प्रभावी न्याय की जरूरत
(भरत वसानी)
हमें इस बात को समझने की जरूरत है कि राष्ट्र की समृद्धि और उसके कानूनी ढांचे के बीच भी सहसंबंध होता है। भारत को निवेश के लिए एक आकर्षक जगह बनाने की दृष्टि से हमारी सरकार आर्थिक नीतियों पर गंभीरता से ध्यान दे रही है। इस क्रम में एक अहम पहलू जिसके बिना आर्थिक सुधारों से कोई खास मदद नहीं मिलेगी वह है न्यायिक सुधार। इसके लिए जरूरी है कि व्यापारिक मामलों में त्वरित व प्रभावी न्याय सुनिश्चित किया जाए और सभी को समय से न्याय मिले। वल्र्ड इकोनॉमिक रिफॉर्म और ग्लोबल इकोनॉमिक रिपोर्ट 2008-09 में राष्ट्र की समृद्धि और न्यायिक स्वतंत्रता तथा इसके कानूनी ढांचे की कुशलता के बीच सहसंबंध को दर्शाया गया है। स्पष्ट कानूनी ढांचे पर आधारित उचित, पारदर्शी और कुशल तरीके से विवाद समाधान का तंत्र पूंजी निवेश को बढ़ावा देने के लिए एक प्रमुख उपकरण है। विश्व बैंक की डुइंग बिजनेस रिपोर्ट-2014 दुनिया के 189 अर्थव्यवस्थाओं में घरेलू कंपनियों के लिए कारोबारी नियमों की तुलना करती है। इस रिपोर्ट में भारत को कारोबार करने की सुविधा अथवा सरलता की दृष्टि से 134वें पायदान पर रखा गया है। यह वाणिज्यिक विवाद को हल करने की प्रक्रियागत जटिलता, समय और लागत जैसे कारकों पर आधारित है।
अगर भारत बेहतर व्यापारी देश के तौर पर अपनी पहचान बनाना चाहता है तो आर्थिक सुधार एजेंडे के एकीकृत हिस्से में कुशल न्यायिक व्यवस्था पर ध्यान देना जरूरी है। दुखद है कि इस ओर नीति-निर्माताओं का ध्यान या तो कम है अथवा बिल्कुल फिर नहीं है। परिणामस्वरूप समय के साथ यह समस्या गंभीर होती जा रही है। त्वरित न्याय प्रक्रिया से देश के विभिन्न हिस्सों में परियोजनाओं के खिलाफ कानूनी लड़ाई में फंसे अरबों डॉलर की राशि मुक्त होगी जिनका उपयोग उत्पादक गतिविधियों में किया जा सकेगा। ऐसा न होने पर निवेशक किसी और देश का रुख करने को विवश होंगे। निवेशकों को त्वरित फैसले की दरकार होती है। न्याय विभाग के मुताबिक भारत में अधीनस्थ स्तर पर करीब 18,000 न्यायाधीश हैं। इस तरह देश में प्रति दस लाख लोगों पर 13 न्यायाधीश हैं। यह विकसित देशों में प्रति दस लाख पर 50 न्यायाधीशों और कुछ विकासशील देशों में 35-40 न्यायाधीशों की तुलना में काफी कम है। इंडिया स्पेंड द्वारा तैयार की गई एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक पूरे देश में विभिन्न स्तरों पर 3 करोड़ से भी अधिक मामले लंबित हैं। यह आंकड़ा निचली अदालतों में जहां 2.7 करोड़ है वहीं देश भर के 21 उच्च न्यायालयों में लंबित मामलों की संख्या 40 लाख के आसपास है। ऐसी स्थिति में किसी भी तरह की न्यायिक जरूरतों को पूरा करना असंभव हो सकता है। भारत में न्यायिक उत्पादकता का विश्लेषण हर वर्ष निपटाए जाने वाले मामलों और न्यायाधीशों की संख्या के अनुपात के आधार पर किया जा सकता है। क्रॉस ज्यूरिडिशनल अध्ययन में बताया गया कि दिल्ली में मामलों को निपटाने की दर 2005 में प्रतिवर्ष जहां 701 थी वहीं ऑस्ट्रेलिया के न्यायालयों में यह तुलनात्मक आंकड़ा 1,511 का था, जो तकरीबन दोगुना है।
वर्ष 2012 में जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय उच्च न्यायालयों द्वारा 17 लाख मामलों को निपटाए जाने के बाद भी लंबित मामलों की संख्या 2012 में 1.73 फीसद बढ़ी। अमेरिका में उच्चतम न्यायालय प्रति वर्ष जहां 55 मामले निपटाता है वहीं भारत में उच्चतम न्यायालय की सभी 13 पीठों के समक्ष प्रति सप्ताह सैकड़ों मामले पेश किए जाते हैं। वर्ष 2011 में उच्चतम न्यायालय के समक्ष कुल 77,000 नए मामले दाखिल किए गए। वर्ष 2012 की उच्चतम न्यायालय की रिपोर्ट बताती है कि पूरे देश में वर्ष 2011 में 2 करोड़ नए मामले दाखिल किए गए और लगभग इतनी ही संख्या में मामलों को निपटाया गया, लेकिन फिर भी बकाया मामलों की संख्या 3 करोड़ है और स्थिति जस की तस बनी हुई है।
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
(भरत वसानी)
हमें इस बात को समझने की जरूरत है कि राष्ट्र की समृद्धि और उसके कानूनी ढांचे के बीच भी सहसंबंध होता है। भारत को निवेश के लिए एक आकर्षक जगह बनाने की दृष्टि से हमारी सरकार आर्थिक नीतियों पर गंभीरता से ध्यान दे रही है। इस क्रम में एक अहम पहलू जिसके बिना आर्थिक सुधारों से कोई खास मदद नहीं मिलेगी वह है न्यायिक सुधार। इसके लिए जरूरी है कि व्यापारिक मामलों में त्वरित व प्रभावी न्याय सुनिश्चित किया जाए और सभी को समय से न्याय मिले। वल्र्ड इकोनॉमिक रिफॉर्म और ग्लोबल इकोनॉमिक रिपोर्ट 2008-09 में राष्ट्र की समृद्धि और न्यायिक स्वतंत्रता तथा इसके कानूनी ढांचे की कुशलता के बीच सहसंबंध को दर्शाया गया है। स्पष्ट कानूनी ढांचे पर आधारित उचित, पारदर्शी और कुशल तरीके से विवाद समाधान का तंत्र पूंजी निवेश को बढ़ावा देने के लिए एक प्रमुख उपकरण है। विश्व बैंक की डुइंग बिजनेस रिपोर्ट-2014 दुनिया के 189 अर्थव्यवस्थाओं में घरेलू कंपनियों के लिए कारोबारी नियमों की तुलना करती है। इस रिपोर्ट में भारत को कारोबार करने की सुविधा अथवा सरलता की दृष्टि से 134वें पायदान पर रखा गया है। यह वाणिज्यिक विवाद को हल करने की प्रक्रियागत जटिलता, समय और लागत जैसे कारकों पर आधारित है।
अगर भारत बेहतर व्यापारी देश के तौर पर अपनी पहचान बनाना चाहता है तो आर्थिक सुधार एजेंडे के एकीकृत हिस्से में कुशल न्यायिक व्यवस्था पर ध्यान देना जरूरी है। दुखद है कि इस ओर नीति-निर्माताओं का ध्यान या तो कम है अथवा बिल्कुल फिर नहीं है। परिणामस्वरूप समय के साथ यह समस्या गंभीर होती जा रही है। त्वरित न्याय प्रक्रिया से देश के विभिन्न हिस्सों में परियोजनाओं के खिलाफ कानूनी लड़ाई में फंसे अरबों डॉलर की राशि मुक्त होगी जिनका उपयोग उत्पादक गतिविधियों में किया जा सकेगा। ऐसा न होने पर निवेशक किसी और देश का रुख करने को विवश होंगे। निवेशकों को त्वरित फैसले की दरकार होती है। न्याय विभाग के मुताबिक भारत में अधीनस्थ स्तर पर करीब 18,000 न्यायाधीश हैं। इस तरह देश में प्रति दस लाख लोगों पर 13 न्यायाधीश हैं। यह विकसित देशों में प्रति दस लाख पर 50 न्यायाधीशों और कुछ विकासशील देशों में 35-40 न्यायाधीशों की तुलना में काफी कम है। इंडिया स्पेंड द्वारा तैयार की गई एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक पूरे देश में विभिन्न स्तरों पर 3 करोड़ से भी अधिक मामले लंबित हैं। यह आंकड़ा निचली अदालतों में जहां 2.7 करोड़ है वहीं देश भर के 21 उच्च न्यायालयों में लंबित मामलों की संख्या 40 लाख के आसपास है। ऐसी स्थिति में किसी भी तरह की न्यायिक जरूरतों को पूरा करना असंभव हो सकता है। भारत में न्यायिक उत्पादकता का विश्लेषण हर वर्ष निपटाए जाने वाले मामलों और न्यायाधीशों की संख्या के अनुपात के आधार पर किया जा सकता है। क्रॉस ज्यूरिडिशनल अध्ययन में बताया गया कि दिल्ली में मामलों को निपटाने की दर 2005 में प्रतिवर्ष जहां 701 थी वहीं ऑस्ट्रेलिया के न्यायालयों में यह तुलनात्मक आंकड़ा 1,511 का था, जो तकरीबन दोगुना है।
वर्ष 2012 में जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय उच्च न्यायालयों द्वारा 17 लाख मामलों को निपटाए जाने के बाद भी लंबित मामलों की संख्या 2012 में 1.73 फीसद बढ़ी। अमेरिका में उच्चतम न्यायालय प्रति वर्ष जहां 55 मामले निपटाता है वहीं भारत में उच्चतम न्यायालय की सभी 13 पीठों के समक्ष प्रति सप्ताह सैकड़ों मामले पेश किए जाते हैं। वर्ष 2011 में उच्चतम न्यायालय के समक्ष कुल 77,000 नए मामले दाखिल किए गए। वर्ष 2012 की उच्चतम न्यायालय की रिपोर्ट बताती है कि पूरे देश में वर्ष 2011 में 2 करोड़ नए मामले दाखिल किए गए और लगभग इतनी ही संख्या में मामलों को निपटाया गया, लेकिन फिर भी बकाया मामलों की संख्या 3 करोड़ है और स्थिति जस की तस बनी हुई है।
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें