अब भारत की बारी
(जयराम रमेश)
अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा और चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने बीजिंग में जलवायु परिवर्तन पर ऐतिहासिक समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए। इस समझौते का दिसंबर 2015 में होने वाले पेरिस सम्मेलन पर असर पड़ना लाजिमी है, जहां दुनिया भर के नेता ग्लोबल वार्मिग से निपटने के लिए नए समझौते पर विचार को एकत्र होंगे। चीन-अमेरिका समझौते पर काम तो चल रहा था, किंतु निश्चित तौर पर इसके इतनी जल्दी होने की उम्मीद नहीं थी। दोनों देशों के बीच व्यापार में प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल पर भी एक समझौता हुआ है, जिसकी विश्व व्यापार संगठन में बड़ी प्रासंगिकता होगी। इन दो समझौतों के माध्यम से अमेरिका और चीन ने स्पष्ट संकेत दे दिया है कि ये द्विपक्षीय समझौते बहुपक्षीय समझौतों पर व्यापक असर डालेंगे।
अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा और चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने बीजिंग में जलवायु परिवर्तन पर ऐतिहासिक समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए। इस समझौते का दिसंबर 2015 में होने वाले पेरिस सम्मेलन पर असर पड़ना लाजिमी है, जहां दुनिया भर के नेता ग्लोबल वार्मिग से निपटने के लिए नए समझौते पर विचार को एकत्र होंगे। चीन-अमेरिका समझौते पर काम तो चल रहा था, किंतु निश्चित तौर पर इसके इतनी जल्दी होने की उम्मीद नहीं थी। दोनों देशों के बीच व्यापार में प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल पर भी एक समझौता हुआ है, जिसकी विश्व व्यापार संगठन में बड़ी प्रासंगिकता होगी। इन दो समझौतों के माध्यम से अमेरिका और चीन ने स्पष्ट संकेत दे दिया है कि ये द्विपक्षीय समझौते बहुपक्षीय समझौतों पर व्यापक असर डालेंगे।
जलवायु समझौता कई कारणों से ऐतिहासिक है। पहला तो यह कि चीन ने सार्वजनिक घोषणा की है कि 2030 तक कार्बन उत्सर्जन की उसकी दर उच्चतम स्तर पर पहुंचनी है, लेकिन उसका इरादा है कि उच्चतम दर का वर्ष इसके पहले ही आ जाए। मतलब साफ है कि चीन ने उर्त्सजन दर में कटौती की रूपरेखा तैयार कर ली है। दूसरा कारण यह है कि चीन अपने कुल ईंधन में गैर-जीवाश्म ईंधन, खासतौर पर परमाणु, सौर और पवन ऊर्जा की हिस्सेदारी 2030 तक बढ़ाकर 20 प्रतिशत तक ले आएगा। तीसरी अहमियत यह है कि अमेरिका 2025 तक कार्बन उत्सजर्न का स्तर घटाकर 2005 के स्तर से पर ले आएगा। उसका इरादा उत्सर्जन में 26-28 प्रतिशत की कमी का है। 2050 तक इसमें 80 प्रतिशत की कमी करने की उसने बात की है। और अंत में, ये दोनों देश स्वच्छ ऊर्जा और पर्यावरण की रक्षा के क्षेत्र में सहयोग का व्यापक विस्तार करेंगे।
विश्व के दो सबसे बड़े कार्बन उत्सजर्कों की यह संयुक्त घोषणा कार्बन उत्सजर्न में खास जिम्मेदारियों को चिह्नित करती है। हालांकि यह बयान ग्लोबल वार्मिग में उनके योगदान को कम करके दिखाता है। इसमें कहा गया है कि अमेरिका और चीन विश्व में ग्रीनहाउस गैस उत्सजर्न में एक-तिहाई के जिम्मेदार हैं। जबकि सच्चई यह है कि अमेरिका 15 प्रतिशत और चीन 29 प्रतिशत ग्रीनहाउस गैसों का उत्सजर्न करता है। इस प्रकार दोनों देश मिलाकर कुल वैश्विक उत्सजर्न में 44 प्रतिशत की हिस्सेदारी रखते हैं। इस प्रकार के किसी समझौते पर पहुंचने के लिए चीन और अमेरिका पिछले एक साल से प्रयासरत थे। हाल ही में 28 देशों के यूरोपीय संघ द्वारा 2025 से 2030 तक उत्सजर्न में बड़ी गिरावट लाने की घोषणा ने इन दोनों देशों पर दबाव डाला कि कार्बन उत्सजर्न में कटौती के संबंध में वे कुछ उल्लेखनीय करके दिखाएं और शेष दुनिया से पीछे न रहें।
इस समझौते के भारत के लिए क्या मायने हैं? वर्तमान में भारत वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सजर्न में करीब छह फीसद का जिम्मेदार है। इस प्रकार भारत यूरोपीय संघ, चीन और अमेरिका जैसे बड़े उत्सजर्कों की श्रेणी में नहीं आता। किंतु ग्लोबल वार्मिग और जलवायु परिवर्तन का इस पर पड़ने वाला बहुआयामी प्रभाव सबसे अधिक है। यही नहीं भारत में ग्रीनहाउस गैसों के उत्सजर्न की दर काफी तेज है और एक दशक में भारत की हिस्सेदारी यूरोपीय संघ के बराबर पहुंच जाएगी। इसलिए केवल इस बिना पर कि भारत का मामला अलग तरह का है, इस समझौते की अहमियत को खारिज करना निरी नासमझी होगी। अब अंतरराष्ट्रीय समुदाय अपेक्षा करेगा कि भारत भी 2025 और 2030 तक कुछ ठोस प्रतिबद्धता दिखाए। भारत पहले ही वर्ष 2020 तक उत्सजर्न गहनता में 2005 के स्तर से 20-25 प्रतिशत की कमी की प्रतिबद्धता जता चुका है। उत्सजर्न गहनता कार्बन डाइऑक्साइड उत्सजर्न (टनों में) को जीडीपी (डॉलर में) से भाग देने पर निकलती है। ऐसे में भारत के लिए 2025 और 2030 के लिए भी लक्ष्य तय करने में खास दिक्कत नहीं होनी चाहिए।
योजना आयोग के विशेषज्ञ समूह ने निम्न कार्बन वृद्धि पर रणनीति बनाने के मुद्दे पर अप्रैल 2014 में अपनी अंतिम रिपोर्ट में अनुमान लगाया था कि सौर, पवन और गोबरगैस का विद्युत आपूर्ति में अंशदान 6 प्रतिशत से बढ़कर 2030 तक 18 प्रतिशत हो सकता है। इसी प्रकार इसका आकलन था कि परमाणु ऊर्जा की विद्युत आपूर्ति में हिस्सेदारी भी बढ़कर 2030 तक 8 प्रतिशत हो सकती है। अगर मंत्रिमंडल या फिर प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में नवगठित नेशनल काउंसिल ऑन क्लाइमेट चेंज में इस रिपोर्ट पर विचार नहीं होता तो यह दुर्भाग्यपूर्ण होगा। अनेक अवसरों पर प्रधानमंत्री ने पूर्व के फैसलों को बदला नहीं है। उदाहरण के लिए, 30 सितंबर 2014 को ओबामा के साथ संयुक्त बयान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जलवायु परिवर्तन, ऊर्जा और पर्यावरणीय मुद्दों पर करीब-करीब इसी प्रकार की बात की थी, जैसी 27 सितंबर, 2013 को तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और बराक ओबामा के संयुक्त बयान में थीं। इसलिए विशेषज्ञ समूह द्वारा तय किए गए आंतरिक और वाह्य, दोनों लक्ष्यों के अनुरूप ग्रीनहाउस गैसों के उत्सजर्न में कटौती से प्रधानमंत्री को कोई खास दिक्कत नहीं होनी चाहिए। नए और समग्र कानूनों के माध्यम से विशिष्ट लक्ष्यों को हासिल किया जा सकता है। इससे दुनिया में भारत की छवि एक जिम्मेदार राष्ट्र की बनेगी।
चीन-अमेरिका समझौते का यह मतलब कतई नहीं है कि पेरिस सम्मेलन में किसी ठोस और रचनात्मक समझौते का रास्ता साफ हो जाएगा। पेरिस अंतिम मंजिल के बजाय एक प्रस्थान बिंदु भर होगा, किंतु अगर इस प्रस्थान बिंदु को भी हासिल करना है तो इसके लिए भारत को रचनात्मक सोच रखनी होगी। भारत किसी भी अंतरराष्ट्रीय समझौते में समानता के सिद्धांत का चैंपियन रहा है, किंतु इस मुद्दे पर यह अफ्रीकी समूह द्वारा पेश एक ठोस प्रस्ताव का विरोध कर रहा है। यह नासमझी भरा रुख है। ब्राजील ने भी तमाम देशों के लिए जिम्मेदारी निर्धारित करते हुए एक नई प्रस्तावना पेश की है और भारत इसका भी विरोध कर रहा है। भारत को विश्व जगत के साथ मिलकर चलने के साथ-साथ घरेलू स्तर पर जन स्वास्थ्य और जीविकोपाजर्न की सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए कड़े कदम उठाने होंगे। तीव्र विकास तो जरूरी है ही, किंतु यह टिकाऊ भी होना चाहिए। वर्तमान सत्ता प्रतिष्ठान पर्यावरण और वन नियामकों को आर्थिक वृद्धि में बाधा के रूप में देख रहा है। यह स्थितियों को गलत ढंग से देखने का नतीजा है। यह कहना सिद्धांत रूप में अच्छा लगता है कि विकास और पारिस्थितिकी में एकीकरण होना चाहिए, किंतु व्यवहार में फैसले लेने, जटिलताओं को सुलझाने और टकरावों को टालने का कौशल दिखाना पड़ता है। विकास और पर्यावरण में संतुलन के लिए बेहद समझदारी और संवेदनशीलता की जरूरत होती है। भारत के लिए घरेलू और अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर प्रबुद्ध और राजनीतिक नेतृत्व का प्रदर्शन करना होगा।
(लेखक पूर्व पर्यावरण मंत्री हैं)
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