सोमवार, 10 नवंबर 2014

रणनीतिक मजबूती देगी एशिया-प्रशांत नीति

रणनीतिक मजबूती देगी एशिया-प्रशांत नीति
(रहीस सिंह)
चीन ने जब से आर्थिक क्षेत्र में लंबी छलांग मारी है, वह लगातार आक्रामक होता जा रहा है। उसके इस रवैये से पूर्वी और दक्षिण-पूर्वी एशिया के अधिकांश देश चिंता और भय से ग्रस्त रहते हैं। लेकिन ऐसा लगता है कि अब भारत लुक ईस्ट नीति में आक्रामकता ला रहा है जो पूर्वी एशिया के दे शों में आत्मशक्ति पैदा करेगी और चीन के प्रभाव को काउंटर करेगी भारत ने जिस रणनीति का चु नाव किया है, वह चीन को शंकालु बनाएगी, भयभीत करेगी और संभवत: आक्रामक भी बनाएगी। देखना यह है कि चीन भारत की इस रणनीति से भय खाएगा या फिर और आक्रामक बनेगा
पूर्वी और दक्षिण पूर्वी एशिया के साथ भारत ने अपने रिश्तों की शुरुआत भूमंडलीकरण में साझीदार बनने के साथ-साथ की। 1990 के दशक में ‘पूरब की ओर देखो’ नीति के तहत हुई इस शुरुआत को लंबे समय तक रणनीतिक धरातल निर्मित करने में असफलता मिलती रही। लेकिन दिसम्बर 2013 में जब नई दिल्ली में पूर्वी एशिया के देशों ने भारत के साथ रणनीतिक संधि की तो ऐसा अवश्य लगा कि भारत अब एशिया- पेसिफिक में एक ऐसा स्ट्रैटेजिक रिंग निर्मित करने में सफल हो रहा है जो चीन की ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ को काउंटर करने में समर्थ होगा। इधर कुछ समय से भारत की विदेश नीति में वाह्य केंद्रित विदेश नीति के स्थान पर भारत केंद्रित नीति पर अधिक फोकस होने के कारण ‘लुक ईस्ट नीति’ को रणनीतिक धरातल प्राप्त होता दिखाई दे रहा है। लेकिन इस रणनीतिक विकास को चीन पसंद नहीं कर रहा है इसलिए उसकी तरफ से प्रतिक्रिया स्वाभाविक है। ऐसी स्थिति में एक वर्ग यह मानकर प्रसन्न हो सकता है कि भारत अब चीन की ताकत को प्रशांत महासागर के जरिए काउंटर करने की रणनीति में सफल हो रहा है, लेकिन सच यह है कि हिंद महासागर में वह अब भी चुनौतीविहीन बना हुआ है। उसकी हमारे पड़ोसियों में खासी घुसपैठ है जिसके जरिए वह भारतीय हितों को प्रभावित करने की क्षमता रखता है। क्या इन पहलुओं पर गौर किये बिना ही ऐसी विदेश नीति का चुनाव उचित है जो चीन को उकसाने का काम करे? सामान्यतया आज की लेखकीय शैली में एक शब्दाडंबर मिलता है कि भारत ने आक्रामक विदेश नीति की शुरुआत कर दी है। लेकिन यह कहना हकीकत से काफी दूर है क्योंकि विदेश नीति में परिवर्तन पिछले काफी समय से हो रहा है लेकिन उसके लिए कोई तकनीकी शब्दावली का प्रयोग नहीं किया जा सका। भारत पिछले दो वर्षो में एशिया-प्रशांत में बनने वाले ‘त्रिभुज’
(भारत-जापान-अमेरिका) अथवा चतुभरुज (भारत-जापान-ऑस्ट्रेलिया-अमेरिका) की ओर सरका। जापान के साथ उसके पहले से ही आर्थिक और रणनीतिक रिश्ते हैं और पूर्वी एशिया के देशों के साथ रणनीतिक रिश्तों की मूल विषयवस्तु भी दिसम्बर 2013 में ही लिखी गई। हां, कुछ शिथिलता अवश्य रही और वह भी घरेलू राजनीतिक स्थितियों को लेकर जिसके चलते अपेक्षित परिणाम सामने नहीं आ सके। लेकिन अब भारत ने पूर्वी देशों से जब ‘लुक एट इंडिया’ का आग्रह किया है तो यह मानकर चलना चाहिए कि अब वह पूर्वी एशिया के देशों को लेकर अपनी ताकत को विकसित करना चाहता है। यह एक ऐसी नीति है जिससे चीन का सशंकित होना लाजिमी है। तो क्या यह मान लिया जाए कि प्रशांत क्षेत्र में भारत द्वारा निर्मित की जा रही आक्रामक-रक्षात्मक दीवार के कारण चीन भारत से भय खाएगा या फिर और अधिक प्रतिक्रियावादी होगा? क्या भारत लुक ईस्ट नीति को नया रूप देकर धीरे-धीरे चीन के पूर्वी एशिया के उन ठिकानों का अधिग्रहण कर लेगा जहां उसका कमोबेश अभी एकाधिकार है? चीन ने जब से आर्थिक क्षेत्र में लंबी छलांग मारी है, वह लगातार आक्रामक होता जा रहा है। उसके इस रवैये से पूर्वी और दक्षिण- पूर्वी एशिया के अधिकांश देश चिंता और भय से ग्रस्त रहते हैं। लेकिन ऐसा लगता है कि अब भारत लुक ईस्ट नीति में आक्रामकता ला रहा है जो पूर्वी एशिया के देशों में आत्मशक्ति पैदा करेगी और चीन के प्रभाव को काउंटर करेगी। दरअसल चीन अपनी आर्थिक क्षमता के कारण कुछ हद तक उद्दंडता का व्यवहार करने लगा है जिसके चलते पूर्वी एशिया के देश उसे सबक सिखाना चाहते हैं। उदाहरण के तौर पर चीन जापान को एक ‘मेनोपजल’ यानी रजोनिवृत्त देश की संज्ञा दे चुका है। साफ है कि वह ऐसा कहकर स्वयं को एक चुनौतीविहीन ताकत के रूप में पेश करता है। अन्य देशों के साथ भी उसका कुछ ऐसा ही व्यवहार है, यहां तक कि भारत के साथ भी। यही कारण है कि पूर्वी एशिया के देश भारत के साथ मिलकर एक रणनीतिक मोर्चा बनाना चाहते हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि चीन पर इसका असर भी दिख रहा है। उल्लेखनीय है कि भारत के जापान, म्यांमार, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया, वियतनाम, कम्बोडिया, लाओस, थाईलैंड आदि के साथ विकसित होते रणनीतिक संबंधों से चीन कुछ भय खाता दिख रहा है। चीन का सरकारी मीडिया और आला सरकारी अधिकारी भी इस समय भारत पर तरह-तरह के आरोप लगाते नजर आते हैं। जब एशिया-प्रशांत क्षेत्र के किसी देश से कोई नेता भारत की यात्रा पर आता है या भारतीय नेता उन देशों की यात्रा पर जाता है तो चीन की तरफ से प्रतिक्रिया सामान्य या मैत्रीपूर्ण नहीं होती। उसकी तरफ से या तो भारत को कमजोर राष्ट्र बताकर धमकी दी जाती है, 1962 का इतिहास याद दिलाया जाता है अथवा मेजबान देश/देशों को भारत के साथ मिलकर चीन विरोधी गतिविधि चलाने का दोषी बताया जाता है। दरअसल कुछ समय पहले चीन के एक अखबार ने लिखा था कि जापान चीन के समक्ष बहुत कमजोर पड़ चुका है, न सिर्फ शक्ति के स्तर पर बल्कि मानसिक रूप से भी। इसलिए हमें न तो एक ‘मेनोपजल’ देश के साथ मौत तक संघर्ष करने की जरूरत है और न ही उसके साथ संघर्ष के लिए स्वयं को दोष देने की। वास्तव में जापान न तो निशक्त है और न मनोरोगी, बल्कि वह इस समय सही अर्थो में उसी दौर से गुजर रहा है जिस तरह से वह मेइजी रेस्टोरेशन के दौरान आधुनिकीकरण से गुजरा था और एक आधुनिक राष्ट्र के रूप में दुनिया के सामने पेश हुआ था। ऐसे में नई दिल्ली-टोक्यो एक साथ मिलकर ऐसे अंतरराष्ट्रीय राजनयिक/सामरिक हाइवे का निर्माण कर सकते हैं जिस पर पूर्वी व दक्षिण पूर्वी एशिया के देश तीव्रता और निश्चिंतता के साथ आवागमन कर सकते हैं। हालांकि आने वाले समय में इसके कितने फायदे होंगे, यह कहना मुश्किल है, लेकिन इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि कम्बोडिया, जो कभी चीनी उत्पादों के लिए स्थायी बाजार था, अब वह चीन की पकड़ से धीरे-धीरे बाहर हो रहा है। दूसरा महत्वपूर्ण देश वियतनाम है जिस पर चीन का लंबे समय तक प्रभाव रहा, लेकिन अब वह भारत की कूटनीतिक कक्षा में प्रवेश कर चुका है। हाल ही में राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की वियतनाम के दौरान और अब वियतनाम के प्रधानमंत्री नगुएन तान दुंग की भारत यात्रा के दौरान जो समझौते हुए हैं वे इस बात के संकेत हैं कि वियतनाम भारत के साथ पारंपरिक दोस्ती को समग्र सामरिक साझेदारी में बदलने के लिए प्रतिबद्ध है। म्यांमार ने भी पिछले दो वर्षो से चीन के प्रभाव से मुक्त होना प्रारंभ कर दिया है और उसकी निकटता भारत के साथ स्थापित हो रही है। भारत के वे पड़ोसी जिन पर चीन सांस्कृतिक या प्रजातीय कार्ड खेल मनोवैज्ञानिक दबाव बना रहा था, संभवत: फिर भारत से रणनीतिक मित्रता में अपने भविष्य की संभावनाएं तलाश रहे हैं। कुल मिलाकर भारत एशिया-प्रशांत क्षेत्र में अपनी लुक ईस्ट नीति को जो नया रूप दे रहा है उसमें चीन की हिंद महासागर की ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ नीति की काट निहित है। दूसरे शब्दों में कहें तो नई दिल्ली से नोमपेन्ह या उससे भी आगे बढ़कर क्वालालम्पुर अथवा जकार्ता (वाया नेपीद्वा, टोक्यो, सियोल) तक भारत ने एक ‘माला’ (स्ट्रिंग) निर्मित करने के लिए जिस रणनीति का चुनाव किया है, वह चीन को शंकालु बनाएगी, भयभीत करेगी और संभवत: आक्रामक भी बनाएगी। देखना यह है कि चीन भारत की इस रणनीति से भय खाएगा या फिर और आक्रामक बनेगा।
(लेखक विदेशी मामलों के जानकार हैं)

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