सोमवार, 10 नवंबर 2014

कैसे नियंत्रित करें राजकोषीय घाटा!
(जयंतीलाल भंडारी )
हाल ही में जारी सरकारी आंकड़ों के अनुसार केंद्र का राजकोषीय घाटा बढ़कर चालू वित्त वर्ष 2014-15 की पहली छमाही में बजट अनुमान के 82.6 फीसद पर पहुंच गया है जो पूर्ववर्ती वित्त वर्ष की समान अवधि में 76 फीसद पर था। आंकड़ों से पता चलता है कि सरकार बजट के समय निर्धारित अनुमान के मुताबिक अधिक राजस्व जुटाने में विफल रही है। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने भी कहा है कि हम वित्त वर्ष 2015 के प्रत्यक्ष कर लक्ष्य को पूरा करने के बेहद करीब हैं, लेकिन अप्रत्यक्ष कर का लक्ष्य एक बड़ी चुनौती होगा। उन्होंने कहा कि राजकोषीय घाटे में तेजी अधिक कर रिफंड की वजह से आई है। प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष करों, दोनों के संदर्भ में 1.20 लाख करोड़ रपए के रिफंड का भुगतान किया गया। उल्लेखनीय है कि बजट 2014-15 में राजकोषीय घाटा 5.31 लाख करोड़ रपए अर्थात जीडीपी का 4.1 फीसद रहने का अनुमान व्यक्त किया गया था। पिछले वर्ष की समान अवधि के मुकाबले चालू वित्त वर्ष की पहली छमाही में कर, गैर-कर, गैर-कर्ज ऋण पूंजी से वसूली बजट अनुमान से कम रही। कर प्राप्तियां लगभग 3.23 लाख करोड़ रपए रहीं जो बजट अनुमान का 33.1 फीसद है। इस साल राजकोषीय घाटे को नियंत्रित करने का जो लक्ष्य रखा गया है वह फिलहाल पूरा होता संभव नहीं दिख रहा है। ऐसे में देश में वर्ष 2014-15 में व्यापार घाटे को कम करने और राजकोषीय घाटे को नियंत्रित करने के लिए एक ओर कर आय बढ़ानी होगी, वहीं दूसरी ओर आयात नियंत्रित करते हुए निर्यात भी बढ़ाने होंगे। देश में कर आय बढ़ाने के लिए जरूरी है कि सरकार प्रत्यक्ष कर के महत्वपूर्ण स्त्रोत आयकर पर नए सिरे से ध्यान केंद्रित करे। यद्यपि पिछले तीन साल के दौरान देश में आयकरदाताओं की संख्या में बढ़ोतरी हुई है किंतु अब भी यह संख्या कुल आबादी का तीन फीसद भी नहीं है। उल्लेखनीय है कि नवीनतम आंकड़ों के अनुसार भारत के करीब 90 फीसद करदाता उस श्रेणी में आते हैं, जिनकी कर योग्य आय पांच लाख रपए वार्षिक तक है। कुल आयकर संग्रह में इस आयकर श्रेणी की हिस्सेदारी महज 10 फीसदी ही है। जबकि कुल करदाताओं में से महज दो फीसद ही 20 लाख रपए वार्षिक या इससे अधिक की आय की श्रेणी में आते हैं। लेकिन इस आयकर श्रेणी से आयकर संग्रह में 63 फीसद हिस्सेदारी आती है। इन श्रेणियों में आयकरदाताओं की संख्या बढ़ाई जा सकती है। यदि आयकर विभाग आयकर की उच्चतम सीमा के तहत अधिक कर चुकाने वालों की कम संख्या पर ध्यान दे तो आयकर का आकार बड़ा हो सकता है। करोड़पति वर्ग के आयकरदाताओं पर ध्यान देने से कर संग्रह में सुधार हो सकता है। अधिक आय वाले संभावित करदाताओं के आधार की पहचान करना तुलनात्मक रूप से आसान होगा। मल्टी मिलिनेयर फेनोमेना-2014 न्यू र्वल्ड वेल्थ रिपोर्ट के अनुसार 2013 में जहां भारत में एक करोड़ डॉलर की शुद्ध संपत्ति वाले करोड़पतियों (मिलियनेयर) की संख्या 2.14 लाख थी, वहीं यह संख्या 2014 में बढ़कर 2.26 लाख हो गई। लेकिन विचारणीय यह है कि सरकार के आंकड़ों के अनुसार एक करोड़ रपए से अधिक की आय पर कर चुकाने वालों की संख्या मात्र 42,800 ही है। इस उच्चतम आयकर वर्ग के तहत आयकरदाताओं की संख्या सरलता से बढ़ाई जा सकती है। इसके लिए वित्त मंत्रालय को अपनी प्रत्यक्ष कर संग्रह की कोशिशों पर विशेष ध्यान देना होगा। राजस्व विभाग में अभी करीब 1.77 लाख अधिकारी और कर्मचारी कार्यरत हैं। ऐसे बड़े आकार वाले राजस्व विभाग को अपने कर संग्रह का दायरा बढ़ाने के लिए ज्यादा सक्षम एवं प्रभावी ढंग से काम करना होगा। इस बात पर ध्यान देना होगा कि एक जुलाई 2014 को आयकर के जो 3.29 लाख करोड़ रपए बकाया हैं, उसकी वसूली के प्रभावी प्रयास हों। साथ ही आयकर विभाग को देश में महंगी कारें खरीदने वालों की सूची पर नजर रखनी होगी। आलीशान आवास और अन्य विलासिता उत्पाद खरीदारों पर भी आयकर विभाग को नजर रखनी होगी। कर चोरी रोकने के लिए ऐसी महंगी पार्टियों, वैवाहिक समारोहों और कार्यक्रमों पर भी नजर रखनी होगी जो समाज और मीडिया में सुर्खियों में आते हैं। कर चोरी वाले संभावित क्षेत्रों को चिह्नित करके उन पर विशेष ध्यान देना होगा। खासतौर पर निर्माण, रीयल एस्टेट और ठेके पर होने वाले काम, अचल संपत्ति को किराए पर देने, बिजनेस सपोर्ट सेवाएं, व्यक्तिगत आपूत्तर्ि एवं सिक्योरिटी सेवाएं और सामानों के परिवहन ऑपरेटर आदि के कर भुगतान पर निगाहें रखनी होंगी। सरकारी निकायों जैसे रेलवे, डाक विभाग, पुलिस, नगर निगम और कैंटोनमेंट बोर्ड के सेवाकर भुगतानों पर भी नजदीकी नजर रखनी होगी। इसके साथ-साथ आयकर अधिनियम को सरल बनाने और आयकर आधार बढ़ाने के लिए तैयार की गई प्रत्यक्ष कर संहिता (डीटीसी) को शीघ्रतापूर्वक धरातल पर लाने के लिए प्रयास करने होंगे। इसी प्रकार सरकार को अप्रत्यक्ष करों से आय बढ़ाने के लिए वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) को अंतिम रूप देने के लिए त्वरित कदम उठाने होंगे। जहां एक ओर व्यापार घाटा पूरा करने के लिए कर आय बढ़ानी होगी, वहीं दूसरी ओर निर्यात भी बढ़ाने होंगे। वाणिज्य मंत्रालय ने वित्त वर्ष 2013-14 के लिए 325 अरब डॉलर का निर्यात लक्ष्य तय किया था। लेकिन वित्त वर्ष कुल निर्यात 312.3 अरब डॉलर का रहा। वर्ष 2014-15 में निर्यात की गति बढ़ी है, लेकिन आयात अधिक होने में व्यापार घाटा बढ़ा है। यह सर्वविदित है कि पिछले वर्षो में भारत के निर्यात लक्ष्य पूरे न होने के पीछे अमेरिका और यूरोपीय देशों की आर्थिक सुस्ती सबसे प्रमुख कारण रही है। यद्यपि अमेरिका की अर्थव्यवस्था में 2014 में सुधार आया है, लेकिन अभी भी यूरोजोन देशों की अर्थव्यवस्था खतरों का सामना कर रही है। चूंकि भारत के कुल निर्यात का लगभग 35 प्रतिशत अमेरिका और यूरोप के बाजार से जुड़ा हुआ है, अत: इन बाजारों में भारत के निर्यात लक्ष्य गड़बड़ा गए हैं। जहां हमारे निर्यात के परंपरागत बाजारों में कठिनाइयां हैं, वहीं हमें विश्व निर्यात बाजार में विभिन्न देशों से चुनौतियों का सामना भी करना पड़ रहा है। कई छोटे-छोटे देशों मसलन बांग्लादेश, वियतनाम, थाईलैंड ने अपने निर्यातकों को सुविधाओं का ढेर देकर भारतीय निर्यातकों के सामने कड़ी प्रतिस्पर्धा खड़ी कर दी है। चीन अपने उत्पादों को कम कीमत पर दुनिया के कोने-कोने में पहुंचा ही रहा है। निर्यात उद्योगों के लिए करों में रियायतें, बिजली की सस्ती और सुगम उपलब्धि और बुनियादी ढांचे की भारी सुविधाएं चीन को दुनिया का प्रमुखतम निर्यातक देश बनाए हुए हैं। ऐसी स्थिति में भारतीय निर्यात को नियंतण्र बाजार में प्रतिस्पर्धी बनाने की ऐसी रणनीति अपनानी होगी जिससे निर्यात की विकास दर बढ़ाई जा सके। भारतीय निर्यातकों को पारंपरिक बाजारों के अलावा नए बाजार तलाशने होंगे। भारतीय निर्यात के लिए अफ्रीका में भारी संभावनाएं हैं। भारतीय निर्यातकों के लिए चीन भी एक विाल बाजार है, जबकि दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में नए अवसर उभर रहे हैं। इसके साथ-साथ लेटिन अमेरिकी देशों खासतौर से चिली, कोलंबिया, कोस्टारिका, डोमिनिक रिपब्लिक, पनामा, पेरू और त्रिनिदाद व टोबेगो में निर्यात बढ़ाने के अवसर हैं। पड़ोसी देशों पाकिस्तान, बांग्लादेश, म्यांमार, श्रीलंका, भूटान, थाईलैंड और नेपाल के साथ-साथ ब्रिक्स और खाड़ी देशों में भारत की निर्यात कोशिशें सफल हो सकती हैं। हम आशा करें कि मोदी सरकार इन सब बातों के साथ-साथ निर्यात बाजारों के विस्तार के परिप्रेक्ष्य में प्रतिस्पर्धा में सतत सुधार तथा वित्तीय मानदंडों के प्रति जवाबदेही पर ध्यान देगी। उम्मीद है कि मोदी सरकार द्वारा कर सुधारों पर मुस्तैदी, कर वसूली के कारगर प्रयास तथा कर आय बढ़ाने के नए रणनीतिक प्रयासों से कर संग्रह की लागत, कर अनुपालन लागत कम हो जाएगी और कर आय बढ़ेगी। ऐसा होने पर देश का व्यापार घाटा कम होगा, साथ ही राजकोषीय घाटा भी लक्ष्य के अनुरूप दिखाई देगा।
(लेखक आर्थिक मामलों के जानकार हैं)

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