नई करवट लेता ट्यूनीशिया
(सुभाष गाताडे)
बोको हरम की आतंकी गतिविधियां, इस्लामिक स्टेट के मध्यपूर्व में बढ़ते कदम या लीबिया में जिहादी संगठनों की खूनी हरकतें आदि खबरों के बीच ट्यूनीशिया की हालिया घटनाओं के बरक्स वहां शान्तिपूर्ण ढंग से चुनाव के जरिए हुए सत्ता परिवर्तन व सेक्युलर ताकतों को मिली जीत पर अधिक र्चचा नहीं हो सकी। यह वही ट्यूनीशिया है, जहां के तानाशाह बेन अली के खिलाफ उठे जनविद्रोह, जिसे जैस्मिन इंकलाब नाम दिया गया था, ने महज तीन साल पहले उत्तरी अफ्रीका व मध्यपूर्व के मुस्लिम बहुल मुल्कों में तानाशाही तथा राजे- रजवाड़ों के खिलाफ जन आंदोलन की नयी लहर पैदा की थी। जैस्मिन अर्थात जूही या मोगरा ट्यूनीशिया का राष्ट्रीय फूल है। मालूम हो कि ट्यूनीशिया में पिछले दिनों सम्पन्न चुनावों में जैस्मिन इंकलाब के बाद सत्ता में आयी इस्लामिस्ट एन्नाहदा पार्टी, जिसने दो अन्य छोटी गैरधार्मिक-सेक्युलर पार्टियों के साथ सत्ता संभाली थी, को शिकस्त मिली और निदा ट्यूनस अर्थात ट्यूनीशिया की आवाज नामक नवगठित पार्टी को जीत मिली। ध्यान रहे कि अक्टूबर 2011 को संविधान सभा के लिए सम्पन्न चुनावों में एन्नाहदा सत्ता में आयी थी। बीती जनवरी में एन्नाहदा ने एक गैरपार्टी सरकार को, जिसमें मुख्यत: विशेषज्ञ, टेक्नोक्रेट आदि शामिल थे, को सत्ता सौंपी थी क्योंकि इस्लामिस्ट आतंकियों द्वारा दो विपक्षी नेताओं की हत्या के बाद जो व्यापक आंदोलन नए सिरे से खड़ा हुआ, उसके बाद उसकी वैधता पर प्रश्नचिह्न खड़े हुए थे। कहा जा रहा है कि देश की अर्थव्यवस्था संभालने में एन्नाहदा को झेलनी पड़ी दिक्कतों के चलते वह अलोकप्रिय हुई। वैसे उसके सत्ता से बेदखल होने में व्यापक जनान्दोलन का हाथ भी माना जा सकता है। हालांकि एन्नाहदा को इस बात से सुकून हो सकता है कि उसे 30 फीसद वोट मिले, जो अक्टूबर 2011 में सम्पन्न चुनावों में मिले 37 फीसद वोटों से बहुत कम नहीं थे, जबकि संविधान सभा के लिए चुनाव हुए थे। पार्टी यह कह कर भी सन्तोष कर सकती है कि समूचे मुल्क में उसका नेटवर्क फैला है और कार्यकर्ता सक्रिय हैं, जिस पर बाकी संगठन रश्क कर सकते हैं, मगर जैसा कि स्पष्ट है, निदा ट्यूनस की जीत एक तरह से दो साल तक चले इस्लामिस्ट शासन के प्रति एक नकारात्मक वोट है। ध्यान रहे कि निदा ट्यूनस के संस्थापक व वयोवद्ध राजनीतिज्ञ बेजी सई सेब्सी की लोकप्रियता के चलते ही उनकी पार्टी आंतरिक दरारों के बावजूद एक रह सकी। ट्यूनीशिया के आजादी के आंदोलन की अगुआई करनेवाले हबीब बुरगुइबा के साथ काम कर चुके बेजी सई सेब्सी तीन बार मंत्री रह चुके हैं। वह 2011 में रिटायरमेंट से बाहर निकले और उन्हें अन्तरिम सरकार का जिम्मा सौंपा गया। अब कुछ ही समय में वहां राष्ट्रपति पद के चुनाव होने वाले हैं और उसमे भी सेक्युलर ताकतों की जीत की संभावना बतायी जा रही है। निश्चित ही ट्यूनीशिया की समस्याएं समाप्त नहीं हुई हैं। अगल-बगल मुल्कों में जिहादी या अतिवादी तत्व हावी हैं। टयूनीशिया से इस्लामिक स्टेट आंदोलन से जुड़ने वालों की भी अच्छी तादाद है, इसके बावजूद वहां आया परिवर्तन दूरगामी असर डालनेवाला है। गौरतलब है कि मुस्लिम बहुल अरब देश होने के बावजूद ट्यूनीशिया में इस्लाम का वह रूप कभी स्थापित नहीं हो सका, जिसकी हिमायत सऊदी अरब करता रहा है। वहां संसद में 20 फीसद महिला सदस्य रही हैं और महिलाएं सभी कारोबारों में पुरु षों की तरह हिस्सा ले सकती हैं। बुरके को कभी सरकारी समर्थन नहीं मिला है, उल्टे स्त्रियों को उससे निरुत्साहित ही किया जाता रहा है। मुस्लिम बहुल मुल्कों में जिस तरह टर्की ने केमाल पाशा की अगुआई में अपने मुल्क को आधुनिक रास्तों पर डालने की कोशिश की थी, कुछ वैसी ही पहल बेन अली के पहले सत्तासीन रहे बुरगुइबा ने भी की थी, जिन्हें एक रक्तहीन क्रान्ति के जरिए अपदस्थ करके बेन अली ने हुकूमत संभाली थी। तीन साल पहले बेन अली की तानाशाही हुकूमत के खिलाफ हुए जनविद्रोह ने ही समूचे अरब जगत में नयी बयार चलायी थी। डेली स्टार में लिखे अपने आलेख में बैरिस्टर हारून उर रशीद, जो जिनेवा में बांग्लादेश के राजदूत रह चुके हैं, ट्यूनीशिया में इस्लामिस्टों को मिली शिकस्त की र्चचा करते हुए चन्द बिन्दुओं को रेखांकित करते हैं। उनके मुताबिक सबसे अहम यह है कि लीबिया में इस्लामिक संगठनों की आतंकी कार्रवाइयां, अल्जीरिया में फ्रांसीसी नागरिक का सिर कलम किया जाना, इस्लामिक स्टेट की ज्यादतियां और सीरिया तथा इराक के हिस्सों में स्वयंभू खिलाफत की स्थापना के नाम पर आम नागरिकों पर बरपाया जा रहा कहर आदि घटनाओं के चलते ट्यूनीशिया के अन्दर इस्लामिस्ट पार्टियां काफी बदनाम हुई हैं। इस्लामिस्ट बंदूकधारियों द्वारा दो वामपंथी राजनेताओं की हत्या, जिसने ट्यूनीशिया में जबरदस्त आंदोलन को जन्म दिया और वामपंथी राजनेताओं को बचाने में एन्नाहदा की विफलता से धारणा पनपी कि वह उनके प्रति नरम रवैया अख्तियार करती है। अन्त में वह निष्कर्ष निकालते हैं कि मुस्लिम बहुल मुल्कों में अब मतदाताओं का बहुमत इस्लामिक पार्टियों की विचारधारा से सहमत नहीं दिखता। पूरी दुनिया में मुसलमानों की सबसे अधिक तादादवाले इंडोनेशिया की र्चचा करते हुए वह बताते हैं कि बीते अप्रैल में वहां सम्पन्न चुनावों में इस्लामिक पार्टियों का प्रदर्शन निराशाजनक ही रहा। एक ऐसा मुल्क, जहां की 24 करोड़ आबादी का अट्ठासी फीसद हिस्सा मुसलमानों का है, वहां के इन चुनावों में व्यापक आधारोंवाली सेक्युलर पार्टियों पर मतदाताओं ने भरोसा जताया। फिलवक्त यह नहीं बताया जा सकता है कि ट्यूनिशिया में जनतंत्र में संक्रमण का यह प्रयोग क्या अरब बसन्त के दूसरे संस्करण के तौर पर जाना जाएगा? क्या मध्यपूर्व एवं उत्तरी अफ्रीका के अरब एवं मुस्लिम बहुल मुल्कों में भी इससे जनतांत्रिक ताकतों को नयी ऊर्जा मिलेगी या उसका प्रभाव अपने तक ही सीमित रहेगा। पहले इंडोनेशिया में व्यापक आधार वाले सेक्युलर ताकतों का चुनावो में बना दबदबा, फिर बांग्लादेश में इस्लामिस्ट ताकतों के अग्रणियों को युद्ध अपराधों के चलते सुनायी गयी सजा, जिसके प्रति व्यापक जनता का जबरदस्त समर्थन और अब ट्यूनीशिया में इस्लामिस्ट ताकतों को शिकस्त, क्या ये घटनाएं मुस्लिम बहुल मुल्कों में उठ रहे नए आलोड़न का सबूत है या इन्हें अपवाद मान कर भूल जाना चाहिए?
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