विदेशी धरती पर देश की आजादी की गूंज
(शैलेन्द्र चौहान)
सन 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की विफलता के बाद में ब्रिटिश सरकार ने भारत में एक ओर सत्ता पर सीधा नियंतण्रकर दूसरी ओर औपनिवेशिक व्यवस्था शुरू की। ब्रिटेन में क्योंकि लोकतांत्रिक व्यवस्था थी, इसलिए म्युनिसपैलिटी आदि संस्थाओं का निर्माण भी यहां किया गया लेकिन भारत का आर्थिक दोहन अधिक से अधिक हो, इसलिए यहां के देशी उद्योगों को नष्ट कर कच्चा माल इंग्लैंड भेजा जाना शुरू हुआ। पूरे देश में रेलवे का जाल बिछने लगा। ब्रिटश सरकार ने भारत के सामंतों को सहयोगी बना किसानों का भयानक उत्पीड़न शुरू किया। नतीजतन 19वीं सदी के अंत तक देश के अनेक भागों में छिटपुट विद्रोह होने लगे। महाराष्ट्र और बंगाल तो इसके केंद्र बने ही, पंजाब में भी किसानों की दशा खराब होने लगी। परिणामत: बीसवीं सदी के आरंभ में मजदूरी की तलाश में पंजाब के किसान कनाडा, अमेरिका की ओर जाने लगे। मध्यवर्गीय छात्र भी शिक्षा-प्राप्ति हेतु इंग्लैंड, अमेरिका व यूरोपीय देशों के लिए निकल पड़े। कनाडा और अमेरिका पहुंचे पढ़े-लिखे भारतीयों ने शीघ्र ही वहां से भारतीय स्वतंत्रता की मांग उठाने वाली पत्र-पत्रिकाएं निकालनी शुरू कीं। तारकनाथ दास ने पहले कनाडा और बाद में अमेरिका से ‘फ्री हिंदुस्तान’ पत्र निकाला। गुरु दत्त कुमार ने कनाडा में ‘यूनाइटेड इंडिया लीग’ बनाई और ‘स्वदेश सेवक’ पत्रिका निकाली। कनाडा और अमेरिका के अतिरिक्त इंग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी, जापान व अन्य अनेक देशों में पहुंचे भारतीयों ने स्वतंत्रता की अलख जगाई। भारत से बाहर भारतीय स्वतंत्रता के लिए आंदोलन करने वाले भारतीयों में सबसे पहला चर्चित नाम श्यामजी कृष्ण वर्मा का है, जिन्होंने पहले इंग्लैंड और बाद में पेरिस से स्वतंत्रता का बिगुल बजाया। इंग्लैंड से शुरू हुआ ‘इंडियन सोशोलॉजिस्ट’ अंग्रेजों की कोपदृष्टि का शिकार होकर पेरिस पहुंचा और वहां से भारत और दूसरी जगहों पर पहुंचता रहा। पेरिस में श्यामजी कृष्ण वर्मा के साथ-साथ सरदार सिंह राणा और मैडम भीकाजी कामा बहुत सक्रिय रहीं। 1907 के स्टुगार्ड में हुए समाजवादी सम्मेलन में भीकाजी कामा ने पहली बार भारत का झंडा फहराया। जर्मनी में वीरेन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय, (जो ‘चट्टो’ नाम से चर्चित थे) और चंपक रमण पिल्लै सक्रिय थे। इन्हीं के साथ स्वामी विवेकानंद के छोटे भाई डॉ. भूपेन्द्रनाथ दत्त भी सक्रिय रहे। पंजाब से पहुंचे मदनलाल ढींगरा ने 1909 में कर्जन वायली की हत्या कर दी, जिस कारण उन्हें डेढ़ महीने के भीतर लंदन में फांसी दे दी गई। भारत से बाहर भारत की आजादी के लिए फांसी पर चढ़ने वाले शायद वह पहले भारतीय थे। 31 साल बाद उधम सिंह ने जलियांवाला बाग के खलनायक की हत्या कर 1940 में लंदन में शहादत पाई। इस बीच ईरान में सूफी अंबा प्रसाद व कनाडा में भाई मेवा सिंह शहीद हुए। भारत से अमेरिका गए भारतीय, जिनमें ज्यादातर पंजाबी थे, प्राय: पश्चिमी तट के नगरों में रहते हुए काम की तलाश करते थे। इन शहरों में पोर्टलैंड, सेंट जॉन, एस्टोरिया, एवरेट आदि शामिल थे, जहां लकड़ी के कारखानों व रेलवे वर्कशॉपों में काम करने वाले भारतीय बीस-बीस, तीस-तीस की टोलियों में रहते थे। कनाडा व अमेरिका में नस्लवादी रवैये से भारतीय मजदूर बहुत दुखी थे। भारतीयों के साथ इस भेदभावपूर्ण व्यवहार के विरुद्ध कनाडा में संत तेजा सिंह संघर्ष कर रहे थे तो अमेरिका में ज्वाला सिंह ठट्ठीआं संघर्षरत थे। इन्होंने भारत से विद्यार्थियों को पढ़ाई के लिए अमेरिका बुलाने के लिए अपनी जेब से छात्रवृत्ति दी। दसवीं पास करने के उपरांत कर्तार सिंह सराभा (जन्म: 24 मई 1896 - फांसी: 16 नवम्बर 1915) के परिवार ने उन्हें उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका भेजा। एक जनवरी 1912 को सराभा अमेरिका पहुंच गये। उस समय उनकी आयु पंद्रह वर्ष से कुछ महीने अधिक थी। इस उम्र में सराभा ने उड़ीसा के रेवनशा कॉलेज से ग्यारहवीं की परीक्षा पास कर ली थी। अमेरिका-प्रवास के आरंभिक दिनों में सराभा अपने गांव के रुलिया सिंह के पास रहे जो 1908 से यहां थे। सराभा भारत को अंग्रेजों की दासता से मुक्त करने के लिए अमेरिका में बनी गदर पार्टी के अध्यक्ष थे। भारत में क्रान्ति की योजना के आरोप में 16 नवम्बर 1915 को अंग्रेजी सरकार ने कई लोगों के साथ कर्तार को फांसी दे दी। कर्तार फांसी के वक्त मात्र साढ़े उन्नीस वर्ष के थे। 1912 के आरंभ में पोर्टलैंड में भारतीय मजदूरों का एक बड़ा सम्मेलन हुआ, जिसमें बाबा सोहन सिंह भकना, हरनाम सिंह टुंडीलाट, काशीराम आदि ने हिस्सा लिया। ये सभी बाद में गदर पार्टी के महत्त्वपूर्ण नेता बन कर उभरे। इस समय कर्तार सिंह की भेंट ज्वाला सिंह ठट्ठीआं से हुई, जिन्होंने उन्हें बर्कले विविद्यालय में दाखिला लेने के लिए प्रेरित किया, जहां सराभा रसायन शास्त्र के विद्यार्थी बने। बर्कले विविद्यालय में कर्तार सिंह पंजाबी होस्टल में रहने लगे। बर्कले विविद्यालय में उस समय करीब तीस विद्यार्थी पढ़ रहे थे, जिनमें ज्यादातर पंजाबी व बंगाली थे। ये विद्यार्थी दिसम्बर, 1912 में लाला हरदयाल के संपर्क में आए, जो उन्हें भाषण देने गए थे। लाला हरदयाल ने विद्यार्थियों के सामने भारत की गुलामी के संबंध में काफी जोशीला भाषण दिया। लाला हरदयाल और भाई परमानंद ने भारतीय विद्यार्थियों के दिलों में ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार के खिलाफ भावनाएं भड़काने में बड़ी भूमिका निभाई। भाई परमानंद बाद में भी सराभा के संपर्क में रहे। इससे धीरे-धीरे सराभा के मन में देशभक्ति की भावना इतनी तीव्र हुई कि वह देश के लिए मर-मिटने का संकल्प ले बैठे। भारत पर काबिज ब्रिटिश उपनिवेशवाद के खिलाफ सराभा और उनके क्रान्तिकारी साथियों ने अमेरिका में 19 फरवरी 1915 को ‘गदर’ आंदोलन की शुरुआत की। इस ‘गदर’ यानी स्वतंत्रता संग्राम की योजना अमेरिका में 1913 में अस्तित्व में आई ‘गदर पार्टी’ ने बनाई थी। इसके लिए लगभग आठ हजार भारतीय अमेरिका और कनाडा जैसे देशों में सुख-सुविधाओं भरी जिंदगी छोड़ भारत को आजाद कराने के लिए समुद्री जहाजों से भारत पहुंचे थे। ‘गदर’ आंदोलन शांतिपूर्ण नहीं बल्कि सशस्त्र विद्रोह था। ‘गदर पार्टी’ ने इसकी खुलेआम घोषणा की थी। गदर पार्टी का पत्र ‘गदर’, जो पंजाबी, हिंदी, उर्दू व गुजराती चार भाषाओं में निकलता था- के माध्यम से समूची भारतीय जनता से क्रांति का आह्वान किया गया था। अमेरिका से प्रेरित हो अपनी धरती को स्वतंत्र कराने का यह शानदार आह्वान 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से प्रेरित था और ब्रिटिश उपनिवेशवाद ने जिसे अवमानना से ‘गदर’
नाम दिया, उसी शब्द को सम्मानजनक रूप देने के लिए अमेरिका में बसे भारतीय देशभक्तों ने अपनी पार्टी और उसके मुखपत्र को ‘गदर’ नाम से विभूषित किया। जैसे 1857 के ‘गदर’ यानी प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की कहानी बड़ी रोमांचक है, वैसे ही स्वतंत्रता के लिए दूसरा सशस्त्र संग्राम यानी ‘गदर’ चाहे असफल रहा, पर इसकी कहानी भी कम रोचक नहीं है। विश्व स्तर पर चले इस आंदोलन में दो सौ से ज्यादा लोग शहीद हुए। ‘गदर’ व अन्य घटनाओं में 315 से ज्यादा ने अंडमान जैसी जगहों पर काले पानी की उम्रकैद भुगती और 122 ने कुछ कम लंबी कैद भुगती। सैकड़ों पंजाबियों को गांवों में वर्षो तक नजरबंदी झेलनी पड़ी। उस आंदोलन में बंगाल से रास बिहारी बोस व शचीन्द्रनाथ सान्याल, महाराष्ट्र से विष्णु गणोश पिंगले व डॉ. खानखोजे, दक्षिण भारत से डॉ. चेन्चय्या व चंपक रमण पिल्लै तथा भोपाल से बरकतुल्ला आदि ने हिस्सा ले उसे एक ओर राष्ट्रीय रूप दिया तो शंघाई, मनीला, सिंगापुर आदि अनेक विदेशी नगरों में हुए विद्रोह ने इसे अंतरराष्ट्रीय रूप दिया। 1857 की ही भांति ‘गदर आंदोलन’ में भी सभी धर्मों व समुदायों के लोग शामिल थे। 16 नवम्बर 1915 को साढ़े उन्नीस साल के कर्तार सिंह सराभा को उनके छह साथियों-बख्शीश सिंह, (अमृतसर), हरनाम सिंह, (स्यालकोट), जगत सिंह, (लाहौर), सुरैण सिंह व सुरैण (दोनों अमृतसर) व विष्णु गणोश पिंगले, (पूना- महाराष्ट्र) के साथ लाहौर जेल में फांसी पर चढ़ा दिया गया। कर्तार सिंह सराभा ने अपने दो-तीन साल के आंदोलनकारी दौर में अपने प्रखर व्यक्तित्व से युवाओं के मन मस्तिष्क को देशभक्ति के रंग में सराबोर कर दिया। ऐसे वीर नायक को फांसी देने से न्यायाधीश भी बचना चाहते थे, इसलिए उन्हें अदालत में अपना बयान हल्का करने का मशविरा और वक्त दिया गया लेकिन नवयुवकों के लिए प्रेरणास्त्रोत बनने वाले सराभा बयान हल्का करने की बजाय और सख्त करते हुए हंसते हुए फांसी पर झूल गये। गदर पार्टी आंदोलन की असफलता से गदर पार्टी समाप्त नहीं हुई, बल्कि इसने अपना अंतरराष्ट्रीय अस्तित्व बचाए रखा। भारत में कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल होकर व विदेशों में अलग अस्तित्व बनाए रखकर गदर पार्टी ने भारत के स्वाधीनता संग्राम में महत्त्वपूर्ण योगदान किया। आगे चलकर 1925-26 से पंजाब का युवक विद्रोह, जिसके लोकप्रिय नायक भगत सिंह बने, भी गदर पार्टी व कर्तार सिंह सराभा से प्रभावित रहा।
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