अफगानिस्तान का संकट
(गौरीशंकर राजहंस)
इसमें कोई संदेह नहीं कि जब से अशरफ गनी अफगानिस्तान के राष्ट्रपति निर्वाचित हुए हैं, वहां की राजनीति बदल गई है। अपने शासन के अंतिम दिनों में करजई और अमेरिका के संबंध अत्यंत ही कटु हो गए थे। करजई का कहना था कि अमेरिका और नाटो की फौजें बिना मतलब ही अफगानिस्तान के देहाती क्षेत्रों में बमबारी करके निदरेष नागरिकों को मार रही हैं। करजई इस बात के भी खिलाफ थे कि अमेरिकी और नाटो फौज बिना किसी कारण रात के अंधेरे में लोगों की तलाशी लें और उन्हें तरह-तरह की यातनाएं दें। अमेरिका के साथ बढ़ती कटुता के कारण करजई उस संधि पर अंत तक हस्ताक्षर करने को तैयार नहीं हुए जिसमें यह प्रावधान था कि अमेरिकी और नाटो फौजों के अफगानिस्तान से जाने के बाद भी कुछ अमेरिकी सैनिक अफगानिस्तान में जमे रहेंगे और अफगानी फौज को सुरक्षा की ट्रेनिंग देंगे ताकि वे तालिबान से सफलतापूर्वक लड़ सकें। राष्ट्रपति निर्वाचित होने के तुरंत बाद अशरफ गनी ने अमेरिका के साथ एक संधि की जिसमें यह प्रावधान है कि 12,500 अमेरिकी और नाटो के फौजी अफगानिस्तान में बने रहेंगे। जानकारों के मुताबिक यह समझौता इसलिए किया गया है ताकि अफगान सरकार को अमेरिका से आर्थिक मदद मिल सके।
इसमें कोई संदेह नहीं कि जब से अशरफ गनी अफगानिस्तान के राष्ट्रपति निर्वाचित हुए हैं, वहां की राजनीति बदल गई है। अपने शासन के अंतिम दिनों में करजई और अमेरिका के संबंध अत्यंत ही कटु हो गए थे। करजई का कहना था कि अमेरिका और नाटो की फौजें बिना मतलब ही अफगानिस्तान के देहाती क्षेत्रों में बमबारी करके निदरेष नागरिकों को मार रही हैं। करजई इस बात के भी खिलाफ थे कि अमेरिकी और नाटो फौज बिना किसी कारण रात के अंधेरे में लोगों की तलाशी लें और उन्हें तरह-तरह की यातनाएं दें। अमेरिका के साथ बढ़ती कटुता के कारण करजई उस संधि पर अंत तक हस्ताक्षर करने को तैयार नहीं हुए जिसमें यह प्रावधान था कि अमेरिकी और नाटो फौजों के अफगानिस्तान से जाने के बाद भी कुछ अमेरिकी सैनिक अफगानिस्तान में जमे रहेंगे और अफगानी फौज को सुरक्षा की ट्रेनिंग देंगे ताकि वे तालिबान से सफलतापूर्वक लड़ सकें। राष्ट्रपति निर्वाचित होने के तुरंत बाद अशरफ गनी ने अमेरिका के साथ एक संधि की जिसमें यह प्रावधान है कि 12,500 अमेरिकी और नाटो के फौजी अफगानिस्तान में बने रहेंगे। जानकारों के मुताबिक यह समझौता इसलिए किया गया है ताकि अफगान सरकार को अमेरिका से आर्थिक मदद मिल सके।
यद्यपि करजई को अमेरिका ने ही 2001 में राष्ट्रपति की गद्दी पर बैठाया था, परंतु पिछले कुछ वर्षो से उनका व्यवहार अमेरिका के प्रति मित्रवत नहीं रह गया था। अब जबकि अमेरिका और नाटों की फौज अफगानिस्तान से लौटना शुरू कर चुकी हैं तो अशरफ गनी ने तालिबान के साथ समझौते के लिए तालिबानों के प्रतिनिधियों को यह समझाने का प्रयास किया कि उनका हित अफगानिस्तान की राष्ट्रीय सरकार के साथ सहयोग करने में ही है, खून-खराबा करने में नहीं। तालिबानों ने अशरफ गनी के प्रस्ताव को ठुकरा दिया और यह कहकर मजाक उड़ाया कि वे उस सरकार के साथ कैसे सहयोग कर सकते हैं जो 12,500 अमेरिकी फौजियों को अफगानिस्तान में डटे रहने की इजाजत दे रही है। अमेरिका के हस्तक्षेप से अशरफ गनी और अब्दुल्ला अब्दुल्ला के बीच सुलह तो हो गई, परंतु सरकार का कामकाज आगे नहीं बढ़ रहा है। नए मंत्रियों की नियुक्ति नहीं हो रही है और यह भी तय नहीं हो रहा है कि कौन से मंत्रलय अशरफ गनी के पास रहेंगे और कौन से अब्दुल्ला अब्दुल्ला के पास। इससे अफगानिस्तान के प्रशासन में एक उलझन की स्थिति पैदा हो गई है और किसी अफसर को सूझ नहीं रहा है कि वह किनके पास जाए। पिछले दिनों अफगानिस्तान के हेलमंड प्रांत से अमेरिका और नाटो की फौजें हट गईं। राष्ट्रपति अशरफ गनी ने अफगानिस्तान की राष्ट्रीय फौज को वहां तैनात करने का प्रयास किया, परंतु तालिबानों ने उनके इस प्रयास को विफल कर दिया। उन्होंने झट से हेलमंड प्रांत पर कब्जा कर लिया। हेलमंड में सबसे अधिक अफीम की खेती होती है और तस्करी भी। एक बार कब्जा होने के बाद लाख चाहने पर भी गनी सरकार उस क्षेत्र से तालिबानों को नहीं भगा सकेगी। भारत ने अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण के लिए अनथक प्रयास किया है।
संप्रग सरकार ने आठ अरब डॉलर की मदद की घोषणा की थी और मोदी सरकार ने भी दो अरब डॉलर मदद की घोषणा की है। अफगानिस्तान की सरकार के समक्ष दो प्रमुख समस्याएं हैं। एक तो क्षतिग्रस्त देश में इन्फ्रास्ट्रक्चर का फिर से निर्माण और दूसरा आम जनता की आतंकियों से रक्षा। भारत अफगान सरकार के कुछ फौजी जवानों को भारत में ट्रेनिंग दे रहा है, लेकिन सवाल यही है कि क्या अफगानिस्तान की कमजोर फौज तालिबानों का डटकर मुकाबला कर पाएगी? भारत सरकार का चिंतित होना स्वाभाविक है कि जब अमेरिका अफगानिस्तान से निकल जाएगा तब तालिबान जिस तरह का खूनी तांडव अफगानिस्तान में मचाएंगे उसका असर तो भारत पर भी पड़ेगा।
(लेखक पूर्व सांसद एवं पूर्व राजनयिक हैं)
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