सोमवार, 10 नवंबर 2014

08 November 2014(Saturday)

08 November 2014(Saturday)
1.खतरों से निपटने में सहयोग करेंगे भारत व इस्रइल:- नियंतण्र आतंकवाद के बढ़ते खतरों को रेखांकित करते हुए भारत और इस्रइल ने इससे निपटने और साइबर सुरक्षा के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने का संकल्प किया है। इस्रइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के साथ बृहस्पतिवार रात अपनी मुलाकात में केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने क्षेत्रीय स्थिति पर और आतंक के कारण नियंतण्र समुदाय के समक्ष उभर रहे खतरों पर र्चचा की। बैठक के बाद जारी आधिकारिक बयान में बताया गया ‘गृहमंत्री ने कहा कि आतंकवाद न सिर्फ भारत और इस्रइल जैसे देशों के लिए, बल्कि पूरी दुनिया के लिए खतरा है। उन्होंने इस क्षेत्र में मौजूदा सहयोग और भावी संभावनाओं की समीक्षा की।’ सिंह ने रक्षा और कृषि समेत अनेक क्षेत्रों में द्विपक्षीय रिश्तों में वृद्धि पर संतोष प्रकट किया। उन्होंने क्षमता निर्माण और प्रशिक्षण के महत्व पर जोर दिया और कहा कि भविष्य में ज्ञान पर आधारित दो अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं के बीच हाईटेक साझेदारी स्थापित करने पर हमारा जोर होना चाहिए। सिंह और नेतन्याहू दोनों इस पर सहमत थे कि मुक्त व्यापार संधि पर दोनों पक्षों को जल्द ही दस्तखत कर देने चाहिए। मोनाको में इंटरपोल महासभा में भागीदारी करके आए सिंह ने बताया कि उन्होंने इस्रइली प्रधानमंत्री के साथ एक घंटे तक चली बातचीत में साइबर सुरक्षा के क्षेत्र में सहयोग का मुद्दा भी पूरी मुखरता से उठाया। सिंह ने जेहादी तत्वों द्वारा अपने विचारों के प्रसार के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल किए जाने के मुद्दे को प्रमुखता से उठायाा। दोनों ही नेताओं ने आपसी संबंधों को मजबूत करने की अपने-अपने देशों की उत्सुकता को भी जाहिर किया। नेतन्याहू ने जोर देकर कहा कि सितम्बर में न्यूयार्क में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ मुलाकात के बाद उनका मानना है कि ‘दोनों देशों के बीच के संबंध त्वरित विकास के लिए तैयार हैं।’ उस मुलाकात में इस्रइली प्रधानमंत्री ने कहा था कि दोनों देशों के बीच सहयोग की अपार संभावनाएं हैं। सिंह ने कहा ‘भारत और इस्रइल के बीच बेहद गर्मजोशी एवं सौहार्द से परिपूर्ण द्विपक्षीय संबंध हैं। हम इन्हें और अधिक प्रगाढ़ करेंगे।’ भारतीय गृहमंत्री ने बृहस्पतिवार को सुरक्षा स्थिति का जायजा लेने के लिए पहले जॉर्डन वैली और इस्रइल के उत्तरी एवं दक्षिणी क्षेत्र का हेलीकॉप्टर से दौरा किया। इस दौरान सिंह के साथ इस्रइली प्रधानमंत्री के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार योसी कोहेन भी थे। कोहेन ने हाल ही में सिंह से नई दिल्ली में मुलाकात की थी और दोनों देशों के समक्ष मौजूद ‘साझा चुनौतियों’ एवं उनके समाधान पर र्चचा की थी। दोनों ने ही ‘सभी स्तरों पर सभी क्षेत्रों में आपसी सहयोग को विस्तार देने की इच्छा जाहिर की थी।’ सिंह ने बृहस्पतिवार शाम इसाइल के जन सुरक्षा मंत्री वाई अहारानोविच से भी मुलाकात की।
2. भारत व भूटान की सुरक्षा ‘गहराई से जुड़ी’ है : प्रणब:- राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के थिम्पू दौरे पर भारत ने शुक्रवार को कहा कि भूटान और उसकी सुरक्षा ‘एक दूसरे से गहराई से जुड़ी’ है तथा एक दूसरे की चिंताओं को लेकर संवेदनशील रहना दोनों पड़ोसियों के लिए महत्वपूर्ण है। मुखर्जी ने यहां भूटानी नेतृत्व के साथ व्यापक र्चचा की। भूटान नरेश तथा उनकी पत्नी ने प्रोटोकाल से हटकर हवाई अड्डे पर जाकर राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की अगवानी की जो दो दिवसीय यात्रा पर शुक्रवार को यहां पहुंचे हैं। इसके बाद राष्ट्रपति मुखर्जी सड़क मार्ग से करीब 50 किलोमीटर की दूरी तय कर थिम्पू पहुंचे जहां रास्ते में सैकड़ों स्कूली बच्चे मार्ग के दोनों ओर हाथों में भारतीय और भूटानी राष्ट्रीय ध्वज लिए खड़े थे। राष्ट्रपति मुखर्जी और भूटान नरेश जिग्मे ने द्विपक्षीय वार्ता की और फिर उन्होंने प्रधानमंत्री शेरिंग तोबगे से मुलाकात की। भूटान नरेश के साथ मुलाकात के बाद राष्ट्रपति के प्रेस सचिव वेणु राजमणि ने कहा ‘उन्होंने द्विपक्षीय संबंध के संपूर्ण पहलू पर बात की। राष्ट्रपति ने कहा कि दोनों के बीच एक दूसरे की चिंताओं और संवेदनशीलता को लेकर स्पष्ट समझ है।’ राष्ट्रपति ने साल 2003 में भूटान से चरमपंथियों का सफाया करने के लिए चलाए गए अभियान में चौथे नरेश के नेतृत्व में भूटान की ओर से निभाई गई भूमिका को याद किया और कहा कि यह कदम सभी दक्षेस देशों के लिए एक मिसाल होना चाहिए।
3. भारत की ‘एक्ट ईस्ट’ नीति का अमेरिका ने स्वागत किया:- भारत की ‘एक्ट ईस्ट’ नीति का स्वागत करते हुए अमेरिका ने शुक्रवार को कहा कि वह एशिया प्रशांत क्षेत्र में भारत की अधिक भूमिका के प्रति आशावान है। अमेरिका सरकार के आला अधिकारी ने अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की चीन, म्यांमार और ऑस्ट्रेलिया की तीन देशों की एशिया-प्रशांत यात्रा से पहले कहा ‘हम लुक ईस्ट नीति से अवगत हैं, लेकिन हम इस नई बदली ‘ऐक्ट ईस्ट’ नीति का गरमजोशी से स्वागत करते हैं।’ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इसी माह बहुपक्षीय शिखर बैठकों में हिस्सा लेने म्यांमार और ऑस्ट्रेलिया जाएंगे। अधिकारी ने कहा ‘हम प्रधानमंत्री मोदी के चुनाव का बहुत स्वागत कर रहे हैं। यह एक रिश्ता है जिसमें हम निवेश कर रहे हैं। हमने वाशिंगटन में उनकी यात्रा देखी और हम एशिया प्रशांत क्षेत्र में भारत के स्वागत के प्रति आशान्वित हैं।’ अमेरिकी अधिकारी ने कहा ‘ओबामा सरकार के लिए एशिया-प्रशांत प्राथमिकता है।’
4. सुप्रीम कोर्ट का फैसला: जाति आधारित जनगणना नहीं:- सुप्रीम कोर्ट ने जाति आधारित जनगणना कराने का मद्रास हाईकोर्ट का आदेश यह कहते हुए निरस्त कर दिया कि यह सरकार का नीतिगत मामला है। कोर्ट नीतिगत मामलो में तभी दखल दे सकता है जब सरकार की नीति को चुनौती दी गई हो और वह नीति संविधान या कानून विरोधी हो। न्यायमूर्ति न्यायमूर्ति दीपक मिश्र की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने जनगणना आयुक्त की याचिका स्वीकारते हुए शुक्रवार को यह फैसला दिया। सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट का 24 अक्टूबर 2008 और 12 मई 2010 के दिए आदेश निरस्त कर दिए जिनमें जनगणना विभाग को जाति आधारित जनगणना का आदेश दिया गया था। शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ केंद्र की दलील स्वीकार करते हुए कहा, जनगणना कैसे कराई जाए यह सरकार का नीतिगत मामला है। कानून में केंद्र सरकार को अधिकार दिया गया है कि वह अधिसूचना जारी कर जनगणना के तौर तरीके तय करे। सरकार ने अधिसूचना जारी कर नियम तय कर रखे हैं, जिसके मुताबिक जनगणना करते समय कई सूचनाएं एकत्र की जाती हैं इसमें अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) की सूचना भी शामिल है, लेकिन किसी जाति की सूचना एकत्र करना शामिल नहीं है। ऐसी स्थिति में हाईकोर्ट सरकार को जाति आधारित जनगणना का आदेश देने का हक नहीं है। हाईकोर्ट ने आदेश पारित करके न्यायिक समीक्षा के क्षोत्रधिकार का अतिक्रमण किया है। सुप्रीमकोर्ट ने कहा कि कोर्ट कानून की व्याख्या कर सकता है। जरूरत हो वह कानून को असंवैधानिक घोषित करने का भी हक रखता है, लेकिन कोर्ट को नीतिगत मामलों में दखल नहीं देना चाहिए। न ही आदेश जारी कर सरकारी नीति में कुछ जोड़ना चाहिए। कोर्ट को कार्यपालिका द्वारा तय की गई नीतियों को समझना चाहिए। अगर नीति मनमानी है और संविधान सम्मत नहीं है तो ही उसमें दखल देना चाहिए अन्यथा नहीं। क्या कहा था हाईकोर्ट ने : सामाजिक न्याय के उद्देश्य को प्राप्त करने को सरकार जल्द से जल्द समयबद्ध ढंग से जाति आधारित जनगणना कराए। 1931 के बाद कभी जाति आधारित जनगणना नहीं हुई है, जबकि एससी-एसटी और ओबीसी की जनसंख्या कई गुना बढ़ी है। ऐसे में सरकार कमजोर वर्ग के हितों के मद्देनजर जाति आधारित जनगणना करा कर 1931 की जनगणना के आधार पर तय किया गया आरक्षण का फीसद उसी हिसाब से बढ़ाना चाहिए। क्या था 1931 की जनगणना में : 1931 में देश की आबादी 35 करोड़ 30 लाख थी, जिसमें ओबीसी की आबादी करीब 52 फीसद थी। 1941 में भी जाति आधारित जनगणना हुई थी
5. भूमि अधिग्रहण कानून में बड़े बदलाव को सरकार तैयार:- देश को फिर से तेज आर्थिक विकास की राह पर ले जाने की मोदी सरकार की मंशा की राह में सबसे बड़ी अड़चन पूर्व की संप्रग सरकार की भूमि अधिग्रहण नीति ने पैदा की है। राजग सरकार को इस बात का एहसास हो गया है कि पीएम नरेंद्र मोदी की महत्वाकांक्षी ‘मेक इन इंडिया’ कार्यक्रम की सफलता से लेकर देश के हर नागरिक को आवास देने की योजना को इस कानून के रहते परवान नहीं चढ़ाया जा सकता। लिहाजा संप्रग सरकार के नए भूमि अधिग्रहण कानून में कुछ अहम बदलाव की तैयारी है। हालांकि, इस बात को सुनिश्चित किया जाएगा कि किसानों के हितों के साथ कोई समझौता नहीं हो। वित्त मंत्रलय के सूत्रों के मुताबिक सरकार को इस बात का एहसास हो गया है कि देश में निवेश लायक माहौल बनाने की कोई भी कोशिश जमीन अधिग्रहण कानून को बदले बिना संभव नहीं है। इन कानून में बदलाव न सिर्फ निर्माण क्षेत्र को विस्तार देने के लिए जरूरी है बल्कि हर व्यक्ति को आवास देने और रक्षा उत्पादन में देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए भी यह करना पड़ेगा। सरकार ने हाल ही में रद कोयला ब्लॉकों की नए सिरे से नीलामी करने का फैसला किया है, इसकी सफलता भी बहुत हद तक भूमि अधिग्रहण कानून में बदलाव से जुड़ी हुई है। मोदी सरकार देश में नए औद्योगिक क्लस्टर बनाने को लेकर एक नीति लाने की तैयारी में है, इसके लिए भी अधिग्रहण कानून में बदलाव चाहिए। उन्होंने बताया था कि रक्षा परियोजनाओं के लिए भी अब जमीन अधिग्रहीत करना आसान नहीं रह गया है। वित्त मंत्रलय के वरिष्ठ सूत्रों के मुताबिक पूर्व सरकार ने जो कानून तैयार किया है वह चुनाव जीतने के लिए तैयार किया था। अब जबकि संप्रग चुनाव हार चुका है इसलिए यह भी साफ है कि जनता ने कानून के प्रस्तावों को स्वीकार नहीं किया है। यह भी एक वजह है कि नई सरकार इस कानून में नए सिरे से बदलाव करेगी। बदलाव किस तरह से होगा इसका खाका तैयार करने की जिम्मेदारी वित्त मंत्री को दी गई है।
6. ओईसीडी ने विकास दर का अनुमान घटाया:- यूरोप के आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (ओईसीडी) ने नियंतण्र अर्थव्यवस्था में धीमी सुधार प्रक्रिया के मद्देनजर चालू वर्ष में भारत के विकास अनुमान को 5.7 फीसद से कम कर 5.4 फीसद कर दिया है। ओईसीडी ने हालांकि सितम्बर में जारी अपनी रिपोर्ट में भारत के विकास दर के 5.7 प्रतिशत पर रहने का अनुमान जताया था। उसने अपनी नई रिपोर्ट में कहा है कि भारत में विकास में तेजी आई है क्योंकि निवेश बढ़ रहा है। इसके बल पर देश की विकास दर वर्ष 2014 के 5.4 प्रतिशत से बढकर वर्ष 2015 में 6.4 प्रतिशत और उसके अगले वर्ष 6.6 प्रतिशत पर पहुंच सकती है। ओईसीडी के महासचिव एजेंल गुरमा ने कहा कि पिछले कुछ महीने में भारत में कारोबार के अनुकूल कई उपाय किए गए हैं। उन्होंने कहा कि भारत में विकास में तेजी आ रही है। चालू वर्ष की अप्रैल जून तिमाही में विकास दर 5.7 प्रतिशत पर पहुंच गई जबकि पिछले वर्ष की इसी अवधि में यह 4.7 प्रतिशत रही थी। सरकार ने चालू वित्त वर्ष में विकास दर 5.4 से 5.9 प्रतिशत के बीच रहने का अनुमान लगाया है। वर्ष 2012-13 और 2013-14 में लगातार दो वर्षों तक विकास दर पांच प्रतिशत से नीचे रही है।
7. जलवायु परिवर्तन पर भारत-चीन में खटपट:- जलवायु परिवर्तन को लेकर भारत और चीन के गठबंधन टूट सकता है। जी-20 में खास तवज्जो देने के कारण भारत अलग रुख ले सकता है। इससे चीन वेचैन है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी-20 की बैठक में हिस्सा लेने ब्रिस्बेन जा रहे हैं। यह विकसित देशों का मजबूत समूह है, जो औद्योगिक प्रौद्योगिकी विकासशील देशों को बेचता है। विकसित देश धरती का तापमान बढ़ाने वाली गैसों का उत्सर्जन करते हैं। उनमें बहुत से देश, जिनमें अमेरिका भी शामिल है, प्रोटोकॉल नहीं मानते हैं। उनका तर्क है कि यदि उन्होंने अपने देश में कार्बन गैसों को उत्सर्जन कम कर दिया तो उनका विकास दर घट जाएगी। उनका यह भी तर्क है कि कार्बन गैसों का उत्सर्जन प्रति व्यक्ति आय के हिसाब से कम होना चाहिए। आबादी के हिसाब भारत और चीन ज्यादा प्रभावित होंगे। चीन दुनिया की 17 फीसद गैसों को उत्सर्जन करता है, जबकि भारत केवल 7 फीसद। जलवायु परितर्वन पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (यूएनएफसीसीसी) की बैठक दिसम्बर में पेरू के लीमा में होनी है। बैठक में अभी से सभी देश अपनी स्थिति स्पष्ट कर रहे हैं। अभी तक चीन, भारत, ब्राजील समेत विकासशील देश और अल्पविकसित देश को एक ग्रुप है जो गैसों में कटौती का विरोध करता है। उनका तर्क है कि अभी उन्हें विकसित देशों की बराबरी करने में कई बरस लगेंगे, इसलिए वे गरीबी मिटने तक कार्बन गैसों को उत्सर्जन कम नहीं कर सकते। यह बात अलग है कि भारत ने स्वयं से अपने हिस्से के गैसों के उत्सर्जन में 25 प्रतिशत तक कटौती करने की घोषणा की हुई है। इस बार संभव है कि भारत चीन के साथ खड़ा न हो। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सलाहकार सुरेश प्रभु ने भी वकालत की है कि भारत को अपना अलग रुख रखना चाहिए। पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री प्रकाश जावड़ेकर का कहना है कि आगामी दो सप्ताह के भीतर भारत सरकार अपना एजेंडा और रुख तय कर लेगा। जी-20 में तवज्जो देने के कारण अलग रुख ले सकता है भारत
8. एंटी बायोटिक का विकल्प खोजा:- हालैंड के वैज्ञानिकों ने घोषणा की है कि उन्होंने एंटीबायोटिक का विकल्प ढूंढ लिया है। यह नई दवाई कीटाणुओं से सुरक्षा उपलब्ध कराएगी तथा आज की एंटीबायोटिक दवाई का काम करेगी। दवा का परीक्षण : रोगियों पर किए गए इस दवा के परीक्षणों ने दिखाया कि वे कुछ ऐसे संक्रामक रोगों को दूर करने में भी कामयाब हुए, जिनसे मौत हो जाती है। लंदन में हुए एक वैज्ञानिक सम्मेलन में इस दवा की खोज के बारे में बताया गया है। पिछले साल अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ दल ने यह चेतावनी दी थी कि वे कीटाणु जो एंटीबायटिक से भी नहीं मरते, आज के मनुष्य के स्वास्थ्य के लिए एक प्रमुख खतरा हैं। एंजाइम खोजा : वैज्ञानिक यह मानते हैं कि कीटाणु नई दवा के आदी नहीं होंगे। दच वैज्ञानिकों ने एक ऐसा एंजाइम खोज निकाला है, जिसका इस्तेमाल वायरस कीटाणुओं की कोशिकाओं को नष्ट करने के लिए करते हैं। यह एंजाइन अभी त्वचा संबंधी संक्रामक रोगों को दूर करने वाली एक क्रीम के रूप में उपलब्ध है। वैज्ञानिक उसे अब पॉउडर या टिकिया के रूप में या टीके के रूप में उपलब्ध कराएंगे।
9. कीथ को ‘लेबर एमपी ऑफ द ईयर’ अवार्ड:- देश के वंचितों और अल्पसंख्यक वर्गो की खातिर उल्लेखनीय कार्य करने के लिए भारतीय मूल के ब्रिटिश राजनीतिज्ञ कीथ वाज को ‘वर्ष 2014 का लेबर सांसद’ (लेबर एमपी ऑफ द ईयर) चुना गया है। वाज ने कहा ‘इस अवार्ड के लिए चुने जाने के बाद मैं खुद को सम्मानित महसूस कर रहा हूं।

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