भारत के रुख पर अमेरिका की मुहर
(प्रमोद भार्गव )
विश्व व्यापार संगठन के विश्व व्यापार सुविधा नियमों में सुधार के सिलसिले में भारत का कठोर रुख सही दिशा में बढ़ाया गया कदम साबित हुआ। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दृढ़ता के चलते व्यापार सुगमता करार (टीएफए) पर अमेरिका ने नरम रुख अपना लिया है। उसने खाद्यान्न भंडारण के मुद्दे पर भारत के प्रस्ताव का समर्थन करने पर सहमति दे दी है। अमेरिका के इस समर्थन से दोनों देशों के बीच करार पर जारी गतिरोध अब खत्म हो जाएगा। इस पहल से विश्व व्यापार संगठन में टीएफए के अमल का रास्ता भी खुल जाएगा। याद रहे कि इसी साल जुलाई में मोदी ने टीएफए के क्रियान्वयन से हाथ खींचकर दुनिया को चौंका दिया था। इस करार की सबसे महत्वपूर्ण शर्त थी कि संगठन का कोई भी सदस्य देश अपने यहां पैदा होने वाले खाद्य पदार्थो के मूल्य का 10 फीसद से ज्यादा अनुदान खाद्य सुरक्षा पर नहीं दे सकता। जबकि भारत में नए खाद्य सुरक्षा कानून के तहत देश की 67 फीसद आबादी खाद्य सुरक्षा के दायरे में आ गई है। इसके लिए बतौर सब्सिडी जिस धनराशि की जरूरत पड़ेगी वह सकल फसल उत्पाद मूल्य के 10 फीसद से कहीं ज्यादा बैठती। इस लिहाज से इस मुद्दे पर मोदी का ‘अंगद के पांव’ की तरह अडिग बने रहना जरूरी था। जेनेवा में भारत पर अमेरिका, यूरोपीय संघ और ऑस्ट्रेलिया का दबाव था कि इन देशों के व्यापारिक हितों के लिए भारत अपने गरीबों के हितों की बलि चढ़ा दे। विकसित देश चाहते थे कि विकासशील देष समुचित व्यापार अनुबंध की सभी शतरे को जस का तस मानें। जबकि इस अनुबंध की खाद्य सुरक्षा संबंधी शर्त भारत के हितों के विपरीत है। दिसम्बर 2013 में भी इन्हीं विषयों को लेकर इंडोनेशिया के बाली शहर में डब्ल्यूटीओ की बैठक हुई थी, तब पूर्व वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री आनंद शर्मा ने भी इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया था। दरअसल, दुनिया के विकासशील देशों की खाद्य सुरक्षा की सब्सिडी को नियंत्रित करने की पृष्ठभूमि में विकसित देश हैं। इसके उलट जी-33 भारत समेत 46 देशों का ऐसा समूह है जो अनाज की सरकारी खरीद और गरीब व वंचित समूह को खाद्य सहायता देने के अधिकार के मुद्दे पर अडिग है। विकसित देश चाहते हैं कि भारत जैसे विकासशील देश अपनी खाद्य सब्सिडी मसलन सार्वजनिक वितरण पण्राली के जरिए दी जाने वाली सरकारी इमदाद को मौजूदा नियमों के दायरे में रखें। यानी सब्सिडी कुल कृषि उत्पाद मूल्य के 10 प्रतिशत के दायरे तक सीमित रहे। इसके लिए विकसित देश अंतरिम शांति उपबंध के तहत चार साल की मोहलत देना चाहते थे। इसके बाद यदि सब्सिडी की सीमा 10 फीसदी के ऊपर निकलती तो इसे टीएफए की शतरे का उल्लंघन माना जाता और शर्त तोड़ने वाले देश पर जुर्माना लगाया जाता। दरअसल, इस सीमा का निर्धारण 1986-88 की अंतरराष्ट्रीय कीमतों के आधार पर किया गया था। इन बीते ढाई दशक में महंगाई ने कई गुना छलांग लगाई है। इसलिए इस सीमा का भी पुनर्निर्धारण जरूरी है। यही वह दौर रहा है जब भूमंडलीय आर्थिक उदारवाद की अवधारणा ने बहुत कम समय में ही यह प्रमाणित कर दिया कि वह उपभोक्तावाद को बढ़ावा देकर अधिकतम मुनाफा बटोरने का उपाय भर है। टीएफए की सब्सिडी संबंधी शर्त, औद्योगिक देशों और उनकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के इसी मुनाफे में और इजाफा करने की दृष्टि से लगाई गई है ताकि लाचार आदमी के आजीविका के संसाधनों को दरकिनार कर उपभोगवादी वस्तुएं खपाई जा सकें। नव- उदारवाद की ऐसी ही एकतरफा व विरोधाभासी नीतियों का नतीजा है कि अमीर और गरीब के बीच खाई लगातार बढ़ती जा रही है। दरअसल, देशी व विदेशी उद्योगपति पूंजी का निवेश दो ही क्षेत्रों में करते हैं, एक उपभोक्तावादी उपकरणों के निर्माण और वितरण में, दूसरे प्राकृतिक संपदा के दोहन में। यही दो क्षेत्र धन उत्सर्जन के अहम स्रेत हैं। उदारवादी अर्थव्यस्था का मूल है कि भूखी आबादी के लिए भोजन के उपाय करने की बजाय, विकासशील देश पूंजी का केंद्रीयकरण एक निश्चित आबादी पर करें जिससे उसकी खरीद क्षमता में निरंतर इजाफा होता रहे। छठा वेतनमान मनमोहन सिंह सरकार ने इसी उदारवादी अर्थव्यस्था के पोषण के लिए लागू किया था। जाहिर है, अंतत: यह व्यवस्था सीमित मध्यवर्ग और उच्चवर्ग को ही पोषित करने वाली है। लिहाजा गरीब देशों की रियायतों से जुड़ी लोक कल्याणकारी योजनाएं डब्ल्यूटीओ की आंखों में खटकती रहती हैं। लेकिन यह पहली मर्तबा है जब नरेंद्र मोदी की चुनौती के चलते अमेरिका की चौधराहट पर अंकुश लगा है। भारत जैसे विकासशील देश अपनी आबादी के कमजोर तबके के लोगों की खाद्य सुरक्षा जैसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए बड़ी मात्रा में समर्थन मूल्य पर अनाज की सरकारी खरीद करते हैं। फिर इसे रियायती दरों पर पीडीएस के जरिए बेचा जाता है। यहां तक कि एक रपए किलो गेहूं और दो रपए किलो चावल जरूरतमंद लोगों को दिए जाते हैं। कुछ राज्य सरकारें तो आयोडीनयुक्त नमक भी लोगों को रियायती दर पर दे रही हैं। ऐसेमें यदि गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन करने वाले व्यक्ति के आजीविका की यह खाद्य सामग्री रियायती दरों पर नहीं मिलेंगी तो भारत समेत अन्य कई देशों की बड़ी आबादी भूख के चलते दम तोड़ देगी। भारत खाद्य सुरक्षा पर दी जाने वाली सब्सिडी को इसलिए नियंत्रित नहीं कर सकता क्योंकि खाद्य सुरक्षा का दायरा बढ़कर कुल आबादी का 67 फीसद हो गया है। इसके तहत करीब 81 करोड़ लोगों को रियायती दर पर अनाज देना है। अभी तक सालाना 85 हजार करोड़ रपए खाद्य सब्सिडी पर दिए जा रहे थे। खाद्य सुरक्षा कानून लागू होने के बाद यह सब्सिडी बढ़कर 1.24 लाख करोड़ रपए हो चुकी है। इसे पूंजीवाद के समर्थक अर्थशास्त्री बड़ा राजकोषीय घाटा मानते हैं। जबकि 2014-15 के अंतरिम बजट में ही औद्योगिक घरानों को लाभ पहुंचाने की दृष्टि से मनमोहन सरकार ने 5.73 लाख करोड़ रपए की छूट दी थी। जबकि भारत का वर्तमान में वित्तीय घाटा 5.25 लाख करोड़ रपए है। जाहिर है, इस घाटे की पूर्ति उद्योग समूहों को दी गई छूट से आसानी से की जा सकती थी, लिहाजा घाटे का रोना फिजूल है। दूसरी तरफ भाजपा ने अपने घोषणा पत्र में फसलों के समर्थन मूल्य में डेढ़ गुना वृद्धि करने की बात कही है। यदि मोदी सरकार इस वादे पर अमल करती है तो स्वाभाविक है, सब्सिडी खर्च और बढ़ेगा। सरकार को इस वादे पर इसलिए अमल करना जरूरी है क्योंकि उसके कहे पर ऐतबार कर लोगों ने उसे जबरदस्त बहुमत दिया है। ऐसे में किसान और गरीब के हितों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। शायद इसीलिए सरकार टीएफए पर अडिग बनी रही थी और अब उसके इस रुख का समर्थन अमेरिका ने भी कर दिया है। क्यूबा, वेनेजुएला और बोलिविया भारत के साथ पहले से ही थे। जेनेवा में भारत के सख्त रवैये से अमेरिका की चौधराहट को जबरदस्त धक्का लगा था। दरअसल, डब्ल्यूटीओ का विधान बहुमत को मान्यता नहीं देता। इसमें प्रावधान है कि किसी भी एक सदस्य देश की आपत्ति करार को यथास्थिति में बनाए रखने के लिए पर्याप्त है। इसलिए अमेरिका को कहना पड़ा था कि डब्ल्यूटीओ संकट के कगार पर है। पर अब भारत के रुख पर अमेरिका की सहमति से डब्लूटीओ और टीएफए संकट मुक्त हो गए हैं।
विश्व व्यापार संगठन के विश्व व्यापार सुविधा नियमों में सुधार के सिलसिले में भारत का कठोर रुख सही दिशा में बढ़ाया गया कदम साबित हुआ। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दृढ़ता के चलते व्यापार सुगमता करार (टीएफए) पर अमेरिका ने नरम रुख अपना लिया है। उसने खाद्यान्न भंडारण के मुद्दे पर भारत के प्रस्ताव का समर्थन करने पर सहमति दे दी है। अमेरिका के इस समर्थन से दोनों देशों के बीच करार पर जारी गतिरोध अब खत्म हो जाएगा। इस पहल से विश्व व्यापार संगठन में टीएफए के अमल का रास्ता भी खुल जाएगा। याद रहे कि इसी साल जुलाई में मोदी ने टीएफए के क्रियान्वयन से हाथ खींचकर दुनिया को चौंका दिया था। इस करार की सबसे महत्वपूर्ण शर्त थी कि संगठन का कोई भी सदस्य देश अपने यहां पैदा होने वाले खाद्य पदार्थो के मूल्य का 10 फीसद से ज्यादा अनुदान खाद्य सुरक्षा पर नहीं दे सकता। जबकि भारत में नए खाद्य सुरक्षा कानून के तहत देश की 67 फीसद आबादी खाद्य सुरक्षा के दायरे में आ गई है। इसके लिए बतौर सब्सिडी जिस धनराशि की जरूरत पड़ेगी वह सकल फसल उत्पाद मूल्य के 10 फीसद से कहीं ज्यादा बैठती। इस लिहाज से इस मुद्दे पर मोदी का ‘अंगद के पांव’ की तरह अडिग बने रहना जरूरी था। जेनेवा में भारत पर अमेरिका, यूरोपीय संघ और ऑस्ट्रेलिया का दबाव था कि इन देशों के व्यापारिक हितों के लिए भारत अपने गरीबों के हितों की बलि चढ़ा दे। विकसित देश चाहते थे कि विकासशील देष समुचित व्यापार अनुबंध की सभी शतरे को जस का तस मानें। जबकि इस अनुबंध की खाद्य सुरक्षा संबंधी शर्त भारत के हितों के विपरीत है। दिसम्बर 2013 में भी इन्हीं विषयों को लेकर इंडोनेशिया के बाली शहर में डब्ल्यूटीओ की बैठक हुई थी, तब पूर्व वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री आनंद शर्मा ने भी इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया था। दरअसल, दुनिया के विकासशील देशों की खाद्य सुरक्षा की सब्सिडी को नियंत्रित करने की पृष्ठभूमि में विकसित देश हैं। इसके उलट जी-33 भारत समेत 46 देशों का ऐसा समूह है जो अनाज की सरकारी खरीद और गरीब व वंचित समूह को खाद्य सहायता देने के अधिकार के मुद्दे पर अडिग है। विकसित देश चाहते हैं कि भारत जैसे विकासशील देश अपनी खाद्य सब्सिडी मसलन सार्वजनिक वितरण पण्राली के जरिए दी जाने वाली सरकारी इमदाद को मौजूदा नियमों के दायरे में रखें। यानी सब्सिडी कुल कृषि उत्पाद मूल्य के 10 प्रतिशत के दायरे तक सीमित रहे। इसके लिए विकसित देश अंतरिम शांति उपबंध के तहत चार साल की मोहलत देना चाहते थे। इसके बाद यदि सब्सिडी की सीमा 10 फीसदी के ऊपर निकलती तो इसे टीएफए की शतरे का उल्लंघन माना जाता और शर्त तोड़ने वाले देश पर जुर्माना लगाया जाता। दरअसल, इस सीमा का निर्धारण 1986-88 की अंतरराष्ट्रीय कीमतों के आधार पर किया गया था। इन बीते ढाई दशक में महंगाई ने कई गुना छलांग लगाई है। इसलिए इस सीमा का भी पुनर्निर्धारण जरूरी है। यही वह दौर रहा है जब भूमंडलीय आर्थिक उदारवाद की अवधारणा ने बहुत कम समय में ही यह प्रमाणित कर दिया कि वह उपभोक्तावाद को बढ़ावा देकर अधिकतम मुनाफा बटोरने का उपाय भर है। टीएफए की सब्सिडी संबंधी शर्त, औद्योगिक देशों और उनकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के इसी मुनाफे में और इजाफा करने की दृष्टि से लगाई गई है ताकि लाचार आदमी के आजीविका के संसाधनों को दरकिनार कर उपभोगवादी वस्तुएं खपाई जा सकें। नव- उदारवाद की ऐसी ही एकतरफा व विरोधाभासी नीतियों का नतीजा है कि अमीर और गरीब के बीच खाई लगातार बढ़ती जा रही है। दरअसल, देशी व विदेशी उद्योगपति पूंजी का निवेश दो ही क्षेत्रों में करते हैं, एक उपभोक्तावादी उपकरणों के निर्माण और वितरण में, दूसरे प्राकृतिक संपदा के दोहन में। यही दो क्षेत्र धन उत्सर्जन के अहम स्रेत हैं। उदारवादी अर्थव्यस्था का मूल है कि भूखी आबादी के लिए भोजन के उपाय करने की बजाय, विकासशील देश पूंजी का केंद्रीयकरण एक निश्चित आबादी पर करें जिससे उसकी खरीद क्षमता में निरंतर इजाफा होता रहे। छठा वेतनमान मनमोहन सिंह सरकार ने इसी उदारवादी अर्थव्यस्था के पोषण के लिए लागू किया था। जाहिर है, अंतत: यह व्यवस्था सीमित मध्यवर्ग और उच्चवर्ग को ही पोषित करने वाली है। लिहाजा गरीब देशों की रियायतों से जुड़ी लोक कल्याणकारी योजनाएं डब्ल्यूटीओ की आंखों में खटकती रहती हैं। लेकिन यह पहली मर्तबा है जब नरेंद्र मोदी की चुनौती के चलते अमेरिका की चौधराहट पर अंकुश लगा है। भारत जैसे विकासशील देश अपनी आबादी के कमजोर तबके के लोगों की खाद्य सुरक्षा जैसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए बड़ी मात्रा में समर्थन मूल्य पर अनाज की सरकारी खरीद करते हैं। फिर इसे रियायती दरों पर पीडीएस के जरिए बेचा जाता है। यहां तक कि एक रपए किलो गेहूं और दो रपए किलो चावल जरूरतमंद लोगों को दिए जाते हैं। कुछ राज्य सरकारें तो आयोडीनयुक्त नमक भी लोगों को रियायती दर पर दे रही हैं। ऐसेमें यदि गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन करने वाले व्यक्ति के आजीविका की यह खाद्य सामग्री रियायती दरों पर नहीं मिलेंगी तो भारत समेत अन्य कई देशों की बड़ी आबादी भूख के चलते दम तोड़ देगी। भारत खाद्य सुरक्षा पर दी जाने वाली सब्सिडी को इसलिए नियंत्रित नहीं कर सकता क्योंकि खाद्य सुरक्षा का दायरा बढ़कर कुल आबादी का 67 फीसद हो गया है। इसके तहत करीब 81 करोड़ लोगों को रियायती दर पर अनाज देना है। अभी तक सालाना 85 हजार करोड़ रपए खाद्य सब्सिडी पर दिए जा रहे थे। खाद्य सुरक्षा कानून लागू होने के बाद यह सब्सिडी बढ़कर 1.24 लाख करोड़ रपए हो चुकी है। इसे पूंजीवाद के समर्थक अर्थशास्त्री बड़ा राजकोषीय घाटा मानते हैं। जबकि 2014-15 के अंतरिम बजट में ही औद्योगिक घरानों को लाभ पहुंचाने की दृष्टि से मनमोहन सरकार ने 5.73 लाख करोड़ रपए की छूट दी थी। जबकि भारत का वर्तमान में वित्तीय घाटा 5.25 लाख करोड़ रपए है। जाहिर है, इस घाटे की पूर्ति उद्योग समूहों को दी गई छूट से आसानी से की जा सकती थी, लिहाजा घाटे का रोना फिजूल है। दूसरी तरफ भाजपा ने अपने घोषणा पत्र में फसलों के समर्थन मूल्य में डेढ़ गुना वृद्धि करने की बात कही है। यदि मोदी सरकार इस वादे पर अमल करती है तो स्वाभाविक है, सब्सिडी खर्च और बढ़ेगा। सरकार को इस वादे पर इसलिए अमल करना जरूरी है क्योंकि उसके कहे पर ऐतबार कर लोगों ने उसे जबरदस्त बहुमत दिया है। ऐसे में किसान और गरीब के हितों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। शायद इसीलिए सरकार टीएफए पर अडिग बनी रही थी और अब उसके इस रुख का समर्थन अमेरिका ने भी कर दिया है। क्यूबा, वेनेजुएला और बोलिविया भारत के साथ पहले से ही थे। जेनेवा में भारत के सख्त रवैये से अमेरिका की चौधराहट को जबरदस्त धक्का लगा था। दरअसल, डब्ल्यूटीओ का विधान बहुमत को मान्यता नहीं देता। इसमें प्रावधान है कि किसी भी एक सदस्य देश की आपत्ति करार को यथास्थिति में बनाए रखने के लिए पर्याप्त है। इसलिए अमेरिका को कहना पड़ा था कि डब्ल्यूटीओ संकट के कगार पर है। पर अब भारत के रुख पर अमेरिका की सहमति से डब्लूटीओ और टीएफए संकट मुक्त हो गए हैं।
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