सोने में गिरावट से बैंकों की बढ़ती मुश्किल
(सतीश सिंह)
अमेरिकी अर्थव्यवस्था में सुधार के संकेत, अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में इजाफा नहीं करने और डॉलर में मजबूती आने से सोने की कीमत में लगातार कमी आ रही है। जानकारों के मुताबिक इस साल के अंत तक अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमत घटकर 1100 डॉलर प्रति औंस हो सकती है। यह भी कहा जा रहा है कि 2015 के अंत तक इसकी कीमत कम होकर 800 डॉलर प्रति औंस से भी नीचे आ सकती है। अंतराराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमत में हो रही कमी का सीधा असर घरेलू बाजार पर पड़ रहा है। 5 नवम्बर को 39 महीनों के बाद सोने की कीमत 26 हजार रपए प्रति 10 ग्राम से नीचे उतर गई। आने वाले दिनों में सोने की कीमत 20 हजार रपए प्रति 10 ग्राम से भी नीचे जा सकती है। मालूम हो कि सोने के आयात-निर्यात से जुड़े सख्त नियमों एवं 10 प्रतिशत आयात शुल्क होने के कारण यह क्षेत्र दबाव में था। वित्त वर्ष 2013-14 में ज्वैलरी क्षेत्र में 11 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई थी। सितम्बर महीने में त्योहारों को ध्यान में रखते हुए 95 टन सोने का आयात किया गया था और त्योहार में आकलन के मुताबिक सोने की बंपर बिक्री भी हुई, जिससे इस क्षेत्र में 30 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। इधर, तीसरी तिमाही में नामचीन नियंतण्र स्वर्ण कंपनियों के मुनाफे में गिरावट दर्ज हुई है, तो छोटी एवं मझोली कंपनियों को भारी नुकसान उठाना पड़ा है। कनाडा की एग्निको इगल माइंस को 1.51 करोड़ डॉलर का शुद्ध नुकसान हुआ है, जबकि पिछले साल इसी तिमाही के दौरान कंपनी को 7.49 करोड़ डॉलर का मुनाफा हुआ था। यमन गोल्ड इंक ने भी एक अरब डॉलर का शुद्ध घाटा घोषित किया है, जबकि उसे पिछले साल इस दौरान 4.34 करोड़ डॉलर का शुद्ध लाभ हुआ था। हालत के प्रतिकूल होने के कारण प्रमुख खनन कंपनी बैरिक गोल्ड कॉर्प ने अपने उत्पादन अनुमान को कम किया है। कंपनी का कहना है कि 2015 में सोने के उत्पादन में और भी गिरावट दर्ज होगी। बावजूद, भारतीय बाजार पर इसका कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा क्योंकि विदेशों में भारत की तरह सोने के प्रति दीवानगी नहीं है। भारत में समाज का ताना-बाना इस तरह से बुना गया है कि यहां की महिलाएं सोना का प्रदर्शन करके गर्व का अनुभव करती हैं। शादी में बेटी को सोने का जेवर देने का चलन सदियों से चला आ रहा है। इस मानसिकता के कारण लोग सोने में निवेश करना सबसे बेहतर विकल्प मानते हैं। दूसरी वजह है सोने में निवेश के माध्यम से काले धन को आसानी से खपाया जाना। कुछ महीनों से स्विस बैंकों में जमा काला धन तस्करी के माध्यम से सोने के रूप में भारत लाया जा रहा है। एक अनुमान के मुताबिक हजारों टन सोना स्विट्जरलैंड से भारत लाया जा चुका है। सोने के भाव में नरमी का एक प्रमुख कारण इसे भी बताया जा रहा है। माना जा रहा है कि स्विस बैंकों में काला धन रखने वाले अधिकांश भारतीयों के खातों का बैलेंस इसी वजह से जीरो हुआ है। भारत में सोने की खरीद-फरोख्त पक्के बिल से नहीं होने और अकूत काला धन होने की वजह से सोने में तेजी के बावजूद इसकी बिक्री में कभी भी कमी नहीं आती है। भारत में सोने के प्रति दीवानगी को देखते हुए बैंकों ने गोल्ड लोन की मदद से एडवांस के पोर्टफोलियो में उल्लेखनीय बढ़ोतरी की है। पिछले साल सोने की कीमतों में गिरावट आने के बाद रिजर्व बैंक ने बैंकों को गोल्ड लोन में 40 प्रतिशत मार्जिन रखने के लिए कहा था, जबकि पूर्व में बैंकों को मार्जिन रखने की स्वतंत्रता थी। उस समय कुछ सरकारी बैंकों ने 70 प्रतिशत लोन टू वैल्यू (एलटीवी) का मानक रखा था। एलटीवी उस सीमा को कहते हैं जिसे ऋण के जोखिम के अनुसार तय किया जाता है। सोने का स्क्रेप वैल्यू 75 प्रतिशत माना गया है। स्क्रेप वैल्यू 24 कैरट सोने की कीमत होती है और इसे निर्धारित करते समय जेवर में से उसके बनाने की कीमत को घटा दिया जाता है। बहरहाल, ऋण देने के सिद्धांत की अनदेखी करते हुए बैंक सीमा से अधिक गोल्ड लोन दे रहे हैं, जबकि गोल्ड लोन को जोखिम वाला ऋण माना गया है। बीते महीने एक अनुसूचित बैंक में 33 करोड़ के फर्जी गोल्ड लोन का पता चला था। फिर भी गोल्ड लोन की वृद्धि दर 70 से 80 प्रतिशत रही है, जबकि पिछले चार वर्षो में बैंकों के अग्रिम में 16 से 17 प्रतिशत की दर से ही विकास हुआ है। जानकारों के मुताबिक यदि इस गति से बैंक गोल्ड लोन देते रहे तो 2016 तक गोल्ड लोन का पोर्टफोलियो कुल अग्रिम का सात प्रतिशत हो जाएगा। एक अनुमान के अनुसार गोल्ड लोन का बाजार लगभग एक लाख करोड़ रु पए का है। इसमें 60 प्रतिशत बाजार संगठित क्षेत्र का है। इस क्षेत्र में गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियां और बैंक दोनों शामिल हैं। गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) की बाजार हिस्सेदारी 75 से 80 प्रतिशत तक है। असंगठित क्षेत्र में सोने का कारोबार मोटे तौर पर ग्रामीण एवं कस्बाई क्षेत्र में है, जहां महाजन या साहूकार सोने को गिरवी रखकर कर्ज देते हैं। बीते दिनों सोने की कीमत में लगभग 20 प्रतिशत गिरावट दर्ज की गई है, लेकिन बैंकों द्वारा इसके बरक्स रिजर्व बैंक के निर्देशों की अनदेखी की वजह से गोल्ड लोन के गैर निष्पादित ऋण (एनपीए) होने का खतरा बढ़ गया है, क्योंकि सोने के और भी नरम होने की संभावना है। बहरहाल, गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों ने सावधानी बरतना शुरू कर दिया है। कर्जदार से सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिलने पर वे सोना नीलाम करा रही हैं। इसमें सोने के नकली होने के भी मामले सामने आ रहे हैं। फिलवक्त, एनपीए के कारण बैंकों की स्थिति खराब है। बैंकों का सकल एनपीए अनुपात मार्च 2013 में 3.26 प्रतिशत था, जो मार्च 2014 में बढ़कर 3.85 प्रतिशत हो गया। ध्यान देने वाली बात है कि बैंकों में अमूमन सोनार से सोने की शुद्धता की जांच कराकर गोल्ड लोन दिया जाता है। जहां ऐसी सुविधा नहीं होती है, वहां बैंककर्मी स्वयं सोने की शुद्धता जांचकर गोल्ड लोन देते हैं। सोनार की प्रतिबद्धता आमतौर पर बैंक के प्रति नहीं होती है। पैसों के लालच में सोनार द्वारा फर्जी प्रमाणपत्र देने के मामले प्रकाश में आए हैं, वहीं बैंककर्मिंयों के शुद्धता की जांच में कुशल नहीं होने के कारण गलती होने की गुंजाइश रहती है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतों का सीधा संबंध अमेरिकी अर्थव्यवस्था, अमेरिकी फेडरल रिजर्व के फैसले एवं डॉलर की मजबूती से है। इस दिशा में होने वाले बदलावों से ही अंतरराष्ट्रीय एवं घरेलू बाजार में सोने की कीमत तय होती है। मगर इसके बरक्स सोने की तस्करी की भूमिका से भी इंकार नहीं किया जा सकता है। हाल के दिनों में भारत में सोने की तस्करी एवं अधिक आयात शुल्क के कारण सोने के आयात में कमी आई है। सोने के आयात में कमी आने से चालू खाते के घाटे में राहत के संकेत मिल रहे हैं, लेकिन सोने में नरमी आने से बैंकों को मुश्किल का सामना करना पड़ सकता है। वर्तमान माहौल को बैंकिंग क्षेत्र के लिए अच्छा नहीं कहा जा सकता है।
अमेरिकी अर्थव्यवस्था में सुधार के संकेत, अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में इजाफा नहीं करने और डॉलर में मजबूती आने से सोने की कीमत में लगातार कमी आ रही है। जानकारों के मुताबिक इस साल के अंत तक अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमत घटकर 1100 डॉलर प्रति औंस हो सकती है। यह भी कहा जा रहा है कि 2015 के अंत तक इसकी कीमत कम होकर 800 डॉलर प्रति औंस से भी नीचे आ सकती है। अंतराराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमत में हो रही कमी का सीधा असर घरेलू बाजार पर पड़ रहा है। 5 नवम्बर को 39 महीनों के बाद सोने की कीमत 26 हजार रपए प्रति 10 ग्राम से नीचे उतर गई। आने वाले दिनों में सोने की कीमत 20 हजार रपए प्रति 10 ग्राम से भी नीचे जा सकती है। मालूम हो कि सोने के आयात-निर्यात से जुड़े सख्त नियमों एवं 10 प्रतिशत आयात शुल्क होने के कारण यह क्षेत्र दबाव में था। वित्त वर्ष 2013-14 में ज्वैलरी क्षेत्र में 11 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई थी। सितम्बर महीने में त्योहारों को ध्यान में रखते हुए 95 टन सोने का आयात किया गया था और त्योहार में आकलन के मुताबिक सोने की बंपर बिक्री भी हुई, जिससे इस क्षेत्र में 30 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। इधर, तीसरी तिमाही में नामचीन नियंतण्र स्वर्ण कंपनियों के मुनाफे में गिरावट दर्ज हुई है, तो छोटी एवं मझोली कंपनियों को भारी नुकसान उठाना पड़ा है। कनाडा की एग्निको इगल माइंस को 1.51 करोड़ डॉलर का शुद्ध नुकसान हुआ है, जबकि पिछले साल इसी तिमाही के दौरान कंपनी को 7.49 करोड़ डॉलर का मुनाफा हुआ था। यमन गोल्ड इंक ने भी एक अरब डॉलर का शुद्ध घाटा घोषित किया है, जबकि उसे पिछले साल इस दौरान 4.34 करोड़ डॉलर का शुद्ध लाभ हुआ था। हालत के प्रतिकूल होने के कारण प्रमुख खनन कंपनी बैरिक गोल्ड कॉर्प ने अपने उत्पादन अनुमान को कम किया है। कंपनी का कहना है कि 2015 में सोने के उत्पादन में और भी गिरावट दर्ज होगी। बावजूद, भारतीय बाजार पर इसका कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा क्योंकि विदेशों में भारत की तरह सोने के प्रति दीवानगी नहीं है। भारत में समाज का ताना-बाना इस तरह से बुना गया है कि यहां की महिलाएं सोना का प्रदर्शन करके गर्व का अनुभव करती हैं। शादी में बेटी को सोने का जेवर देने का चलन सदियों से चला आ रहा है। इस मानसिकता के कारण लोग सोने में निवेश करना सबसे बेहतर विकल्प मानते हैं। दूसरी वजह है सोने में निवेश के माध्यम से काले धन को आसानी से खपाया जाना। कुछ महीनों से स्विस बैंकों में जमा काला धन तस्करी के माध्यम से सोने के रूप में भारत लाया जा रहा है। एक अनुमान के मुताबिक हजारों टन सोना स्विट्जरलैंड से भारत लाया जा चुका है। सोने के भाव में नरमी का एक प्रमुख कारण इसे भी बताया जा रहा है। माना जा रहा है कि स्विस बैंकों में काला धन रखने वाले अधिकांश भारतीयों के खातों का बैलेंस इसी वजह से जीरो हुआ है। भारत में सोने की खरीद-फरोख्त पक्के बिल से नहीं होने और अकूत काला धन होने की वजह से सोने में तेजी के बावजूद इसकी बिक्री में कभी भी कमी नहीं आती है। भारत में सोने के प्रति दीवानगी को देखते हुए बैंकों ने गोल्ड लोन की मदद से एडवांस के पोर्टफोलियो में उल्लेखनीय बढ़ोतरी की है। पिछले साल सोने की कीमतों में गिरावट आने के बाद रिजर्व बैंक ने बैंकों को गोल्ड लोन में 40 प्रतिशत मार्जिन रखने के लिए कहा था, जबकि पूर्व में बैंकों को मार्जिन रखने की स्वतंत्रता थी। उस समय कुछ सरकारी बैंकों ने 70 प्रतिशत लोन टू वैल्यू (एलटीवी) का मानक रखा था। एलटीवी उस सीमा को कहते हैं जिसे ऋण के जोखिम के अनुसार तय किया जाता है। सोने का स्क्रेप वैल्यू 75 प्रतिशत माना गया है। स्क्रेप वैल्यू 24 कैरट सोने की कीमत होती है और इसे निर्धारित करते समय जेवर में से उसके बनाने की कीमत को घटा दिया जाता है। बहरहाल, ऋण देने के सिद्धांत की अनदेखी करते हुए बैंक सीमा से अधिक गोल्ड लोन दे रहे हैं, जबकि गोल्ड लोन को जोखिम वाला ऋण माना गया है। बीते महीने एक अनुसूचित बैंक में 33 करोड़ के फर्जी गोल्ड लोन का पता चला था। फिर भी गोल्ड लोन की वृद्धि दर 70 से 80 प्रतिशत रही है, जबकि पिछले चार वर्षो में बैंकों के अग्रिम में 16 से 17 प्रतिशत की दर से ही विकास हुआ है। जानकारों के मुताबिक यदि इस गति से बैंक गोल्ड लोन देते रहे तो 2016 तक गोल्ड लोन का पोर्टफोलियो कुल अग्रिम का सात प्रतिशत हो जाएगा। एक अनुमान के अनुसार गोल्ड लोन का बाजार लगभग एक लाख करोड़ रु पए का है। इसमें 60 प्रतिशत बाजार संगठित क्षेत्र का है। इस क्षेत्र में गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियां और बैंक दोनों शामिल हैं। गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) की बाजार हिस्सेदारी 75 से 80 प्रतिशत तक है। असंगठित क्षेत्र में सोने का कारोबार मोटे तौर पर ग्रामीण एवं कस्बाई क्षेत्र में है, जहां महाजन या साहूकार सोने को गिरवी रखकर कर्ज देते हैं। बीते दिनों सोने की कीमत में लगभग 20 प्रतिशत गिरावट दर्ज की गई है, लेकिन बैंकों द्वारा इसके बरक्स रिजर्व बैंक के निर्देशों की अनदेखी की वजह से गोल्ड लोन के गैर निष्पादित ऋण (एनपीए) होने का खतरा बढ़ गया है, क्योंकि सोने के और भी नरम होने की संभावना है। बहरहाल, गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों ने सावधानी बरतना शुरू कर दिया है। कर्जदार से सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिलने पर वे सोना नीलाम करा रही हैं। इसमें सोने के नकली होने के भी मामले सामने आ रहे हैं। फिलवक्त, एनपीए के कारण बैंकों की स्थिति खराब है। बैंकों का सकल एनपीए अनुपात मार्च 2013 में 3.26 प्रतिशत था, जो मार्च 2014 में बढ़कर 3.85 प्रतिशत हो गया। ध्यान देने वाली बात है कि बैंकों में अमूमन सोनार से सोने की शुद्धता की जांच कराकर गोल्ड लोन दिया जाता है। जहां ऐसी सुविधा नहीं होती है, वहां बैंककर्मी स्वयं सोने की शुद्धता जांचकर गोल्ड लोन देते हैं। सोनार की प्रतिबद्धता आमतौर पर बैंक के प्रति नहीं होती है। पैसों के लालच में सोनार द्वारा फर्जी प्रमाणपत्र देने के मामले प्रकाश में आए हैं, वहीं बैंककर्मिंयों के शुद्धता की जांच में कुशल नहीं होने के कारण गलती होने की गुंजाइश रहती है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतों का सीधा संबंध अमेरिकी अर्थव्यवस्था, अमेरिकी फेडरल रिजर्व के फैसले एवं डॉलर की मजबूती से है। इस दिशा में होने वाले बदलावों से ही अंतरराष्ट्रीय एवं घरेलू बाजार में सोने की कीमत तय होती है। मगर इसके बरक्स सोने की तस्करी की भूमिका से भी इंकार नहीं किया जा सकता है। हाल के दिनों में भारत में सोने की तस्करी एवं अधिक आयात शुल्क के कारण सोने के आयात में कमी आई है। सोने के आयात में कमी आने से चालू खाते के घाटे में राहत के संकेत मिल रहे हैं, लेकिन सोने में नरमी आने से बैंकों को मुश्किल का सामना करना पड़ सकता है। वर्तमान माहौल को बैंकिंग क्षेत्र के लिए अच्छा नहीं कहा जा सकता है।
(लेखक बैंकिंग क्षेत्र से जुड़े हैं)
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