मंगलवार, 18 नवंबर 2014

’एक्ट ईस्ट‘ के जरिए निर्णायक साझेदारी

’एक्ट ईस्ट‘ के जरिए निर्णायक साझेदारी
(रहीस सिंह)
म्यांमार से आस्ट्रेलिया तक भारत ने जिस तरह की उपस्थिति दर्ज कराई है उससे यह महसूस हो रहा है कि भारत संवाद और सक्रियता की विदेश नीति की राह पर तेजी से चल पड़ा है। संभव है कि जैसे-जैसे ‘लुक ईस्ट’ की नीति ‘एक्ट ईस्ट’ में रूपांतरित हो, वैसे-वैसे ‘लुक एट इंडिया’ और ‘मेक इन इंडिया’ का भारतीय प्रयोजन भी पूर्ण हो। प्रधानमंत्री को अपनी इस यात्रा के दौरान कुछ समय के लिए भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के भूगोल और इतिहास को एकाकार होते देखा गया। इसलिए यह भी संभव है कि प्रवासी भारतीयों सहित उन देशों के नागरिकों में भी भारत के प्रति सोचने और उसके साथ कार्य करने का नजरिया बदले। हां, अभी यह सवाल अवश्य शेष है कि क्या इससे एशिया-प्रशांत और हिंद महासागर की गरम हो रही लहरों को शांत करने का अवसर उपलब्ध हो पाएगा? प्रधानमंत्री की दस दिवसीय यात्रा की शुरुआत ‘ने पई ताव’ में हो रहे 12वें आसियान शिखर सम्मेलन के मंच से हुई। इस मंच पर भारत ने ‘थ्री सी’ यानी ‘कॉमर्स, कल्चर और कनेक्टिविटी’ संबंधी विजन पेश किया जिसके जरिए आसियान के साथ भारत के संबंधों को कई आयामों के साथ सुदृढ़ किया जा सकता है। हालांकि कुछ समय के लिए ऐसा लगा भी कि ने पई ताव में भारत और म्यांमार के भूगोल तथा इतिहास को एकाकार करने का नवोन्मेष हो रहा है, लेकिन इस संदर्भ में दो बातों पर गौर करने की आवश्यकता होगी। प्रथम- प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के समय से ही म्यांमार का रुख भारत के प्रति बदला है और द्वितीय- अमेरिका की पिछली विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन के प्रयासों के बाद से म्यांमार ने अपने आपको बदला, फलत: अमेरिका म्यांमार का सहयोगी बन गया। इसलिए म्यांमार के चारित्रिक बदलाव के कारण भारत भी अपने आपको बदलने लगा। हां, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अब तक के कूटनीतिक प्रयासों को सांस्कृतिक-ऐतिहासिक विरासत से जोड़ दिया ताकि म्यांमार का मनोवैज्ञानिक धरातल परिवर्तित हो सके। उन्होंने एक संबोधन के दौरान यह कहा भी कि भारत और म्यांमार का इतिहास बहुत जुड़ा हुआ है। आजादी का संघर्ष साथ-साथ किया है। हम सुख-दुख के साथी रहे हैं और आज भी यहां के लोग भारत को, एक पुण्य भूमि के रूप में, तथा भगवान बुद्ध के कारण बहुत आदरभाव से देखते हैं। हमारी कोशिश है, खास करके, हमारे पड़ोस के जो देश हैं, भारत उनके काम कैसे आए। प्रधानमंत्री की इस विदेश यात्रा के आयामों में जो प्रमुख हैं, वे हैं- मेक इन इंडिया, एक्ट ईस्ट और प्रवासियों बीच अपनी पैठ कायम करने की हरसंभव कोशिश करना। इन्हें कॉमर्स और कनेक्टिविटी से संबद्ध कर देखा जा सकता है। ऐसा लगता है कि इस यात्रा और इससे भी आगे आने वाली अन्य यात्राओं का एक गौण लेकिन महत्वपूर्ण आयाम और भी है, और वह है हिंदी के जरिए चीनी मंदारिन को काउंटर करना ताकि उसके सांस्कृतिक विस्तारवाद को कुछ कमजोर किया जा सके। हालांकि इस तरह का विस्तारवाद पूंजी निवेशों और कमोडिटी के विस्तार के साथ-साथ चलता है इसलिए अभी इसके परिणाम दिखने मुश्किल हैं, लेकिन यदि हिंदी का प्रयोग उद्देश्यपूर्ण ढंग से किया जाता है तो इसका लाभ भारत को मिलना चाहिए। ‘मेक इन इंडिया’ प्रधानमंत्री की एक बेहद महत्वाकांक्षी अवधारणा है। ने पई ताव में प्रधानमंत्री ने स्पष्ट किया कि पूरे विश्व को हम कह रहे हैं कि आइए, भारत में अपना नसीब आजमाइए और भारत के औद्योगिक विकास में आप शरीक हो जाइए। भारत में बहुत संभावनाएं पड़ी हैं, विकास के लिए बहुत अवसर पड़े हैं और दुनिया का सबसे युवा देश है भारत। यहां पर युवा कार्यशक्ति हमारे पास है। भारत द्वारा भूमंडलीकरण का हिस्सा बनने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी युवाओं की क्षमताओं को पहचानने सबसे ज्यादा दावा करते हैं। उन्हें मालूम है कि यदि इस युवाशक्ति का राष्ट्र निर्माण में प्रयोग नहीं किया गया तो यह दिशा भटक सकती है, जिसके परिणाम न उसके हित में होंगे और न ही देा के हित में। परंतु युवा क्षमता को वास्तविक परिणाम तक पहुंचाने के लिए दो तरह की आवश्यकताएं हैं। पहली आवश्यकता है पूंजी की और दूसरी नई टेक्नोलॉजी की। पूंजी और नई टेक्नोलॉजी ही इन युवाओं की क्षमता, योग्यता और कुशलता को दिशा दे सकती है। उल्लेखनीय है कि आसियान देशों के साथ भारत का द्विपक्षीय व्यापार इस समय मात्रात्मक उछाल की ओर है जो अब लगभग 80 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया है। दोनों पक्ष इसे 2015 तक 100 बिलियन डॉलर तक पहुंचाने और वर्ष 2022 तक दुगुने स्तर तक ले जाने के प्रति आास्त हैं। द्विपक्षीय निवेश में भी उछाल देखा जा रहा है। भारत में आसियान की ओर से पिछले आठ वर्षो में निवेश 27.9 बिलियन डॉलर का रहा है, जबकि आसियान में भारतीय निवेश 32.4 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया है। प्रधानमंत्री मोदी के आह्वान पर वियतनाम, थाईलैंड, मलेशिया, कंबोडिया, इंडोनेशिया, सिंगापुर सहित आसियान के नेताओं ने सकारात्मक रुख दिखाते हुए भारत की विकास गाथा में साझीदार बनने का वादा किया। हालांकि परिणाम आने में अभी समय लगेगा लेकिन जिस दिशा में भारतीय कूटनीति आगे बढ़ रही है, उससे सार्थक परिणामों की उम्मीद की जा सकती है। 1990 के दशक में जब भारत ने लुक ईस्ट नीति का चुनाव किया था, तब तक भारत का उद्देश्य दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों के साथ आर्थिक संबंधों को मजबूत करना अधिक था। दिसम्बर 2013 से इन संबंधों में तब आधारभूत परिवर्तन दिखा जब 10 आसियान देशों ने नई दिल्ली के साथ सामरिक समझौते भी संपन्न किए। यानी आसियान के साथ भारत के रिश्ते अब महज व्यापारिक नहीं हैं बल्कि इनका विस्तार संस्कृति से लेकर सुरक्षा तक है। इस हिसाब से वास्तव में अब दक्षिण-पूर्व एशिया को देखने ‘लुक’ का समय समाप्त हो गया है, अब कुछ करने (एक्ट) का वक्त है। लेकिन इससे आसियान देश उसी तरह से सशंकित न हो जाएं जिस प्रकार से वे चीन की सक्रियता से सशंकित हैं, इसलिए प्रधानमंत्री ने आसियान नेताओं को आास्त किया है कि भारत की ‘लुक ईस्ट’ नीति के ‘एक्ट ईस्ट’ नीति में परिवर्तित हो जाने से उन्हें सशंकित होने की जरूरत नहीं है। उन्होंने इन देशों को आश्वासन दिया कि वे स्वयं इस क्षेत्रीय संगठन के देशों के साथ भारत के संबंधों पर निजी रूप से ध्यान देंगे। यह संदेश मुख्य रूप से शायद चीन के लिए है क्योंकि वह लगातार भारत की दक्षिण-पूर्व एशिया अथवा एशिया-प्रशांत नीति पर नजर रख रहा है और बीच-बीच में इस पर प्रतिक्रिया भी जाहिर करता है। दरअसल चीन भारत की ‘लुक ईस्ट’ नीति को खुद को घेरने की रणनीति का हिस्सा मानता है। ऐसे में ‘एक्ट ईस्ट’
चीन को और अधिक आक्रामक बनाएगा। भारत को देखना होगा कि क्या चीन का इस तरह का व्यवहार भारत के लिए ठीक होगा। बहरहाल म्यांमार से आस्ट्रेलिया तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संवाद की मेधा ने भारत को अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज कराने का अवसर प्रदान किया है। अब देखना यह है कि प्रधानमंत्री दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों को स्फूर्त करने के लिए किस सीमा तक स्वयं को ‘मैन ऑफ एनर्जी’ के रूप में संस्थापित कर पाते हैं। फिलहाल तो ‘दक्षिण-पूर्व एशिया के इस प्रवेश द्वार’ के जरिए भारत की तस्वीर बदलने की रणनीति कामयाब होती दिख रही है।
(लेखक अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार हैं)

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