स्वर्ण सदुपयोग अभियान की जरूरत
(जयंतीलाल भंडारी)
हाल ही में प्रकाशित र्वल्ड गोल्ड काउंसिल (डब्ल्यूजीसी) की रिपोर्ट 2014 में कहा गया है कि भारत में घरों और मंदिरों में करीब 22 हजार टन सोने का संचय है। डब्ल्यूजीसी ने भारत के लिए 2020 के दृष्टिकोण पत्र में यह भी कहा है कि यदि भारत सरकार द्वारा घरों और मंदिरों में संचित सोने के कुछ भाग को उत्पादक रूप दे दिया जाए तो भारत में उद्योगों के विकास, रोजगार बढ़ाने, प्रतिभाओं के कौशल विकास तथा आम आदमी के चेहरे पर मुस्कराहट का नया खुशनुमा परिदृश्य दिखाई दे सकता है। निश्चित रूप से देश के विकास का नया अध्याय लिख रही मोदी सरकार को घरों और मंदिरों में संचित अनुत्पादक सोने को अर्थव्यवस्था के काम में लगाए जाने के रणनीतिक कदम उठाने चाहिए। इसका इस्तेमाल देश के बुनियादी ढांचे, कारोबार विकास, रोजगार पैदा करने, कौशल विकास, निर्यात बढ़ाने और राजस्व अर्जन के लिए किए जाने की रणनीति बनाई जानी चाहिए। इसे देश के वित्तीय, आर्थिक और सामाजिक ढांचे का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया जाना चाहिए। यह स्पष्ट है कि इस समय अर्थव्यवस्था को तेज गति देने के लिए संसाधनों की कमी है और इसी कारण बड़ी संख्या में लोग उद्योग-व्यवसाय में रोजगार संकट की पीड़ाओं का सामना करते हुए दिखाई दे रहे हैं। ऐसे में व्यवसायी तथा उद्यमियों के लिए सोने पर ऋण की आकर्षक योजनाएं बनाई जाएं तो इससे उद्योग-व्यवसाय को प्रोत्साहन मिलेगा। सोने के कारोबार से विदेशी मुद्रा की कमाई और बड़ी संख्या में रोजगार सृजन की रणनीति भी बनाई जानी चाहिए। इस समय देश से आठ अरब डॉलर के स्वर्ण आभूषणों का निर्यात किया जाता है और अब भारत को वर्ष 2020 तक इसका निर्यात पांच गुणा बढ़ाकर 40 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य रखना चाहिए। इसके आधार पर भारत को समूचे सोने के कारोबार की श्रृंखला में 50 लाख रोजगार सृजन का भी लक्ष्य लेकर आगे बढ़ना चाहिए। यदि देश के सोने का उपयोग रोजगार बढ़ाने एवं कौशल विकास के लिए किया जाएगा तो देश की प्रतिभाएं देश को आर्थिक महाशक्ति बना सकती हैं। वैश्वीकरण और निजीकरण के नए दौर में देश और दुनिया के उद्योग-कारोबार जगत के लिए नई बाजार जरूरतों के अनुरूप भारत की शिक्षित-प्रशिक्षित प्रतिभाओं की मांग बढ़ रही है, लेकिन देश में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा संस्थाओं की कमी और गरीब प्रतिभाशाली छात्रों के पास संसाधनों की कमी के कारण मांग के अनुरूप प्रतिभाओं की पूर्ति नहीं हो पा रही है। विश्व बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक विकसित देशों और कई विकासशील देशों में वर्ष 2020 तक कामकाजी जनसंख्या की भारी कमी होगी। भारत की बढ़ी हुई आबादी मानव संसाधन के परिप्रेक्ष्य में आर्थिक वरदान सिद्ध हो सकती है। लेकिन यह कटु सत्य है कि सरकार की छतरी के नीचे उद्यमपरक मानव संसाधन तैयार करने वाले गुणवत्तापूर्ण शैक्षणिक संस्थाओं की संख्या बहुत कमी है और सरकार के लिए छलांग लगाकर बढ़ती हुई छात्र संख्या के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और प्रशिक्षण के स्तर पर ठोस पहल संभव नहीं है। इतना ही नहीं, निजी क्षेत्र में प्रोफेशनल शिक्षा के जो गिने-चुने संस्थान हैं वहां प्रवेश और ऊंची फीस की व्यवस्था दुष्कर कार्य है। ऐसे में देश के मंदिरों के ट्रस्टों के माध्यम से उनके संचित सोने का उपयोग अधिक से अधिक गुणवत्तापूर्ण शैक्षणिक संस्थाओं की स्थापना एवं प्रतिभाओं को तराशने में किया जाना चाहिए। चूंकि संसाधनों एवं धन की कमी से देश के करोड़ों लोग शिक्षा व स्वास्थ्य और अच्छे जीवनस्तर की बुनियादी जरूरतों की पूर्ति से बहुत दूर हैं, इसलिए घरों एवं मंदिरों में संचित किंतु अनुत्पादक दिखाई दे रहे सोने के उपयोग से देश के मानवीय चेहरे पर भी कुछ चमक के लिए प्रयास किए जाने चाहिए। एक ओर जहां सोने को अर्थव्यवस्था के काम में लाए जाने के ठोस प्रयास हों, वहीं दूसरी ओर स्वर्ण आयात को नियंत्रित करने के भी रणनीतिक प्रयास होने चाहिए। यदि हम सोने की खरीदी का पिछला परिदृश्य देखें तो पाते हैं कि देश में छोटे-बड़े निवेशक सोने में निवेश को प्रतिफल के हिसाब से उपयुक्त मानते रहे हैं। इसीलिए बाजार में सोने की मांग बढ़ती गई है। देश में वर्ष 2012 में 864 टन सोना आयात किया गया, जबकि 2013 में यह बढ़कर 975 टन हो गया। यद्यपि सरकार ने बढ़ते चालू खाते के घाटे पर अंकुश लगाने के लिए सोने पर आयात शुल्क बढ़ाकर 10 फीसद कर दिया और रिजर्व बैंक ने इस पर सख्ती बढ़ाई है। इससे आयात में तेज वृद्धि नहीं हुई है लेकिन देश में अवैध रूप से सोना लाने की रफ्तार तेजी से बढ़ी है। र्वल्ड गोल्ड काउंसिल के मुताबिक वर्ष 2012 में देश में करीब 100 टन सोना अवैध रूप से लाया गया जो 2013 में दोगुना बढ़कर 200 टन हो गया है। इतना ही नहीं, वर्ष 2014 में भारत में 250 टन सोना अवैध रूप से आने का अनुमान है। गौरतलब है कि सोने के निरंतर बढ़ते वैध-अवैध आयात का यह परिदृश्य बता रहा है कि भारत के अधिकांश बचतकर्ता सोने की तरफ अधिक आकर्षित होते रहे हैं। यही कारण है कि कच्चे तेल के बाद देश के आयात में सबसे बड़ी हिस्सेदारी सोने की बनी हुई हैं। वस्तुत: सोने के बड़े पैमाने पर आयात की देश की अर्थव्यवस्था को भारी कीमत चुकानी पड़ रही है। सोने का अधिक आयात देश के लिए कई आर्थिक खतरों का कारण बना हुआ है। पिछले पांच वर्षो में सोने के आयात में जितनी धनराशि खर्च की गई यदि उसकी तुलना पिछले वर्ष की विभिन्न तरह की बचतों में किए गए निवेश से करें तो कई विचारणीय प्रश्न खड़े हो जाते हैं। पिछले पांच वर्षो में किए गए सोने के आयात पर लगाए गए धन की राशि इस अवधि में देश की सभी बीमा कंपनियों को मिले कुल प्रीमियम से भी अधिक रही। इतना ही नहीं, सोने के आयात की राशि देश में शेयरों, म्युचुअल फंड में लगी राशि अथवा आवास क्षेत्र, छोटी बचत, भविष्य निधि, डाक घर बचत आदि की तुलना में कई गुना अधिक थी। निर्यात कम होने और आयात बढ़ने से देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर असर पड़ रहा है। प्रतिवर्ष देश की जीडीपी का तीन फीसद धन सोने के रूप में अनुत्पादक पूंजी में बदल रहा है और इससे विकास दर प्रभावित हो रही है। फिलहाल सोने की कीमतें घटने का जो परिदृश्य दिखाई दे रहा है उससे सोने के आयात में कमी होगी। लेकिन सोने की मांग घटाने के अन्य सार्थक प्रयास किए जाने भी जरूरी हैं। सोने की मांग घटाने के लिए लोगों के सामाजिक और सांस्कृतिक रुख में बदलाव लाना जरूरी है। लोगो को यह समझाना होगा कि सोने में निवेश उत्पादक नहीं होता है। सोने के आयात को कम करने के ऐसे जन जागरूकता अभियान के साथ यह भी जरूरी है कि छोटी बचतों को आकर्षक बनाया जाए। सोने में निवेश करने वालों के कदम शेयर बाजार की ओर मोड़ने के लिए लोगों का शेयर बाजार में विास बढ़ाना होगा। उम्मीद है कि मोदी सरकार जिस तरह से मेक इन इंडिया और स्वच्छ भारत जैसे अभियान शुरू कर रही है, उसी तरह र्वल्ड गोल्ड काउंसिल के सुझावों के मद्देनजर संचित सोने के उपयोग के लिए नई रणनीति बनाकर स्वर्ण सदुपयोग अभियान चलाएगी। संचित सोने के सदुपयोग से देश की अर्थव्यवस्था और प्रतिभाएं आगे बढ़ेंगी। स्वास्थ्य, शिक्षा और अन्य नागरिक सुविधाओं में सुधार से आम आदमी के चेहरे पर भी कुछ मुस्कराहट आ सकेगी। संचित सोने का अधिकतम उत्पादक उपयोग आगामी वर्षो में भारत को दुनिया की आर्थिक महाशक्ति बनाने में सार्थक भूमिका निभा सकता है।
हाल ही में प्रकाशित र्वल्ड गोल्ड काउंसिल (डब्ल्यूजीसी) की रिपोर्ट 2014 में कहा गया है कि भारत में घरों और मंदिरों में करीब 22 हजार टन सोने का संचय है। डब्ल्यूजीसी ने भारत के लिए 2020 के दृष्टिकोण पत्र में यह भी कहा है कि यदि भारत सरकार द्वारा घरों और मंदिरों में संचित सोने के कुछ भाग को उत्पादक रूप दे दिया जाए तो भारत में उद्योगों के विकास, रोजगार बढ़ाने, प्रतिभाओं के कौशल विकास तथा आम आदमी के चेहरे पर मुस्कराहट का नया खुशनुमा परिदृश्य दिखाई दे सकता है। निश्चित रूप से देश के विकास का नया अध्याय लिख रही मोदी सरकार को घरों और मंदिरों में संचित अनुत्पादक सोने को अर्थव्यवस्था के काम में लगाए जाने के रणनीतिक कदम उठाने चाहिए। इसका इस्तेमाल देश के बुनियादी ढांचे, कारोबार विकास, रोजगार पैदा करने, कौशल विकास, निर्यात बढ़ाने और राजस्व अर्जन के लिए किए जाने की रणनीति बनाई जानी चाहिए। इसे देश के वित्तीय, आर्थिक और सामाजिक ढांचे का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया जाना चाहिए। यह स्पष्ट है कि इस समय अर्थव्यवस्था को तेज गति देने के लिए संसाधनों की कमी है और इसी कारण बड़ी संख्या में लोग उद्योग-व्यवसाय में रोजगार संकट की पीड़ाओं का सामना करते हुए दिखाई दे रहे हैं। ऐसे में व्यवसायी तथा उद्यमियों के लिए सोने पर ऋण की आकर्षक योजनाएं बनाई जाएं तो इससे उद्योग-व्यवसाय को प्रोत्साहन मिलेगा। सोने के कारोबार से विदेशी मुद्रा की कमाई और बड़ी संख्या में रोजगार सृजन की रणनीति भी बनाई जानी चाहिए। इस समय देश से आठ अरब डॉलर के स्वर्ण आभूषणों का निर्यात किया जाता है और अब भारत को वर्ष 2020 तक इसका निर्यात पांच गुणा बढ़ाकर 40 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य रखना चाहिए। इसके आधार पर भारत को समूचे सोने के कारोबार की श्रृंखला में 50 लाख रोजगार सृजन का भी लक्ष्य लेकर आगे बढ़ना चाहिए। यदि देश के सोने का उपयोग रोजगार बढ़ाने एवं कौशल विकास के लिए किया जाएगा तो देश की प्रतिभाएं देश को आर्थिक महाशक्ति बना सकती हैं। वैश्वीकरण और निजीकरण के नए दौर में देश और दुनिया के उद्योग-कारोबार जगत के लिए नई बाजार जरूरतों के अनुरूप भारत की शिक्षित-प्रशिक्षित प्रतिभाओं की मांग बढ़ रही है, लेकिन देश में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा संस्थाओं की कमी और गरीब प्रतिभाशाली छात्रों के पास संसाधनों की कमी के कारण मांग के अनुरूप प्रतिभाओं की पूर्ति नहीं हो पा रही है। विश्व बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक विकसित देशों और कई विकासशील देशों में वर्ष 2020 तक कामकाजी जनसंख्या की भारी कमी होगी। भारत की बढ़ी हुई आबादी मानव संसाधन के परिप्रेक्ष्य में आर्थिक वरदान सिद्ध हो सकती है। लेकिन यह कटु सत्य है कि सरकार की छतरी के नीचे उद्यमपरक मानव संसाधन तैयार करने वाले गुणवत्तापूर्ण शैक्षणिक संस्थाओं की संख्या बहुत कमी है और सरकार के लिए छलांग लगाकर बढ़ती हुई छात्र संख्या के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और प्रशिक्षण के स्तर पर ठोस पहल संभव नहीं है। इतना ही नहीं, निजी क्षेत्र में प्रोफेशनल शिक्षा के जो गिने-चुने संस्थान हैं वहां प्रवेश और ऊंची फीस की व्यवस्था दुष्कर कार्य है। ऐसे में देश के मंदिरों के ट्रस्टों के माध्यम से उनके संचित सोने का उपयोग अधिक से अधिक गुणवत्तापूर्ण शैक्षणिक संस्थाओं की स्थापना एवं प्रतिभाओं को तराशने में किया जाना चाहिए। चूंकि संसाधनों एवं धन की कमी से देश के करोड़ों लोग शिक्षा व स्वास्थ्य और अच्छे जीवनस्तर की बुनियादी जरूरतों की पूर्ति से बहुत दूर हैं, इसलिए घरों एवं मंदिरों में संचित किंतु अनुत्पादक दिखाई दे रहे सोने के उपयोग से देश के मानवीय चेहरे पर भी कुछ चमक के लिए प्रयास किए जाने चाहिए। एक ओर जहां सोने को अर्थव्यवस्था के काम में लाए जाने के ठोस प्रयास हों, वहीं दूसरी ओर स्वर्ण आयात को नियंत्रित करने के भी रणनीतिक प्रयास होने चाहिए। यदि हम सोने की खरीदी का पिछला परिदृश्य देखें तो पाते हैं कि देश में छोटे-बड़े निवेशक सोने में निवेश को प्रतिफल के हिसाब से उपयुक्त मानते रहे हैं। इसीलिए बाजार में सोने की मांग बढ़ती गई है। देश में वर्ष 2012 में 864 टन सोना आयात किया गया, जबकि 2013 में यह बढ़कर 975 टन हो गया। यद्यपि सरकार ने बढ़ते चालू खाते के घाटे पर अंकुश लगाने के लिए सोने पर आयात शुल्क बढ़ाकर 10 फीसद कर दिया और रिजर्व बैंक ने इस पर सख्ती बढ़ाई है। इससे आयात में तेज वृद्धि नहीं हुई है लेकिन देश में अवैध रूप से सोना लाने की रफ्तार तेजी से बढ़ी है। र्वल्ड गोल्ड काउंसिल के मुताबिक वर्ष 2012 में देश में करीब 100 टन सोना अवैध रूप से लाया गया जो 2013 में दोगुना बढ़कर 200 टन हो गया है। इतना ही नहीं, वर्ष 2014 में भारत में 250 टन सोना अवैध रूप से आने का अनुमान है। गौरतलब है कि सोने के निरंतर बढ़ते वैध-अवैध आयात का यह परिदृश्य बता रहा है कि भारत के अधिकांश बचतकर्ता सोने की तरफ अधिक आकर्षित होते रहे हैं। यही कारण है कि कच्चे तेल के बाद देश के आयात में सबसे बड़ी हिस्सेदारी सोने की बनी हुई हैं। वस्तुत: सोने के बड़े पैमाने पर आयात की देश की अर्थव्यवस्था को भारी कीमत चुकानी पड़ रही है। सोने का अधिक आयात देश के लिए कई आर्थिक खतरों का कारण बना हुआ है। पिछले पांच वर्षो में सोने के आयात में जितनी धनराशि खर्च की गई यदि उसकी तुलना पिछले वर्ष की विभिन्न तरह की बचतों में किए गए निवेश से करें तो कई विचारणीय प्रश्न खड़े हो जाते हैं। पिछले पांच वर्षो में किए गए सोने के आयात पर लगाए गए धन की राशि इस अवधि में देश की सभी बीमा कंपनियों को मिले कुल प्रीमियम से भी अधिक रही। इतना ही नहीं, सोने के आयात की राशि देश में शेयरों, म्युचुअल फंड में लगी राशि अथवा आवास क्षेत्र, छोटी बचत, भविष्य निधि, डाक घर बचत आदि की तुलना में कई गुना अधिक थी। निर्यात कम होने और आयात बढ़ने से देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर असर पड़ रहा है। प्रतिवर्ष देश की जीडीपी का तीन फीसद धन सोने के रूप में अनुत्पादक पूंजी में बदल रहा है और इससे विकास दर प्रभावित हो रही है। फिलहाल सोने की कीमतें घटने का जो परिदृश्य दिखाई दे रहा है उससे सोने के आयात में कमी होगी। लेकिन सोने की मांग घटाने के अन्य सार्थक प्रयास किए जाने भी जरूरी हैं। सोने की मांग घटाने के लिए लोगों के सामाजिक और सांस्कृतिक रुख में बदलाव लाना जरूरी है। लोगो को यह समझाना होगा कि सोने में निवेश उत्पादक नहीं होता है। सोने के आयात को कम करने के ऐसे जन जागरूकता अभियान के साथ यह भी जरूरी है कि छोटी बचतों को आकर्षक बनाया जाए। सोने में निवेश करने वालों के कदम शेयर बाजार की ओर मोड़ने के लिए लोगों का शेयर बाजार में विास बढ़ाना होगा। उम्मीद है कि मोदी सरकार जिस तरह से मेक इन इंडिया और स्वच्छ भारत जैसे अभियान शुरू कर रही है, उसी तरह र्वल्ड गोल्ड काउंसिल के सुझावों के मद्देनजर संचित सोने के उपयोग के लिए नई रणनीति बनाकर स्वर्ण सदुपयोग अभियान चलाएगी। संचित सोने के सदुपयोग से देश की अर्थव्यवस्था और प्रतिभाएं आगे बढ़ेंगी। स्वास्थ्य, शिक्षा और अन्य नागरिक सुविधाओं में सुधार से आम आदमी के चेहरे पर भी कुछ मुस्कराहट आ सकेगी। संचित सोने का अधिकतम उत्पादक उपयोग आगामी वर्षो में भारत को दुनिया की आर्थिक महाशक्ति बनाने में सार्थक भूमिका निभा सकता है।
(लेखक आर्थिक मामलों के जानकार हैं)
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