत सरकार केवल रक्षा, विदेश नीति, फाइनैंस और संचार जैसे मामलों में ही दखल दे सकती है। इसके अलावा संघ सूची और समवर्ती सूची के तहत आने वालों विषयों पर केंद्र सरकार कानून नहीं बना सकती। राज्य की नागरिकता, प्रॉपर्टी का ओनरशिप और अन्य सभी मौलिक अधिकार राज्य के अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत आते हैं। इन मामलों में किसी तरह का कानून बनाने से पहले भारतीय संसद को राज्य की अनुमति लेनी जरूरी है। अलग प्रॉपर्टी ओनरशिप होने की वजह से किसी दूसरे राज्य का भारतीय नागरिक जम्मू-कश्मीर में जमीन या अन्य प्रॉपर्टी नहीं खरीद सकता है। इसके साथ ही वहां के नागरिकों के पास दोहरी नागरिकता होती है। एक नागरिकता जम्मू-कश्मीर की तथा दूसरी भारत की होती है। यहां दूसरे राज्य के नागरिक सरकारी नौकरी हासिल नहीं कर सकते।

यहां का संविधान भारत के संविधान से अलग है। आजादी के वक्त जम्मू-कश्मीर की अलग संविधान सभा ने वहां का संविधान बनाया था। अनुच्छेद 370(ए) में प्रदत्त अधिकारों के अंतर्गत जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा के अनुमोदन के बाद 17 नवम्बर 1952 को भारत के राष्ट्रपति ने अनुच्छेद-370 के राज्य में लागू होने का आदेश दिया।

*नहीं लग सकता आपातकाल---

अनुच्छेद 370 के वजह से ही केंद्र राज्य पर धारा 360 के तहत आर्थिक आपातकाल जैसा कोई भी कानून राज्य पर नहीं थोप जा सकता। जिसमें राष्ट्रपति राज्य सरकार को बर्खास्त नहीं कर सकता। केंद्र राज्य पर युद्ध और बाहरी आक्रमण के मामले में ही आपातकाल लगा सकता है। केंद्र सरकार राज्य के अंदर की गड़बडियों के कारण इमरजेंसी नहीं लगा सकता है, उसे ऎसा करने से पहले राज्य सरकार से मंजूरी लेनी होती है।

*कई बदलाव हुए---

हालांकि अनुच्छेद 370 में समय के साथ-साथ कई बदलाव भी किए गए हैं। 1965 तक वहां राज्यपाल और मुख्यमंत्री नहीं होता था। उनकी जगह सदर-ए-रियासत और प्रधानमंत्री हुआ करता था। जिसे बाद में बदला गया। इसके अलावा पहले जम्मू-कश्मीर में भारतीय नागरिक जाता तो उसे अपना साथ पहचान-पत्र रखना जरूरी थी। जिसका बाद में काफी विरोध हुआ। विरोध होने के बाद इस प्रावधान को हटा दिया गया

भारतीय अर्थव्यवस्था : प्रमुख चुनोतियाँ एवं सुझाव

भारतीय अर्थव्यवस्था : प्रमुख चुनोतियाँ एवं सुझाव

IAS/PSC में भारतीय अर्थव्यवस्था /विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था से सम्बंधित प्रशन का उत्तर देने हेतु कुछ कॉमन चुनोतियाँ एवं सुझाव जिनका उल्लेख प्रशन की मांग के अनुसार या यथा परिस्थिति के अनुसार किया जा सकता है।

विश्व आर्थिक मंच (world economic forum)की जनवरी माह में जारी रिपोर्ट जिसमे कुछ प्रमुख चुनोतियाँ का उल्लेख किया गया है --

(1) राजकोषीय संकट।
(2)उच्च सरंचानात्मक बरोजगारी संकट।
(3)जल संकट।
(4)गंभीर आय असमानता।
(5)जलवायु परिवर्तन नुय्निकरण ऒर अनुकूलन तन्त्र की विफलता।
(6) मोसमी आपदा।
(7)वॆश्विक शासन की विफलता तथा राजनितिक अस्थिरता।
(8)खाधान्न संकट।
(9)राजनितिक एवं सामाजिक असमानता।
(10)कढोर नोकरशाही, लाल फीता शाही, भ्रस्टाचार आदि।
(11) शीर्ष स्तर पर नीतिगत विकलांगता।
(12) तकीनीकी उन्नयन की कमी।
(13) वित्त की कमी।
(14)अौद्योगिक संस्कृति की कमी।

सुधार हेतु फिक्की द्वारा सुझाये गए सुझाव----

(1)प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को उदार बनाना।
(2)कर सम्बन्धी मुद्दों को तवरित रूप से समाधान एवं करों का सरलीकरण।
(3)सार्वजनिक क्षेत्र में निवेश में तेजी लाना।
(4)आधारभूत सरंचना में विकास।
प्रमुख अटकी हुवी परियोजनायों के सबंध में तेजी से निपटारा करना।
(5)लंबित विधेयकों को जल्द से जल्द संसदीय स्वीकृति प्रदान करना।
(6) गुड गवर्नेंस के मूल्यों यथा पारदर्शिता, उत्तरदायित्व, भागीदारी, जबाबदेहिता आदि का अपनाना। पेपर लेस कार्य संस्कृति को अपनाना अर्थात ई गवर्नेंस ऒर उससे आगे बढकर m governance को अपनाना।
(7)सरकारी हस्तक्षेप को कम करना।
(8) देश में उद्द्यमशीलता को विकसित करना।
(9) single window clearance, e-procurment आदि का अपनाना।
(10)वित्तीय समावेशन द्वारा वित्त की पहुँच निम्न स्तर तक सुनिश्चित करना।
(11) प्रयाप्त वित्तीय मदद द्वारा जोखिम लेने की क्षमता में संवधर्न करना।
(12)अंत में एक बहेतर सुझाव कि "अर्थव्यवस्था को सदॆव अर्थनीति से निर्देशित किया जाना चाहिए न कि राजनीति से।

अल- नीनो :संभावित खतरे एवं तैयारियाँ

अल- नीनो :संभावित खतरे एवं तैयारियाँ

IAS/PSC की प्रारम्भिक तथा मुख्य परीक्षा के लिए एनवायरनमेंट से सम्बंधित महत्वपूर्ण टॉपिक

भारत एक कृषि प्रधान देश है। हमारी अर्थव्यवस्था कृषि पर आधारित है तथा कृषि मानसून पर निर्भर है। हाल ही में अल-नीनो के सक्रीय होने की घोषणा विभीन्न मोसम विज्ञानियों द्वारा की जा रही है ,इसी अलोक में अल-नीनो को भारतीय भूगोल, पर्यावरण, इकॉनमी जैसे टॉपिक से सम्बन्ध कर प्रशन पूछे जाने की अत्यधिक सम्भवनायें बन रही हैं।

क्या है अल-नीनो -------

*स्पेनी भाषा के इस अतिमहत्वपूर्ण भौगोलिक शब्द का अर्थ क्रमशः ‘छोटा लड़का’ तथा ‘छोटी लड़की’ है। अल–नीनो शब्द का अर्थ ‘शिशु क्राइस्ट’ भी है जो इस शब्द के उत्पत्ति से संबंध रखता है।

*आरंभ में, दक्षिणी अमेरिका के पश्चिम तटीय देश पेरू एवं इक्वेडोर के समुद्री मछुआरों द्वारा, प्रतिवर्ष क्रिसमस के आसपास प्रशांत महासागरीय धारा के तापमान में होनेवाली वृद्धि को अल नीनो कहा जाता था। किंतु आज इस शब्द का इस्तेमाल उष्णकटिवंधीय क्षेत्र में केन्द्रीय और पूर्वी प्रशांत महासागरीय जल के औसत सतही तापमान में कुछ अंतराल पर असामान्य रूप से होने वाली वृद्धि और इसके परिणामस्वरूप होनेवाले विश्वव्यापी प्रभाव के लिए किया जाता है।

*1960 ईस्वी के आसपास अलनीनो के प्रभाव को व्यापक रूप से आँका गया और पता चला कि यह ‘बाल शिशु’ सिर्फ पेरू के तटीय हिस्सों में नहीं घूमता बल्कि हिंद महासागर की मौनसूनी हवाएँ भी इसके इशारे पर नाचती है।

*पेरू के इस लाडले ने अपना प्रभाव संपूर्ण उष्णकटिबंधीय प्रशांत क्षेत्र की बाढ लाने वाली भारी वर्षा से लेकर आस्ट्रेलिया में पड़नेवाले सूखे तक बना रखा है।

*अल–नीनो की छोटी बहन ला–नीना ह्यळा स्वभाव में ठीक इसके विपरित है क्योंकि इसके आने पर विषुवतीय प्रशांत महासागर के पूर्वी तथा मध्य भाग में समुद्री सतह के औसत तापमान में असामान्य रूप से ठंडी स्थिति पायी जाती है।

*कई मौसम विज्ञानी इसे ‘अल वेइजो’ अथवा ‘कोल्ड इवेंट’ कहना पसंद करते हैं। विषुवतीय प्रशांत क्षेत्र में 2 से लेकर 7 वर्ष के अंतराल पर असामान्य रूप से आने वाली अल–नीनो की स्थिति के चलते समुद्र सतह का औसत तापमान 5 डिग्री तक बढ जाता है और व्यापारिक पवनों में वृहत पैमाने पर कमी आती है।

*अल नीनो की घटना हमेशा से आती रही है किंतु वैज्ञानिक तौर पर इसकी व्याख्या 1960 के आसपास की गई।* लगभग 100 वर्ष पूर्व से उपलब्ध आँकड़े यह बताते हैं कि शहरीकरण और औ.द्योगिकरण के पूर्व से ही अल–नीनो आते रहे हैं इसलिए प्रदूषण या ग्लोबल वार्मिंग को लेकर इसके बारे में चिंतित होने की जरूरत नहीं।

* 1891 इस्वी में पेरू की राजधानी लीमा में वहाँ की भौगोलिक सोसाईटी के अध्यक्ष डा• लुईस कैरेंजा ने पीटा और पैकासाम्यो बंदरगाह के बीच पेरू जलधारा के विपरित उत्तर से दक्षिण की ओर बहनेवाली प्रतिजलधारा की ओर सर्वप्रथम ध्यान आकृष्ट किया।

*पीटा बंदरगाह के समुद्री मछुआरों ने ही सबसे पहले इसे अल–नीनो नाम दिया।

हाल ही में चर्चित क्यों---

*विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) ने अल-नीनो के बारे में ताजा अनुमान जारी किया है जो भारत के लिए संकट पैदा करने वाला है।
डब्ल्यूएमओ के अनुसार अल-नीनो के कारण जून से अगस्त तक भारत, मलयेशिया, थाइलैंड, पूर्वी आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और जापान में भयानक सूखा पड़ सकता है तो दक्षिण अमेरिका के पूर्वी और पश्चिमी तटीय देश और उत्तरी अमेरिका के पश्चिमी तट और प्रशांत महासागर के मध्य भाग में जमकर बारिश होगी।

भारत पर संभवित प्रभाव------------

* डब्ल्यूएमओ ने अल-नीनो के बारे में जो बुलेटिन जारी किया है, उसमें कहा गया है कि इसका असर कितना और कहा होगा, इसका ठीक से अनुमान नहीं लगाया जा सकता है, लेकिन इसकी प्रगति को देखते हुए इसका भारतीय मानसून पर विपरीत असर पड़ेगा ।

*देश में मानसून की बारिश एक जून से 30 सितम्बर तक होती है. भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) डब्ल्यूएमओ के अनुमान पर कुछ बोलने को तैयार नहीं है.
आईएमडी का पुणो स्थित केंद्र अल-नीनो का सघन अध्ययन कर रहा है. यह अल-नीनो कमजोर रहेगा, मध्यम होगा या मजबूत होगा, इसका भी पता नहीं है. अप्रैल के अंत तक मौसम विभाग आगामी मानसून और अल-नीनो प्रभाव का अनुमान पेश करेगा ।

पूर्व में अल-नीनो-----------

*गौरतलब है कि वर्ष 1952 से अब तक 24 बार अल-नीनो प्रभाव आया है जिसमें से आठ बार कमजोर, नौ बार मध्यम और पांच बार मजबूत था. वर्ष 2002 और 2009 में मध्यम श्रेणी का अल-नीनो था. उस वक्त देश में सूखा पड़ा था।

*वर्ष 2002 में करीब 29 प्रतिशत कम बारिश हुई थी जबकि वर्ष 2009 में शुरुआती मानसून में सूखा पड़ा और बाद में ठीक बारिश हुई थी। पहले समय से वष्रा न होने के कारण किसान धान की खेती नहीं कर पाये थे।

अल -नीनो एवं अर्थव्यवस्था-------------

*वर्ष 1997 में मजबूत अल-नीनो था तब भी भारत में सूखे की स्थिति 7 में मजबूत अल-नीनो था तब भी भारत में सूखे की स्थिति थी।
*संभावित अल नीनो से मानसूनी बारिश में करीब पांच प्रतिशत की कमी हो सकती है और वित्त वर्ष 2014-15 में इससे आर्थिक वृद्धि दर 1.75 प्रतिशत तक प्रभावित हो सकती है।
*जिसका लाखों अकुशल लोगों के रोजगार पर असर होगा। यह बात ऐसोचैम की एक रपट में कही गई है। रपट में कहा गया कि बारिश की कमी से खाद्य मुद्रास्फीति भी प्रभावित हो सकती है जो नीति निर्माताओं के लिए चिंता का विषय रही है। रपट के मुताबिक ‘‘अल-नीनो के कारण बारिश पांच प्रतिशत तक कम हो सकती है जिससे सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर 1.75 प्रतिशत प्रभावित हो सकती है और इस तरह घरेलू उत्पाद का 1,80,000 करोड़ रुपए का नुकसान हो सकता है और कृषि आदि क्षेत्रों जिससे लाखों अकुशल लोगों का रोजगार प्रभावित होगा।
* देश का करीब 60 प्रतिशत कृषि क्षेत्र वर्षा पर निर्भर हैऔर बारिश यदि एक प्रतिशत कम होती है तो वृद्धि 0.35 प्रतिशत कम होगी।

सरकार की संभवित तॆयारी-----------

*सरकार मुख्यत: ,निम्न एरिया पर फोकस कर रही है-
(1) खरीब की कम समय में पकने वाले बीजों की वॆरायीटी उपलब्ध करवाना।
(2)नमी लम्बे समय तक उपलब्ध करवाए जा सकने वाले बीज उपलब्ध करवाना।
(3)फसल एवं मिट्टी की जरूरत के हिसाब से उचित फ़र्टिलाइज़र उपलब्ध करवाना।
(4)विभीन्न संगोष्ठीयों द्वारा किसानों को जागरूक बनाना।
(5) रास्ट्रीय, राज्य एवं जिला आपदा प्रबंधन को सचेत करना तथा इनके मध्य बहतर तालमेल सुनिश्चित करना।
(6)विभीन्न गॆर सरकारी संगठनों की मदद लेना।
(7)इंटरनेशनल स्तर पर अन्य देशों से सुचनाए साझा करना तथा समन्वित प्रयास करना।
(8)किसानों के संभावित नुकसान के आकलन का प्रयास करना

भारत में जैव विविधता संरक्षण के प्रयास

भारत में जैव विविधता संरक्षण के प्रयास
जैवविविधता का संरक्षण और उसका निरंतर उपयोग करना भारत के लोकाचार का एक अंतरंग हिस्सा है। अभूतपूर्व भौगोलिक और सांस्कृतिक विशेषताओं ने मिलकर जीव जंतुओं की इस अद्भुत विविधता में योगदान दिया है जिससे हर स्तर पर अपार जैविक विविधता देखने को मिलती है। भारत में दुनिया का केवल 2.4 प्रतिशत भू-भाग है जिसके 7 से 8 प्रतिशत भू-भाग पर विश्व की विभिन्न प्रजातियां पाई जाती हैं। प्रजातियों की संवृधि के मामले में भारत स्तनधारियों में 7वें, पक्षियों में 9वें और सरीसृप में 5वें स्थान पर है। विश्व के 11 प्रतिशत के मुकाबले भारत में 44 प्रतिशत भू-भाग पर फसलें बोई जाती हैं। भारत के 23.39 प्रतिशत भू-भाग पर पेड़ और जंगल फैले हुए हैं। दुनियाभर की 34 चिह्नित जगहों में से भारत में जैवविविधता के तीन हॉटस्पॉट हैं- जैसे हिमालय, भारत बर्मा, श्रीलंका और पश्चिमी घाट। यह वनस्पति और जीव जंतुओं के मामले में बहुत समृद्ध है और जैव विविधता को पालने का कार्य करता है। पर्यावरण के अहम मुद्दों में से आज जैवविविधता का संरक्षण एक अहम मुद्दा है विश्व की जैवविविधता को कई कारणों से चुनौती मिलती है। राष्ट्रों, सरकारी एजेंसियों और संगठनों तथा व्यक्तिगत स्तर पर जैविक विविधता के संवंर्धन और उसके संरक्षण की बड़ी चुनौती है साथ-साथ हमें प्राकृतिक संसाधनों से लोगों की जरूरतों को भी पूरा करना होता है। चहूं ओर से जैव विविधता को बचाने का अभियान चलाया गया है। 22 मई दुनियाभर में अंतर्राष्ट्रीय जैव विविधता दिवस के रूप में मनाया जाता है।

जैव विविधता अधिनियम, 2002

जैवविविधता अधिनियम, 2002 भारत में जैवविविधता के संरक्षण के लिए संसद द्वारा पारित एक संघीय कानून है। जो परंपरागत जैविक संसाधनों और ज्ञान के उपयोग से होने वाले लाभों के समान वितरण के लिए एक तंत्र प्रदान करता है। राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (एनबीए) की स्थापना 2003 में जैव विविधता अधिनियम, 2002 को लागू करने के लिए की गई थी। एनबीए एक सांविधिक, स्वायत संस्था है। यह संस्था जैविक संसाधनों के साथ-साथ उनके सतत उपयोग से होने वाले लाभ की निष्पक्षता और समान बटवारे जैसे मुद्दों पर भारत सरकार के लिए सलाहकार और विनियामक की भूमिका निभाती है।

जैव विविधता के स्तर

समुद्री जैव विविधता समुद्र और महासागरों में पलने वाले जीवन को दर्शाता है। समुद्री पर्यावरण में 33 वर्णित जंतु संघों में से 32 जंतु संघ पाये जाते हैं। इसलिए इसका स्तर बहुत ऊँचा है। वन जैव विविधता में वन क्षेत्रों में पाये जाने वाले सभी जीव जंतु हैं जो कि पर्यावरण में पारस्थितिक भूमिका निभाते हैं। अनुवांशिक विविधता में एक प्रजाति की अनुवांशिक बनावट और उसकी विशेषताएं शामिल होती हैं। प्रजाति विविधता विभिन्न प्रजातियों की प्रभावी संख्या है जो उनके डॉटा बेस में परिलक्षित होती है प्रजाति विविधता में दो तत्व होते हैं एक प्रजाति समृद्धि और दुसरी प्रजातियों की इवननैस। पारिस्थितिक तंत्र विविधता रहने वाले स्थानों के कई अलग-अलग प्रकारों के बारे में इंगित करती हैं जबकि कृषि जैव विविधता में मिट्टी, जीव, मातम, कीट, परभक्षी और देशी पौधों तथा पशुओं के सभी प्रकार और कृषि से संबंधित सभी प्रासांगिक जीवन के रूप शामिल हैं।

बायोस्फीयर और जैव विविधता भंडार

भारत सरकार ने देश भर में 18 बायोस्फीयर भंडार स्थापित किये हैं जो जीव जंतुओं के प्राकृतिक भू-भाग की रक्षा करते हैं और अकसर आर्थिक उपयोगों के लिए स्थापित बफर जोनों के साथ एक या ज्यादा राष्ट्रीय उद्यान और अभ्यारण्य को संरक्षित रखने का काम करते हैं।

हॉटस्पॉट (आकर्षण के केन्द्र)

एक जैव विविधता वाला हॉटस्पॉट ऐसा जैविक भौगोलिक क्षेत्र है जिसे मनुष्यों से खतरा रहता है। विश्व भर में ऐसे 25 आकर्षण के केन्द्र हैं इन केन्द्रों में विश्व के 60 प्रतिशत पौधों, पक्षियों, स्तनपाई प्राणियों, सरीसृपों और उभयचर प्रजातियों का संरक्षण किया जाता है। प्रत्येक आकर्षण का केन्द्र आज खतरे के दौर से गुजर रहा है। और अपने 70 प्रतिशत मूल प्राकृतिक वनस्पति को खो चुका है।

जैवविविधता के संरक्षण के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रयास

वन्य जीव जन्तु और फ्लोरा की विलुप्त प्राय प्रजातियों के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार सम्मेलन-सीआईटीईएस पर 3 मार्च, 1973 को वाशिंगटन डीसी में हस्ताक्षर किये गये थे। वर्ष 2000 के अगस्त में इस सम्मेलन के 152 देश सदस्य थे। सीआईटीईएस का उद्देश्य वन्य जीव के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर प्रतिबंध लगाना है। विश्व संरक्षण संघ-आईयूसीएन विश्व स्तर पर देशों, सरकारी एजेंसियों और विभिन्न प्रकार की गैर सरकारी संस्थाओं को एक मंच पर लाने की कोशिश करता है। खाद्य और कृषि के लिए पादत आनुवांशिक संसाधन पर अंतर्राष्ट्रीय खाद्य संधि पर नवम्बर, 2001 में रोम में हस्ताक्षर किये गये थे। जिसे कृषि के लिए सभी संयंत्र आनुवांशिक संसाधनों के संरक्षण और स्थाई उपयोग के लिए एक कानूनी रूप से बाध्यकारी रूप रेखा बनाने के लिए अपनाया गया था। जैविक विविधता पर संयुक्‍त राष्‍ट्र सम्‍मेलन (सीबीडी) 1992 एक बहुपक्षीय संधि है। इस संधि के तीन मुख्‍य लक्ष्‍य हैं – जैसे जैविक विविधता का संरक्षण उनके घटकों का निरंतर प्रयोग और उनसे होने वाले लाभ के निष्‍पक्ष और समान वितरण शामिल हैं।

मरुभूमि राष्ट्रीय उद्यान

भारत में जैव विविधता के संरक्षण और विकास के लिए एक अनूठा जीवमंडल रक्षित स्थान है। यह पश्चिम भारत के राजस्थान राज्य में जैसलमेर के शहर में स्थित है। यह 3162 वर्ग किमी का क्षेत्र में फैला हुआ सबसे बड़े राष्ट्रीय पार्कों में से एक है। मरुभूमि राष्ट्रीय उद्यान थार रेगिस्तान के पारिस्थितिकी तंत्र का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। उद्यान का 20 प्रतिशत भाग रेत के टीलों से सजा हुआ है ।

जैव विविधता के संरक्षण में वन्यजीव गलियारों की भूमिका

एक निवास स्थान के गलियारे , वन्यजीव गलियारे या ग्रीन कॉरिडोर, जैसे सड़क, विकास के रूप में मानव गतिविधियों द्वारा अलग वन्यजीव आबादी को जोड़ने के निवास स्थान का एक क्षेत्र है। यह आबादी के बीच व्यक्तियों को के आदान प्रदान करने की अनुमति देता है जिससे प्रजनन और कम आनुवंशिक विविधता के नकारात्मक प्रभावों को रोकने में मदद मिल सकती है जो कि कि अक्सर पृथक आबादी के भीतर होते हैं।

जैव विविधता का झील संग्रह

झीलें, जटिल पारिस्थितिकी प्रणाली और और विस्तृत श्रृंखला में शामिल एक अंतर्देशीय, तटीय और समुद्री निवास हैं। इनमें बाढ़ के मैदान, दलदल, दलदल, मछली तालाबों, ज्वार की दलदल प्राकृतिक और मानव निर्मित झीलें शामिल हैं। 1971 में रामसर, ईरान में झीलों पर हुए सम्मेलन में एक अंतरराष्ट्रीय संधि हस्ताक्षर किए गये जो झीलों और अपने संसाधनों से झीलों के संरक्षण और सही उपयोग के लिए राष्ट्रीय कार्य और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के लिए रूपरेखा प्रदान करती है।

जैव विविधता के फायदे

जैव विविधता फसलों से भोजन, पशुओं, वानिकी और मछली प्रदान करता है। जैव विविधता उन्नत किस्में प्रजनन के लिए एक स्रोत सामग्री के रूप में और नए जैव निम्नीकरण कीटनाशकों के एक स्रोत के रूप में, नई फसलों के एक स्रोत के रूप में आधुनिक कृषि के लिए उपयोग में आती है। जैव विविधता चिकित्सीय गुणों के साथ पदार्थों की एक समृद्ध स्रोत है। कई महत्वपूर्ण औषधि संयंत्र आधारित पदार्थों के रूप में में उत्पन्न होते हैं जिनकी उपयोगिता मानव स्वास्थ्य के लिए अमूल्य है। ये संयंत्र आधारित पदार्थ के रूप में जैसे- लकड़ी , तेल, स्नेहक, खाद्य जायके, औद्योगिक एंजाइमों , सौंदर्य प्रसाधन, इत्र, सुगंध, रंग, कागज, मोम, रबर, रबड़-क्षीर, रेजिन, जहर और काग जैसे औद्योगिक उत्पादों को सभी विभिन्न प्रजातियों के पौधे से प्राप्त किया जा सकता है। जैव विविधता ऐसे कई पार्कों और जंगलों के रूप में कई क्षेत्रों के लिए किफायती धन का एक स्रोत है जहां जंगली प्रकृति और जानवर वहां के सौंदर्य और खुशी का स्रोत रहे हैं जो कई पर्यटकों को आकर्षित करता है। घर से बाहर विशेष रूप से पर्यावरण पर्यटन, एक बढती हुयी मनोरंजक गतिविधि है। जैव विविधता के पास महान सौंदर्यात्मक मूल्य है।सौंदर्य पुरस्कार के फलस्वरुप जिसमें पारिस्थितिकी पर्यटन, पक्षी दर्शन, वन्य जीवन, पालतू रखने, बागवानी, आदि शामिल हैं। जैव विविधता पारिस्थितिकी प्रणालियों के साथ व्यक्तिगत प्रजातियों से वस्तुओं और सेवाओं के रखरखाव और टिकाऊ उपयोग के लिए भी आवश्यक है। इन सेवाओं में वातावरण की गैसीय संरचना के रखरखाव, जंगलों और समुद्री प्रणाली द्वारा जलवायु नियंत्रण, प्राकृतिक कीट नियंत्रण, कीड़े और पक्षियों द्वारा पौधों के परागण, मिट्टी के गठन और संरक्षण आदि शामिल हैं।

भारतीय राजनीति में महिलाओ की भागीदारी

भारतीय राजनीति में महिलाओ की भागीदारी

भारत की राजनीति में महिलाओं की भागीदारी कम होने के पीछे अब तक समाज में पितृसत्तात्मक ढांचे का मौजूद होना है.

यह न सिर्फ़ महिलाओं को राजनीति में आने से हतोत्साहित करता है बल्कि राजनीति के प्रवेशद्वार की बाधाओं की तरह काम करता है.

लेकिन राजनीतिक दलों के भेदभावपूर्ण रवैये के बावजूद मतदाता के रूप में महिलाओ की भागीदारी नब्बे के दशक के अंत से उल्लेखनीय रूप से बढ़ी है.

ऐसे में यह अनिवार्य हो जाता है कि चुनावों के विभिन्न स्तर पर महिलाओं की भागीदारी का विश्लेषण किया जाए ताकि यह पता लगाया जा सके कि आज़ादी के साढ़े छह दशक बाद भी इसमें ग़ैरबराबरी क्यों है.

सफलता

महिलाओं की चुनाव प्रक्रिया में भागीदारी का विश्लेषण एक पिरामिड मॉडल के रूप में किया जा सकता है. इसमें सबसे ऊपर लोकसभा में उनकी 1952 में मौजूदगी, 22 सीट, को रखा जा सकता है जो 2014 में 61 तक आ गई है. यह वृद्धि 36% है.

लेकिन लैंगिक भेदभाव अब भी भारी मात्रा में मौजूद है और लोकसभा में 10 में से नौ सांसद पुरुष हैं. 1952 में लोकसभा में महिलाओं की संख्या 4.4% थी जो 2014 में क़रीब 11% है. लेकिन यह अब भी वैश्विक औसत 20% से कम है.

चुनावों में महिलाओं को टिकट न देने की नीति न सिर्फ़ राष्ट्रीय पार्टियों की है बल्कि क्षेत्रीय पार्टियां भी इसी राह पर चल रही हैं. और इसकी वजह बताई जाती है उनमें 'जीतने की क्षमता' कम होना, जो चुनाव में सबसे महत्वपूर्ण है.

हालांकि भारत के आम चुनावों में महिला उम्मीदवारों की सफलता का विश्लेषण करने वाले एक विशेषज्ञ के अनुसार यह पिछले तीन चुनावों में बेहतर रही है. 2014 के आम चुनावों में महिलाओं की सफलता 9% रही है जो पुरुषों की 6% के मुक़ाबले तीन फ़ीसदी ज़्यादा है.

यह आंकड़ा राजनीतिक दलों के जिताऊ उम्मीदवार के आधार पर ज़्यादा टिकट देने के तर्क को ख़ारिज कर देता है और साथ ही महिला उम्मीदवार न मिलने की बात को निराधार ठहराता है.

लोकसभा और फ़ैसले लेने वाली जगहों, जैसे कि मंत्रिमंडल, में महिलाओं का कम प्रतिनिधित्व सीधे-सीधे राजनीतिक ढांचे से उनको सुनियोजित ढंग से बाहर रखने और मूलभूत लैंगिक भेदभाव को रेखांकित करता है.

हालांकि महिलाएं राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर ठीक-ठाक संख्या में राजनीतिक दलों का प्रतिनिधित्व करती हैं लेकिन इन राजनीतिक दलों में भी उच्च पदों पर महिलाओं की उपस्थिति कम ही है.

भागीदारी

जो महिलाएं पार्टी के अंदरूनी ढांचे में उपस्थित दर्ज करवाने में कामयाब रही हैं उन्हें भी नेतृत्व के दूसरे दर्जे पर धकेल दिया गया है और वह 'शीशे की छत' को तोड़ पाने में नाकामयाब रही हैं. वह राजनीतिक दलों में नीति और रणनीति के स्तर पर बमुश्किल ही कोई महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं और अक्सर उन्हें 'महिला मुद्दों' पर निगाह रखने का काम दे दिया जाता है, जिससे कि चुनावों में पार्टी को फ़ायदा मिल सके.

नब्बे के दशक में भारत में महिलाओं की चुनावों में भागीदारी में उल्लेखनीय बढ़ोत्तरी देखी गई. इस साल हुए आम चुनावों में आज तक की सबसे ज़्यादा महिला मतदाताओं की भागीदारी देखी गई.

चुनाव प्रक्रिया में महिलाओं की भागदारी 1962 के 46.6% से लगातार बढ़ी है और 2014 में यह 65.7% हो गई है, हालांकि 2004 के आम चुनावों में 1999 के मुक़ाबले थोड़ी गिरावट देखी गई थी.

1962 के चुनावों में पुरुष और महिला मतदाताओं के बीच अंतर 16.7% से घटकर 2014 में 1.5% हो गया है.

90 के दशक में पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं को दिए गए 33% आरक्षण से देश की महिलाओं में पुरुषों की तरह ही सत्ता हासिल करने की भावना विकसित हुई है. इसने एक प्रेरणादायक का काम किया और जो शक्ति प्रदान की उससे महिला मतदाताओं की चुनाव प्रक्रिया में भागीदारी भी बढ़ी.

उम्मीद

भारत में महिलाओं ने दलितों या मुसलमानों जैसे 'किसी ख़ास वर्ग' के रूप में कभी मतदान नहीं किया. और न ही किसी राजनीतिक दल ने राज्य या देश के स्तर पर ऐसी कोशिश की कि उन्हें उनसे जुड़े किसी मुद्दे पर आंदोलित किया जाए.पार्टियों को महिला मतदाताओं की याद सिर्फ़ चुनाव के दौरान ही आती है और उनके घोषणापत्रों में किए गए वादे शायद ही कभी पूरे होते हैं.

महिलाओं के मुद्दों के प्रति राजनीतिक दलों की गंभीरता महिला आरक्षण बिल को पास करने में असफलता से ही साफ़ हो जाती है.

पिछले कुछ चुनावों के प्रमुख राजनीतिक दलों के घोषणापत्रों पर नज़र डालने से साफ़ हो जाता है कि उनमें लैंगिक मुद्दे प्रमुखता रखते हैं. लेकिन घोषणापत्रों में जो वादे किए जाते हैं वह घिटे-पिटे होते हैं और चुनावी गहमा-गहमी के बाद आसानी से भुला दिए जाते हैं.

भारत में महिला आंदोलन इस वक्त संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के सवालों पर सकारात्मक कार्रवाई को लेकर बंटा हुआ है. यह मूलतः दो बातों पर केंद्रित है- पहला कुल मिलाकर महिला आरक्षण का कोटा बढ़ाने को लेकर और उसमें पिछली जाति की महिलाओं को लेकर और दूसरा अभिजात्यवाद के मुद्दे पर.

विधायी निकायों में महिलाओं के लिए सकारात्मक दिशा में काम किया जाना इस वक्त की ज़रूरत है. इसके लिए महिलाओं की चुनावी प्रक्रिया में बाधक बनने वाली चीज़ों को दूर किए जाने की ज़रूरत है और चुनावी राजनीति में मौजूदा दूरियों को पाटने के साथ ही इसे लैंगिक भागीदारी वाला बनाने की ज़रूरत है.

GAAR (गार) : एक मुल्यांकन

GAAR (गार) : एक मुल्यांकन

[पार्ट-1]

IAS/PSC की प्री एवं मुख्य परीक्षा हेतु इकॉनमी एवं करंट से सम्बंधित महत्वपूर्ण टॉपिक।
स्रोत-वित् मंत्रालय भारत सरकार

इस टॉपिक को निम्न रूप में देखेंगे-

1.गार क्या है

2.गार लाये जाने का मुख्य उद्देश्य क्या है

3.विशेषताएं

4.समिति का गठन

5.कब से लागु होगा गार

6.समस्याए

7.गार से अपवंचन

8.निष्कर्ष

1.गार क्या है-

टैक्स चोरी और काले धन को रोकने हेतु बनाया गया "गार (General Anti Avoidance Rules)" एक प्रकार का नियम है जिसके पीछे सरकार का एक ही लक्ष्य है, जो भी विदेशी कंपनी भारत में निवेश करे, वह यहां पर तय नियमों के मुताबिक टैक्स दे।

2.गार लाये जाने का मुख्य उद्देश्य क्या है-

*गार रूल का मुख्य उद्देश्य उन सौदों या आय को कर के दायरे में लाना है, जिसको केवल करों का भुगतान से बचने के लिए संरचित किया गया हैं।
*कर चोरी को रोक कर सरकारी राजस्व में वृद्धि करना है।
*इसका मुख्य उद्देश्य, "कराधान प्रणाली की खामियां दूर करना तथा कर चोरी करने वालों का पता लगाना है।"
*गार नियमों को लाने का उद्देश्य विदेशी निवेशकों को ऐसे रास्ते अपनाने से रोकना है जिनका ‘मुख्य ध्येय केवल कर लाभ प्राप्त करना हो।’ सरकार ऐसे रास्ते को कर से बचने का एक अमान्य रास्ता मानेगी और उसकी अनुमति नहीं दी जाएगी।

3.विशेषताएं:-

ये नियम, मूल रूप से प्रत्यक्ष कर संहिता (डीटीसी) 2010 में प्रस्तावित है, जो करों से बचने के लेनदेन को लक्षित कर रहे हैं।
पूर्व वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी ने आम बजट 2012-13 को प्रस्तुत करते हुए उसमें गार के प्रावधानों का उल्लेख किया था।
संसद ने इसे स्थायी समिति को भेज दिया था। स्थायी समिति की सिफारिशों पर गौर करने के बाद नियमों के प्रावधानों में निम्न संशोधन का प्रस्ताव किया गया है:-
* गार के अंतर्गत कार्यवाही से पहले प्रमाण पेश करने की जिम्मेदारी कर दाता की जगह राजस्व विभाग
को होगी।
* निष्पक्षता और पादर्शिता सुनिश्चित करने के लिए गार की अनुमोदन समिति में एक स्वतंत्र सदस्य
शामिल किया जायेगा। जो कानून मंत्रालय में संयुक्त सचिव या उसके उच्च पद के अधिकारी होते हैं।
* कोई भी कर दाता (आवासी या गैर-आवासी) अग्रिम निर्देश प्राधिकरण (एएआर) के पास निर्देश लेने
के लिए जा सकेगा और पता कर सकेगा कि गार के प्रावधानों के अंतर्गत एएआर द्वारा की जाने वाली
व्यवस्था की अनुमति है या नहीं।
* गार नियमों को लाने का मकसद विदेशी निवेशकों को ऐसे रास्ते अपनाने से रोकना है जिनका
‘ मुख्य ध्येय केवल कर लाभ प्राप्त करना हो।’

* केंद्रीय बजट 2012-13 में प्रस्तावित गार का उद्देश्य और भाषा भी बिल्कुल वही है जो डीटीसी बिल में हैं। वित्त विधेयक 2012 में "गार" को उप-अनुभाग 2 से सेक्शन 90 में प्रस्तुत किया गया है, जिससे भारत द्वारा हस्ताक्षरित संधियों के प्रावधानों को अधिभूत किया जा सके, इसको आयकर अधिनियम-1961 की धारा के द्वारा लागू किया जायेगा।

GAAR (गार) : एक मुल्यांकन

GAAR (गार) : एक मुल्यांकन

[पार्ट-2]

IAS/PSC की प्री एवं मुख्य परीक्षा हेतु इकॉनमी एवं करंट से सम्बंधित महत्वपूर्ण टॉपिक।
स्रोत-वित् मंत्रालय भारत सरकार

4.समिति का गठन:-

पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने विवादास्पद सामान्य कर परिवर्जन रोधी नियम (गार) के नए दिशानिर्देश तैयार करने के लिए 13 जुलाई 2012 को ICRIER (Indian Council for Research on International Economic Relations) के प्रमुख तथा कर विशेषज्ञ पार्थसारथी शोम की अध्यक्षता में एक 4 सदस्यीय समिति का गठन किया था।

5.कब से लागु होगा गार-

विशेष समिति ने सुझाव दिया कि सरकार को इसका अनुपालन 2016-17 तक के लिए स्थगित कर देना चाहिए।
सरकार ने सामान्य कर परिवर्जन-रोधी नियमों (गार) पर गठित विशेषज्ञ समिति की प्रमुख सिफारिशों को कुछ बदलावों के साथ स्वीकार करते हुए ‘गार’ का क्रियान्वयन दो साल के लिए और टाल दिया गया था। अब यह देखना है कि नई सरकार इस विषय में क्या निर्णय लेती है तथा कब तक इसे लागू किया जाता है।

6.समस्याएँ-

गार को लागू करने में प्रमुख समस्या यह बताई जा रही है कि इससे निवेशकों को भरोसा कम होगा तथा निवेश में प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।

7.गार से अपवंचन-

* ‘गार’ उन विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) पर लागू नहीं होगा जो समझौते के तहत आयकर अधिनियम की धारा 90 और 90ए के तहत कोई लाभ नहीं लेंगे।

*एफआईआई में जो प्रवासी निवेशक होंगे उनपर भी गार लागू नहीं होगा।

*आयकर की धारा 90 और 90ए के तहत दोहरे कराधान से बचने का समझौता विभिन्न देशों के साथ किया जाता है। इसमें कंपनियों को दोहरे कराधान से बचने की व्यवस्था है।

8.निष्कर्ष-
यदपि गार को लागू किये जाने में निवेश प्रभवित होने की आशंकाएँ जतायी जा रही है नतीजन अभी तक सरकार इसे लागू नहीं कर पा रही। परन्तु एक स्थायी अर्थव्यवस्था के लिए आवश्यक है कि एक समतामूलक कर अवश्य हो। देश में आ रहे निवेश का एक बड़ा भाग ब्लैक मनी का ही है जो पुन:निवेश कर दिया जाता है। ब्लैक मनी वह धन है जिसपर कर नहीं चुकाया जाता इसलिए ऐसे धन को कर दायरे में लाया जाना आवश्यक हैं। हाल ही में सरकार ने ब्लैक मनी की संदर्भ में SIT का गठन किया है। देखना है इस दिशा में सरकार का अगला कदम क्या होगा।

भारत के संवैधानिक ढांचे के अंतर्गत पर्या वरण संरक्षण

भारत के संवैधानिक ढांचे के अंतर्गत पर्या वरण संरक्षण

भारत का संविधान निष्क्रीय नहीं बल्कि जीवंत एवं सक्रिय दस्तावेज है जो समय के साथ विकसित होता रहा है।पर्यावरण संरक्षण को लेकर संविधान में विशेष प्रावधान संविधान की सदा विकसित होने वाली प्रवृति और जमीन संबंधी मौलिक कानून के बढ़ने की संभावनाओं का ही परिणाम है। हमारे संविधान की प्रस्तावना समाज के सामाजवादी तरीके और प्रत्येक व्यक्ति की गरिमा सुनिश्चि करती है।जीने के बेहतर मानक और प्रदूषणरहित वातावरण संविधान के भीतर अंतर्निहित है। पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम 1986 के अनुसार पर्यावरण में जल, हवा और जमीन और अंतरसंबंध जिसमें हवा समाहित हो, जल-जमीन और मानव, अन्य जीवित चीजें, पेड़-पौधे, सूक्ष्म जीवजंतु और संपत्ति आदि समाहित हैं।

भारतीय संविधान में मौलिक कर्तव्यों के तहत हर नागरिक से अपेक्षा की जाती है कि वे पर्यावरण को सुरक्षित रखने में योगदान देंगे। अनुच्छेद 51 A (g) कहता है कि जंगल, तालाब, नदियां, वन्यजीव सहित सभी तरह की प्राकृतिक पर्यावरण संबंधित चीजों की रक्षा करना व उनको बढ़ावा देना हर भारतीय का कर्तव्य होगा। साथ ही प्रत्येक नागरिक को सभी सजीवों के प्रित करुणा रखनी होगी।

भारतीय संविधान के अंतर्गत मूल सिद्धांतों एक कल्याणकारी राज्य निर्माण के लिए काम करते हैं। स्वस्थ पर्यावरण भी कल्याणकारी राज्य का ही एक तत्व है। अनुच्छेद 47 कहता है कि लोगों के जीवन स्तर को सुधारना, उन्हें भरपूर पोषण मुहैया कराना और सार्वजनिक स्वास्थ्य की वृद्धि के लिए काम करना राज्य के प्राथमिक कर्तव्यों में शामिल हैं। सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार के तहत पर्यावरण संरक्षण और उसमें सुधार भी शामिल हैं क्योंकि इसके बगैर सार्वजनिक स्वास्थ्य को सुनिश्चित नहीं किया जा सकता है। अनुच्छेद 48 कृषि एवं जीव संगठनों के संरक्षण की बात करता है। यह अनुच्छेद राज्यों को निर्देश देता है कि वे कृषि व जीवों से जुड़ों धंधों को आधुनिक व वैज्ञानिक तरीके से संगठित करने के लिए जरूरी कदम उठाएं। विशेषतौर पर, राज्यों को जीव-जन्तुओं की प्रजातियों को संरक्षित करना चाहिए और गाय, बछड़ों, भेड़-बकरी व अन्य जानवरों की हत्या पर रोक लगानी चाहिए। संविधान का अनुच्छेद 48-A कहता है कि राज्य पर्यावरण संरक्षण व उसको बढ़ावा देने का काम करेंगे और देशभर में जंगलों व वन्य जीवों को को की सुरक्षा के लिए काम करेंगे।

प्रत्येक व्यक्ति के विकास के लिए सबसे जरूरी मौलिक अधिकारों की गारंटी भारत का संविधान भाग-3 के तहत देता है। पर्यावरण के अधिकार के बिना व्यक्ति का विकास भी संभव नहीं है। अनुच्छेद 21, 14 और 19 को पर्यावरण संरक्षण के लिए प्रयोग में लाया जा चुका है।

संविधान के अनुच्छेद 21 के अनुसार कानून द्वारा स्थापित बाध्यताओं को छोड़कर किसी भी व्यक्ति को जीवन जीने और व्यक्तिगत आजादी से वंचित नहीं रखा जाएगा। मेनका गांधी बनाम भारत सरकार (AIR 1978 SC 597) संबंधी मुकद्दमें में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद अनुच्छेद 21 की समय समय पर उदारवादी तरीके से व्याख्या की जा चुकी है। अनुच्छेद 21 जीवन जीने का मौलिक अधिकार भी देता है, इसमें पर्यावरण का अधिकार, बीमारियों व संक्रमण के खतरे से मुक्ति का अधिकार अंतर्निहित हैं। स्वस्थ वातावरण का अधिकार प्रतिष्ठा से मानव जीवन जीने के अधिकार की महत्वपूर्ण विशेषता है। संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत स्वस्थ वातावरण में जीवन जीने के अधिकार को पहली बार उस समय मान्यता दी गई थी, जब रूरल लिटिगेसन एंड एंटाइटलमेंट केंद्र बनाम राज्य, AIR 1988 SC 2187 (देहरादून खदान केस के रूप में प्रसिद्ध) केस सामने आया था। यह भारत में अपनी तरह का पहला मामला था, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम 1986 के तहत पर्यावरण व पर्यावरण संतुलन संबंधी मुद्दों को ध्यान में रखते हुए इस मामले में खनन (गैरकानूनी खनन ) को रोकने के निर्देश दिए थे। वहीं एमसी मेहता बनाम भारतीय संघ, AIR 1987 SC 1086 के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने प्रदूषण रहित वातावरण में जीवन जीने के अधिकार को भारतीय संविधान के अनु्छेद 21 के अंतर्गत जीवन जीने के मौलिक अधिकार के अंग के रूप में माना था।

बहुत अधिक शोर-शराबा भी समाज में प्रदूषण पैदा करता है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19 (1) a व अनुच्छेद 21 प्रत्येक नागरिक को बेहतर वातावरण और शांतिपूर्ण जीवन जीने का अधिकार देता है। पीए जैकब बनाम कोट्टायम पुलिस अधीक्षक, AIR 1993 ker 1, के मामले में केरला उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि भारतीय संविधान में अनु्च्छेद 19 (1) (a) के तहत दी गई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता किसी भी नागरिक को तेज आवाज में लाउड स्पीकर व अन्य शोर-शराबा करने वाले उपकरण आदि बजाने की इजाजत नहीं देता है। इस प्रकार अब शोर-शराबे, लाउड स्पीकर आदि से होने वाले ध्वनि प्रदूषण को अनु्च्छेद 19 (1) (a) के तहत नियंत्रित किया जा सकता है।

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19 (1) (g) प्रत्येक नागरिक को अपनी पसंद के अनुसार किसी भी तरह का व्यवसाय, काम-धंधा आदि करने का अधिकार देता है। लेकिन इसमें कुछ प्रतिबंध भी हैं। अर्थात् कोई भी नागरिक ऐसा कोई भी काम नहीं कर सकता, जिससे समाज व लोगों के स्वास्थ्य पर कोई प्रतिकूल प्रभाव पड़े। पर्यावरण संरक्षण संविधान के इस अनुच्छेद में अंतर्निहित है। कोवरजी बी भरुचा बनाम आबकारी आयुक्त, अजमेर (1954, SC 220) के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि जहां कहीं भी पर्यावरण संरक्षण व व्यवसाय करने के अधिकार के बीच कोई विरोध होगा तो कोर्ट को पर्यावरण संबंधी हितों और व्यवसाय व काम धंधा चुनने संबंधी अधिकार के बीच संतुलन बनाकर किसी निर्णय पर पहुंचना होगा।

भारत के संविधान के अनुच्छेद 32 और 226 के अंतर्गत जनहित याचिका पर्यावरण संबंधी याचिकाओं की धारा का ही परिणाम है । देहरादून में लाइमस्टोन खदान को बंद कराना (देहरादून खदान केस AIR 1985 SC 652), दिल्ली में क्लोरिन प्लांट में रक्षकों को लगवाना (एमसी मेहता बनाम भारतीय संघ, AIR 1988 SC 1037) आदि वो प्रमुख पर्यावरण संबंधी मामले हैं, जिनमें सर्वोच्च न्यायालय ने अभूतपूर्व और जनहित में निर्णय सुनाएं हैं। वेल्लोर नागरिक कल्याण फोरम बनाम भारतीय संघ (1996) 5 एससीसी 647 के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि पर्यावरण संरक्षण व वातावरण को शुद्ध रखने के लिए पूर्व सावधानियां रखकर ही विकास की राह पर आगे बढ़ पाना संभव है।

स्थानीय व ग्रामीण स्तर पर मृदा संरक्षण, जल प्रबंधन, जंगलों की सुरक्षा और पर्यावरण की रक्षा व इसको बढ़ावा देने के लिए पंचायतों को भी मजबूत बनाया जा चुका है।

पर्यावरण की रक्षा हमारे सांस्कृतिक मूल्यों व परंपराओं का ही अंग है। अथर्ववेद में कहा भी गया है कि मनुष्य का स्वर्ग यहीं पृथ्वी पर है। यह जीवित संसार ही सभी मनुष्यों के लिए सबसे प्यारा स्थान है। यह प्रकृति की उदारता का ही आशीर्वाद है कि हम पृथ्वी पर बेहतर सोच और जज्‍बे के साथ जी रहे हैं। पृथ्वी ही हमारा स्वर्ग है और इसकी रक्षा करना हमारा कर्तव्य है। भारत के संविधान में भी प्रकृति के संरक्षण और रक्षा का ढांचा समाहित है, जिसके बिना जीवन का आनंद नहीं उठाया जा सकता है। पर्यावरण संरक्षण के प्रति लोगों की सहभागिता बढ़ाने, पर्यावरण जागरूकता, पर्यावरण संबंधी शिक्षा का विकास करने व लोगों को पर्यावरण के प्रति संवेदनशील बनाने के लिए पर्यावरण की रक्षा से जुड़े संवैधानिक प्रावधानों का ज्ञान लोगों को होना बेहद जरूरी है। यह आज की जरूरत भी है।

बासेल-।।।: नवीन पहल

बासेल-।।।: नवीन पहल

IAS /PSC की प्री एवं मुख्य परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण टॉपिक।

क्या है बासेल III -

बैंकिंग क्षेत्र के अंतर्गत विनियमन, पर्यवेक्षण और जोखिम-प्रबंधन में सुधार लाने के लिए निरूपित किए गए सुधारात्मक उपायों का एक व्यापक सेट है बासेल ।।।.
बैंकिंग पर्यवेक्षण पर बासेल समिति ने 2009 के अंत में बासेल III का पहला वर्जन प्रकाशित किया था और बैंकों को समस्त अपेक्षाएँ पूरी करने के लिए लगभग तीन वर्ष का समय दिया था।
मोटे तौर पर, ऋण-संकट के प्रत्युत्तर में बैंकों को उपयुक्त लीवरेज रेश्यो कायम रखना और कतिपय पूंजीगत अपेक्षाएँ पूरी करना आवश्यक है।

नवीन पहल-

बासेल III मानदंड लागू करने में बैंकिंग क्षेत्र की मदद करने के लिए भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) ने 7 मार्च 2014 को वित्तीय स्थिरता और विकास परिषद (एफएसडीसी) के अंतर्गत एक समिति गठित करने की घोषणा की।

समिति का कार्य-

* य़ह समिति बासेल-III पूँजी मानदंड लागू करने हेतु बैंकिंग क्षेत्र के लिए दिशा-निर्देश तय करेगी

महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व-

• वित्तीय क्षेत्र विधायी सुधार आयोग (एफएसएलआरसी) की गैर-विधायी सिफारिशों का कार्यान्वयन।

• निवेशकों को वित्तीय परिसंपत्तियों की समस्त श्रेणियों का एक सिंगल व्यू उपलब्ध कराने के लिए एक रिपोजिटरी स्थापित करने का मुद्दा।

• बासेल-III विनियमों और पर्यवेक्षीय पूँजीगत अपेक्षाओं को मद्देनजर रखते हुए अगले पाँच वर्षों में बैंकिंग क्षेत्र की पूंजीगत आवश्यकताएँ सुझाने के उपाय।

• विभिन्न क्षेत्रों के बीच समान क्रियाकलापों के लिए विनियमों के अत्यधिक सामंजस्य के मुद्दे पर भी विचार किया जायेगा।

• इसमें वित्तीय क्षेत्र के लिए एक कारगर समाधान तंत्र स्थापित करने के उपायों पर भी विचार किया जायेगा।

कॉमनवेल्थ खेल: 13 सुनहरे भारतीय

कॉमनवेल्थ खेल: 13 सुनहरे भारतीय:--

ब्रिटेन के ग्लास्गो में चल रहे राष्ट्रमंडल खेलों में अब तक 13 भारतीय खिलाड़ियों ने स्वर्ण पदक हासिल किए हैं.

विकास गौड़ा ने चक्का फेंक प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक जीता.

दिल्ली राष्ट्रमंडल खेल में स्वर्ण पदक जीतने वाले पहलवान योगेश्वर दत्त ने ग्लासगो में भी स्वर्ण पदक जीत लिया. उन्होंने 65 किलो फ़्रीस्टाइल वर्ग में कनाडा के अपने प्रतिद्वन्द्वी जेवोन बैलफ़ोर को 10-0 से हराया.

योगेश्वर से पहले पहलवान बबीता कुमारी ने राष्ट्रमंडल खेलों में भारतीय पहलवानों का स्वर्णिम प्रदर्शन जारी रखा. बबीता ने 55 किलो फ़्रीस्टाइल कुश्ती में कनाडा की ब्रिटनी लैवरडोर को 9-2 से हराया. बबीता ने दिल्ली में 2010 में हुए राष्ट्रमंडल खेलों में रजत पदक जीता था. उस समय वह 51 किलोग्राम वर्ग में थीं.

भारत के स्टार पहलवान सुशील कुमार ने उम्मीदों के अनुरूप प्रदर्शन किया और 74 किलोग्राम फ़्रीस्टाइल वर्ग में पाकिस्तानी पहलवान क़मर अब्बास को 6-2 से हरा कर स्वर्ण जीता.

कुश्ती में भारत के स्वर्ण पदकों का सिलसिला अमित कुमार ने शुरू किया. उन्होंने 57 किलोग्राम फ्री स्टाइल कुश्ती में नाइजीरिया के एबिकवेमिनोमो वेल्सन को हराकर ये पदक जीता.

महिलाओं की 48 किलोग्राम फ़्रीस्टाइल स्पर्द्धा में भारत की विनेश फोगट ने इंग्लैंड की याना रैट्टिगन को हराकर स्वर्ण जीता.

भारत की राही सरनोबत ने महिलाओं की 25 मीटर पिस्टल शूटिंग प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक जीता. इस प्रतियोगिता में भारत की ही अनीसा सैयद को रजत पदक मिला.

भारत के सतीश शिवलिंगम ने पुरुषों की 77 किलो भारोत्तोलन प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक जीता जबकि भारत के ही रवि कटुलु के हाथ रजत पदक लगा.

महिलाओं की 10 मीटर एयर राइफ़ल शूटिंग में अपूर्वी चंदेला ने राष्ट्रमंडल खेलों के तीसरे दिन स्वर्ण पदक जीता.

पुरुषों की 10 मीटर एयर राइफ़ल शूटिंग प्रतियोगिता में अभिनव बिंद्रा ने स्वर्ण पदक पर क़ब्ज़ा जमाया.

पुरुषों की 56 किलो भारोत्तोलन प्रतियोगिता में सुखन डे ने भारत को स्वर्ण पदक दिलवाया.

महिलाओं की भारोत्तोलन प्रतियोगिता के 48 किलो वर्ग में भारत की संजीता चानू खुमुकचाम ने स्वर्ण पदक जीता.

पुरुषों की 50 मीटर पिस्टल शूटिंग प्रतियोगिता में भारत के जीतू राय ने जहां स्वर्ण पदक जीता वहीं गुरपाल सिंह को रजत पदक मिला.

ब्रिक्स का इतिहास

 ब्रिक्स का इतिहास :-

1.स्थापना- 2008

2. सदस्य देश-(5) ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन
और दक्षिण अफ्रीका हैं।

3. इन्ही देशों के अंग्रेज़ी में नाम के
प्रथमाक्षरों B, R, I, C व S से मिलकर इस समूह का यह
नामकरण हुआ है।

*.सम्मेलन:-
# 2014 ब्रिक्स शिखर सम्मेलन (छठा ब्रिक्स शिखर सम्मेलन)
15-16 जुलाई 2014 को ब्राज़ील के फोर्टालेज़ा और
ब्रासीलिया में आयोजित किया गया।

# इस शिखर
सम्मेलन का मुख्य विषय रहा- ”समावेशी वृद्धि, सतत
विकास”।

#.2014 ब्रिक्स सम्मेलन के एक अति महत्त्वपूर्ण निर्णय में 100
अरब डॉलर की शुरुआती अधिकृत पूंजी के साथ नए विकास
बैंक की स्थापना का फैसला किया गया!

इस बैंक
का प्रमुख उद्देश्य होंगे- किसी देश शॉर्ट-टर्म
लिक्विडिटी समस्याओं को दूर करना, ब्रिक्स देशों के बीच
सहयोग बढ़ाना, वैश्विक फाइनैंशल सेफ्टी नेट को मजबूत
करना आदि।

#.बैंक का मुख्यालय चीन के शंघाई में होगा तथा बैंक का प्रथम
अध्यक्ष भारत से होगा। हर सदस्य देश को पाँच साल तक
अध्यक्षता करने का अवसर मिलेगा।

#. BRICS का सातवा सम्मेलन रूस में प्रस्तावित हैं!

सार्क का इतिहास

सार्क का इतिहास
1. दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) दक्षिणएशिया के आठ देशों का क्षेत्रीय संगठन 
है।
2. सम्मेलन के सदस्यदेशों की कुल जनसंख्या लगभग 1.5 अरब है जो किसी अन्यक्षेत्रीय संगठन की तुलना में काफी ज्यादाहै।
3. इसकी स्थापना 8 दिसंबर, 1985 को भारत, पाकिस्तान,बांग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल, मालदीव और भूटान ने मिलकरकी थी। 2008 में अफगानिस्तान इसका आठवां सदस्य देश बना।
4. सार्क की स्थापना के पीछे मुख्य उद्देश्य इस क्षेत्र में आर्थिकविकास की गति को नई दिशा देना था, लेकिन सार्कअपनी स्थापना के इतने समय बाद भी इस कसौटी परखरा नहीं उतरा है।सार्क में भारत और पाकिस्तान दो सबसे महत्वपूर्ण देश हैं जिनकेबीच कई मुद्दों पर गहरे मतभेद हैं, जिसका प्रभाव प्रत्येक सार्कसम्मेलन पर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
* सार्क का 18 वॉ शिखर सम्मेलन:# नवंम्बर 2014 मे काठमांडू मे प्रस्तावितहै!

नया बैंक (एशियन इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक ) : भारत के लिए नफ़ा या फिर

नया बैंक (एशियन इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक ) : भारत के लिए नफ़ा या फिर:------



चीन के नेतृत्व में बनाए गए एक नए बैंक एशियन इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक के संस्थापक सदस्यों में भारत सहित 20 देश शामिल हैं.
यह बैंक एशियाई क्षेत्र में बुनियादी ढांचे के विकास के उद्देश्य से बनाया गया है.
भारत के लिए चीन का समर्थन करना कभी आसान नहीं रहा है. इस मसले पर आगे बढ़ने में भी कई दिक़्कतें थीं. इस फ़ैसले पर आगे बढ़ने से पहले भारत ने जिन अच्छे-बुरे पहलुओं पर तवज्जो दी, जो इस प्रकार हैंः
1. भारत को इस बात का डर था कि चीन का इस बैंक पर नियंत्रण होगा और एशिया में उसकी स्थिति मजबूत हो जाएगी. दरअसल चीन इस बैंक के 100 अरब डॉलर की इक्विटी पूंजी में से 50 फ़ीसदी की पेशकश कर रहा है. ज़ाहिर है कि इस बैंक में भारत की हिस्सेदारी और प्रभाव कम होगा.
लेकिन सवाल यह है कि इस बैंक में चीन के आर्थिक सहयोग के अलावा दूसरा विकल्प क्या है? रिलायंस समेत बड़ी भारतीय कंपनियों ने चाइना डेवलपमेंट फंड से काफी कर्ज़ लिया है. चीन का प्रभाव पहले से ही ज़्यादा है ऐसे में इसका विरोध करने के बजाए इसका फायदा उठाना ही मुनासिब होगा.
2. इस बैंक को बढ़ावा देने के पीछे चीन का अपना राजनीतिक मकसद भी हो सकता है. वह एशियाई विकास बैंक (एडीबी) को चुनौती देना चाहता है जिस पर जापान का दबदबा है.
लेकिन भारत के नज़रिए से देखें तो किसी दूसरे देश की राजनीति के बारे में चिंता करने की बजाय बुनियादी ढांचे के विकास से जुड़ी उसकी ज़रूरतें ज़्यादा हैं. भारत को 1 लाख करोड़ डॉलर (1 ट्रिलियन) की जरूरत है जिसे विश्व बैंक और एडीबी पूरा नहीं कर सकते हैं. इस बैंक से भारत के लिए नए विकल्प खुलेंगे.
3. नया बैंक विश्व बैंक और एशियाई विकास बैंक को कमजोर कर सकता है जिससे आख़िरकार भारत जैसे देश प्रभावित हो सकते हैं जिन्हें ज़्यादा कर्ज़ की ज़रूरत होती है.

वैसे भारत और चीन ने काफी पहले इस बात पर अपनी सहमति जता दी है कि वे विश्व बैंक और एशियाई विकास बैंक से खुश नहीं हैं. उन्होंने इनमें सुधार की मांग करते हुए कहा है कि इन संस्थानों पर पश्चिमी देशों का दबदबा है. जब चीन ने एशियन इन्फ्रास्ट्रक्चर बैंक के एक विकल्प की पेशकश कर दी तब भारत को इसे स्वीकारना ही था.
4. चार देश जापान, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण कोरिया और इंडोनेशिया इस नए बैंक से नहीं जुड़े हैं. भारत के सहयोग के बग़ैर इस बैंक को स्थापित करना चीन के लिए काफी मुश्किल होता.
इस बैंक से नहीं जुड़ने का मतलब यह होता कि भारत संस्थापक सदस्य होने का मौका खो देता. चीन, भारत के सहयोग के बग़ैर भी बैंक की स्थापना कर सकता था क्योंकि दूसरे 19 देशों ने इससे जुड़ने के लिए हामी भर दी थी. इन देशों में सिंगापुर भी शामिल था जो संस्थापक देशों के बीच एकमात्र विकसित देश है.
5. भारत-चीन सीमा विवाद नए बैंक के फ़ैसले पर असर डाल सकते हैं. मुमकिन है कि चीन द्वारा नियंत्रित बैंक भारत की कुछ परियोजनाओं में मदद नहीं दे सकता है मसलन 6.5 अरब डॉलर की लागत से सीमा क्षेत्र में सड़क तैयार करने की योजना.
दूसरे दक्षिण पूर्वी पड़ोसी देश पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, म्यांमार और श्रीलंका संस्थापक सदस्यों के तौर पर जुड़े हैं. बैंक के बोर्ड में भारत का मौजूद नहीं रहना घातक साबित हो सकता है क्योंकि भविष्य में दिए जाने वाले आर्थिक सहयोग से भारत के हितों पर असर पड़ सकता है.

भारत और चीन ने विश्व बैंक में सुधार की मांग की है जिस पर पश्चिमी देशों का दबदबा है.
6. अमेरिका भारत और अन्य देशों के साथ लॉबिंग करता रहा है ताकि ये देश इस नए बैंक से न जुड़ें क्योंकि ऐसा होने पर चीन एशिया की सबसे बड़ी ताकत बन जाएगा. निश्चित तौर पर इस बैंक से जुड़ने पर अमरीका ख़ुश नहीं होगा और भारत के साथ इसके रिश्तों पर भी असर पड़ सकता है.
हालांकि भारत ने इस बैंक से जुड़कर अपनी स्वतंत्र राय ज़ाहिर कर दी है. भारत अमरीका पर भी निर्भर नहीं रहना चाहता है. लेकिन सच यह भी है कि अमरीका इस बैंक पर निर्भर रहने वाले भारत के बजाए एक स्वतंत्र विचारों वाले भारत का सम्मान करेगा.
7. मुमकिन है कि नया बैंक उपयुक्त मानकों और जवाबदेही के नियमों का पालन न करे और कुछ देशों के लिए यह अनुचित भी हो सकता है.
लेकिन बैंक के बोर्ड से जुड़ने के लिए भारत के पास कई मुनासिब वजहें हैं और लेकिन उसे अपनी ग़लतियों को सुधारना होगा.