सोमवार, 10 नवंबर 2014

सरकार को नई धार

सरकार को नई धार
(नीरजा चौधरी)
मोदी सरकार के पहले विस्तार पर देश की निगाहें लगी होना स्वाभाविक ही था। इस विस्तार का पहला और सबसे बड़ा संदेश यही है कि एक लंबे अर्से बाद अपने मंत्रियों के चयन में प्रधानमंत्री का विशेषाधिकार स्थापित हुआ। एक दिन पहले तक शिवसेना के नेता रहे सुरेश प्रभु को हर हाल में कैबिनेट मंत्री के रूप में मंत्रिमंडल में शामिल करने का निर्णय यही बता रहा है कि प्रधानमंत्री अपनी टीम बनाने के अपने अधिकार को खोना नहीं चाहते हैं। मोदी के इस फैसले ने इस पर नए सिरे से मुहर लगा दी कि सरकार पर उनका पूरा नियंत्रण है। राजनीतिक परिस्थितियां कैसी भी हों, वह जिसे चाहते हैं उसे अपनी टीम में ले सकते हैं। यह वही प्रधानमंत्री कर सकता है जिसके पास राजनीतिक ताकत हो। गठबंधन सरकारों के युग में प्रधानमंत्री का अपनी टीम बनाने का अधिकार एक तरह से छिन गया था। गठबंधन के सहयोगी अपनी ओर से मंत्रियों के नाम दे देते थे, जिन्हें शपथ दिला दी जाती थी, लेकिन अब शायद समय बदल गया है। गठबंधन सरकारों की ही बात क्यों करें, इतिहास में यह भी दर्ज है कि नरसिंह राव के समय किस तरह एक ही दिन में तीन बार मंत्रियों की सूची राष्ट्रपति भवन भेजी गई थी। ऐसा इसीलिए हुआ था, क्योंकि राजनीतिक दबाव में मंत्रियों के नाम तय नहीं हो पा रहे थे। ऐसा ही वाकया वीपी सिंह सरकार के समय भी हो चुका है, जब एक वरिष्ठ राजनेता शपथ समारोह के लिए जाते हुए राष्ट्रपति भवन की सीढ़ियों से लौट आए थे, क्योंकि उन्हें राज्यमंत्री बनाया जा रहा था। मौजूदा माहौल में मोदी सरकार में ऐसा होने की कहीं कोई संभावना नहीं है।
शिवसेना के अलग रुख के बावजूद सुरेश प्रभु को कैबिनेट मंत्री बनाने का मोदी का फैसला अकारण नहीं है। साफ-सुथरी छवि के सुरेश प्रभु का पूर्व केंद्रीय मंत्री के रूप में शानदार रिकार्ड रहा है। जल संसाधन से लेकर पर्यावरण और ऊर्जा मंत्रलय में वह अपनी काबिलियत साबित कर चुके हैं। सुरेश प्रभु की तरह गोवा के मुख्यमंत्री रहे मनोहर पार्रिकर को भी प्रधानमंत्री ने अपनी पसंद के रूप में कैबिनेट मंत्री बनाया है। पार्रिकर न केवल अपनी सादगी और साफ-सुथरी छवि के लिए जाने जाते हैं, बल्कि उनके प्रशासनिक कौशल की भी मिसाल दी जाती है। इन दोनों के अलावा हरियाणा के चौधरी बीरेंद्र सिंह को वादे के मुताबिक केंद्रीय मंत्री बनाया गया है और एक समय भाजपा अध्यक्ष पद के दावेदार माने जा रहे जेपी नड्डा भी प्रधानमंत्री की पसंद के रूप में कैबिनेट में जगह बनाने में सफल रहे।
इस मंत्रिमंडल विस्तार की एक अन्य महत्वपूर्ण बात राज्यों की राजनीति पर ध्यान रखने के साथ दलित समुदाय को अपने साथ जोड़ने के लिए की गई विशेष पहल भी है। इस विस्तार में अनुसूचित जाति-जनजाति का प्रतिनिधित्व सबसे ज्यादा है। पंजाब से जिन विजय सांपला को मंत्रिमंडल में जगह दी गई है वह उस होशियारपुर से आते हैं जो बसपा के संस्थापक कांशीराम का गढ़ रहा है। कुछ समीकरणों की बात अलग है, लेकिन इतना स्पष्ट है कि प्रधानमंत्री ने सुशासन को सबसे अधिक महत्व दिया है। वह अब अपने मंत्रियों से प्रदर्शन और परिणाम चाहते हैं। इसमें कुछ भी अनुचित नहीं कि केंद्र सरकार का नेतृत्व करने वाला दल राज्यों के आगामी विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व तय करे, लेकिन उसकी सर्वोच्च प्राथमिकता सुशासन ही होनी चाहिए। पश्चिम बंगाल से आए बाबुल सुप्रियो और राजस्थान के राज्यवर्धन सिंह राठौर भी नए मंत्री के रूप में अच्छा काम कर सकते हैं। मोदी ने एक नई परंपरा शुरू की है और यह है मंत्री बनाने के पहले संबंधित लोगों को व्यक्तिगत रूप से फोन कर उन्हें उनकी भावी भूमिका की जानकारी देना। इससे यह पता चलता है कि वह अपने दृष्टिकोण को लेकर कितने स्पष्ट हैं।
यह सही है कि मोदी सरकार के विस्तार ने शिवसेना और भाजपा के तल्ख हो चुके रिश्तों को एक ऐसे मोड़ पर ला खड़ा कर दिया है जब इन दो पुराने सहयोगियों के बीच हर तरह का संबंध टूटने वाला है। इस स्थिति के लिए चाहे जो पक्ष उत्तरदायी हो, लेकिन कुल मिलाकर नुकसान कई स्तरों पर होना तय है। जैसी परिस्थितियां बनीं उनसे यह संकेत मिलता है कि भाजपा अब महाराष्ट्र में पूरी तरह अकेले चलना चाह रही है और शिवसेना के साथ संबंधों के मामले में अपनी शर्तो को तनिक भी ढीला नहीं करना चाहती है। इसका एक कारण शिवसेना का अपना आधार गंवाना भी है। खुद शिवसेना भाजपा के साथ संबंधों पर अलग-अलग रुख दिखाती रही है। उसकी दलील यह है कि भाजपा उसे सरकार में तो शामिल करना चाहती है, लेकिन उस फामरूले पर अमल करने के लिए तैयार नहीं जो खुद उसने तैयार किया था। शिवसेना के अलग-अलग सुर सुरेश प्रभु के केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल होने के संदर्भ में भी सुनाई दिए। अब शिवसेना को अपने आंतरिक संघर्ष से भी जूझना होगा। उसके विधायक तो महाराष्ट्र सरकार में शामिल होना चाहते हैं, लेकिन पार्टी कार्यकर्ताओं की राय है कि भाजपा ने जैसा व्यवहार किया है उसके बाद सरकार में शामिल होने के बजाय विपक्ष में बैठना ज्यादा बेहतर है। यह देखने वाली बात होगी कि शिवसेना इस स्थिति से कैसे निपटती है।
शिवसेना और भाजपा के रिश्तों में जो कुछ हुआ उससे यह साफ पता चलता है कि मोदी राजनीतिक संबंधों और समीकरणों को नए सिरे से परिभाषित करना चाहते हैं। वह इसलिए यह कहीं आसानी से कर सकते हैं, क्योंकि उन्हें सरकार और संगठन, दोनों का तगड़ा समर्थन हासिल है। अब यह अच्छे से स्पष्ट हो रहा है कि शिवसेना और भाजपा के रिश्तों में बिखराव का केवल यही कारण नहीं है कि महाराष्ट्र चुनाव के समय शिवसेना अपनी सहयोगी पार्टी को पर्याप्त सीटें देने के लिए तैयार नहीं थी। इस लड़ाई का केंद्र कहीं और है। शिवसेना ने अपने पत्ते सही तरह नहीं खेले, जबकि भाजपा ने यही काम बिल्कुल सही तरीके से किया। आज शिवसेना के सामने चुनौती कहीं अधिक बड़ी है। उसे बीएमसी चुनावों के लिए अपना स्टैंड तय करना होगा। ये चुनाव ज्यादा दूर नहीं हैं। क्या शिवसेना, विशेषकर उद्धव ठाकरे अपने समूह को एकजुट रख पाएंगे, यह एक बड़ा सवाल है। सवाल यह भी है क्या महाराष्ट्र अनिश्चितता की ओर बढ़ रहा है? भाजपा की अल्पमत सरकार यदि केवल राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के भरोसे रहेगी तो उसकी स्थिरता पर हर वक्त सवालिया निशान बना रहेगा। एक प्रश्न यह है कि नरेंद्र मोदी का पूरा भरोसा रखने वाले महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस क्या वह कीमत अदा कर सकेंगे जो शरद पवार का दल सरकार को समर्थन के बदले चाहेगा? शिवसेना एक स्वाभाविक सहयोगी थी, लेकिन एनसीपी के बारे में यह नहीं कहा जा सकता। अगर महाराष्ट्र में राजनीतिक अस्थिरता उत्पन्न होती है तो इसका असर निवेश पर भी पड़ सकता है, क्योंकि मुंबई को देश की आर्थिक राजधानी भी माना जाता है।
(लेखिका जानी-मानी राजनीतिक विश्लेषक हैं)

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