अल- नीनो :संभावित खतरे एवं तैयारियाँ
IAS/PSC की प्रारम्भिक तथा मुख्य परीक्षा के लिए एनवायरनमेंट से सम्बंधित महत्वपूर्ण टॉपिक
भारत एक कृषि प्रधान देश है। हमारी अर्थव्यवस्था कृषि पर आधारित है तथा कृषि मानसून पर निर्भर है। हाल ही में अल-नीनो के सक्रीय होने की घोषणा विभीन्न मोसम विज्ञानियों द्वारा की जा रही है ,इसी अलोक में अल-नीनो को भारतीय भूगोल, पर्यावरण, इकॉनमी जैसे टॉपिक से सम्बन्ध कर प्रशन पूछे जाने की अत्यधिक सम्भवनायें बन रही हैं।
क्या है अल-नीनो -------
*स्पेनी भाषा के इस अतिमहत्वपूर्ण भौगोलिक शब्द का अर्थ क्रमशः ‘छोटा लड़का’ तथा ‘छोटी लड़की’ है। अल–नीनो शब्द का अर्थ ‘शिशु क्राइस्ट’ भी है जो इस शब्द के उत्पत्ति से संबंध रखता है।
*आरंभ में, दक्षिणी अमेरिका के पश्चिम तटीय देश पेरू एवं इक्वेडोर के समुद्री मछुआरों द्वारा, प्रतिवर्ष क्रिसमस के आसपास प्रशांत महासागरीय धारा के तापमान में होनेवाली वृद्धि को अल नीनो कहा जाता था। किंतु आज इस शब्द का इस्तेमाल उष्णकटिवंधीय क्षेत्र में केन्द्रीय और पूर्वी प्रशांत महासागरीय जल के औसत सतही तापमान में कुछ अंतराल पर असामान्य रूप से होने वाली वृद्धि और इसके परिणामस्वरूप होनेवाले विश्वव्यापी प्रभाव के लिए किया जाता है।
*1960 ईस्वी के आसपास अलनीनो के प्रभाव को व्यापक रूप से आँका गया और पता चला कि यह ‘बाल शिशु’ सिर्फ पेरू के तटीय हिस्सों में नहीं घूमता बल्कि हिंद महासागर की मौनसूनी हवाएँ भी इसके इशारे पर नाचती है।
*पेरू के इस लाडले ने अपना प्रभाव संपूर्ण उष्णकटिबंधीय प्रशांत क्षेत्र की बाढ लाने वाली भारी वर्षा से लेकर आस्ट्रेलिया में पड़नेवाले सूखे तक बना रखा है।
*अल–नीनो की छोटी बहन ला–नीना ह्यळा स्वभाव में ठीक इसके विपरित है क्योंकि इसके आने पर विषुवतीय प्रशांत महासागर के पूर्वी तथा मध्य भाग में समुद्री सतह के औसत तापमान में असामान्य रूप से ठंडी स्थिति पायी जाती है।
*कई मौसम विज्ञानी इसे ‘अल वेइजो’ अथवा ‘कोल्ड इवेंट’ कहना पसंद करते हैं। विषुवतीय प्रशांत क्षेत्र में 2 से लेकर 7 वर्ष के अंतराल पर असामान्य रूप से आने वाली अल–नीनो की स्थिति के चलते समुद्र सतह का औसत तापमान 5 डिग्री तक बढ जाता है और व्यापारिक पवनों में वृहत पैमाने पर कमी आती है।
*अल नीनो की घटना हमेशा से आती रही है किंतु वैज्ञानिक तौर पर इसकी व्याख्या 1960 के आसपास की गई।* लगभग 100 वर्ष पूर्व से उपलब्ध आँकड़े यह बताते हैं कि शहरीकरण और औ.द्योगिकरण के पूर्व से ही अल–नीनो आते रहे हैं इसलिए प्रदूषण या ग्लोबल वार्मिंग को लेकर इसके बारे में चिंतित होने की जरूरत नहीं।
* 1891 इस्वी में पेरू की राजधानी लीमा में वहाँ की भौगोलिक सोसाईटी के अध्यक्ष डा• लुईस कैरेंजा ने पीटा और पैकासाम्यो बंदरगाह के बीच पेरू जलधारा के विपरित उत्तर से दक्षिण की ओर बहनेवाली प्रतिजलधारा की ओर सर्वप्रथम ध्यान आकृष्ट किया।
*पीटा बंदरगाह के समुद्री मछुआरों ने ही सबसे पहले इसे अल–नीनो नाम दिया।
हाल ही में चर्चित क्यों---
*विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) ने अल-नीनो के बारे में ताजा अनुमान जारी किया है जो भारत के लिए संकट पैदा करने वाला है।
डब्ल्यूएमओ के अनुसार अल-नीनो के कारण जून से अगस्त तक भारत, मलयेशिया, थाइलैंड, पूर्वी आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और जापान में भयानक सूखा पड़ सकता है तो दक्षिण अमेरिका के पूर्वी और पश्चिमी तटीय देश और उत्तरी अमेरिका के पश्चिमी तट और प्रशांत महासागर के मध्य भाग में जमकर बारिश होगी।
भारत पर संभवित प्रभाव------------
* डब्ल्यूएमओ ने अल-नीनो के बारे में जो बुलेटिन जारी किया है, उसमें कहा गया है कि इसका असर कितना और कहा होगा, इसका ठीक से अनुमान नहीं लगाया जा सकता है, लेकिन इसकी प्रगति को देखते हुए इसका भारतीय मानसून पर विपरीत असर पड़ेगा ।
*देश में मानसून की बारिश एक जून से 30 सितम्बर तक होती है. भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) डब्ल्यूएमओ के अनुमान पर कुछ बोलने को तैयार नहीं है.
आईएमडी का पुणो स्थित केंद्र अल-नीनो का सघन अध्ययन कर रहा है. यह अल-नीनो कमजोर रहेगा, मध्यम होगा या मजबूत होगा, इसका भी पता नहीं है. अप्रैल के अंत तक मौसम विभाग आगामी मानसून और अल-नीनो प्रभाव का अनुमान पेश करेगा ।
पूर्व में अल-नीनो-----------
*गौरतलब है कि वर्ष 1952 से अब तक 24 बार अल-नीनो प्रभाव आया है जिसमें से आठ बार कमजोर, नौ बार मध्यम और पांच बार मजबूत था. वर्ष 2002 और 2009 में मध्यम श्रेणी का अल-नीनो था. उस वक्त देश में सूखा पड़ा था।
*वर्ष 2002 में करीब 29 प्रतिशत कम बारिश हुई थी जबकि वर्ष 2009 में शुरुआती मानसून में सूखा पड़ा और बाद में ठीक बारिश हुई थी। पहले समय से वष्रा न होने के कारण किसान धान की खेती नहीं कर पाये थे।
अल -नीनो एवं अर्थव्यवस्था-------------
*वर्ष 1997 में मजबूत अल-नीनो था तब भी भारत में सूखे की स्थिति 7 में मजबूत अल-नीनो था तब भी भारत में सूखे की स्थिति थी।
*संभावित अल नीनो से मानसूनी बारिश में करीब पांच प्रतिशत की कमी हो सकती है और वित्त वर्ष 2014-15 में इससे आर्थिक वृद्धि दर 1.75 प्रतिशत तक प्रभावित हो सकती है।
*जिसका लाखों अकुशल लोगों के रोजगार पर असर होगा। यह बात ऐसोचैम की एक रपट में कही गई है। रपट में कहा गया कि बारिश की कमी से खाद्य मुद्रास्फीति भी प्रभावित हो सकती है जो नीति निर्माताओं के लिए चिंता का विषय रही है। रपट के मुताबिक ‘‘अल-नीनो के कारण बारिश पांच प्रतिशत तक कम हो सकती है जिससे सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर 1.75 प्रतिशत प्रभावित हो सकती है और इस तरह घरेलू उत्पाद का 1,80,000 करोड़ रुपए का नुकसान हो सकता है और कृषि आदि क्षेत्रों जिससे लाखों अकुशल लोगों का रोजगार प्रभावित होगा।
* देश का करीब 60 प्रतिशत कृषि क्षेत्र वर्षा पर निर्भर हैऔर बारिश यदि एक प्रतिशत कम होती है तो वृद्धि 0.35 प्रतिशत कम होगी।
सरकार की संभवित तॆयारी-----------
*सरकार मुख्यत: ,निम्न एरिया पर फोकस कर रही है-
(1) खरीब की कम समय में पकने वाले बीजों की वॆरायीटी उपलब्ध करवाना।
(2)नमी लम्बे समय तक उपलब्ध करवाए जा सकने वाले बीज उपलब्ध करवाना।
(3)फसल एवं मिट्टी की जरूरत के हिसाब से उचित फ़र्टिलाइज़र उपलब्ध करवाना।
(4)विभीन्न संगोष्ठीयों द्वारा किसानों को जागरूक बनाना।
(5) रास्ट्रीय, राज्य एवं जिला आपदा प्रबंधन को सचेत करना तथा इनके मध्य बहतर तालमेल सुनिश्चित करना।
(6)विभीन्न गॆर सरकारी संगठनों की मदद लेना।
(7)इंटरनेशनल स्तर पर अन्य देशों से सुचनाए साझा करना तथा समन्वित प्रयास करना।
(8)किसानों के संभावित नुकसान के आकलन का प्रयास करना
IAS/PSC की प्रारम्भिक तथा मुख्य परीक्षा के लिए एनवायरनमेंट से सम्बंधित महत्वपूर्ण टॉपिक
भारत एक कृषि प्रधान देश है। हमारी अर्थव्यवस्था कृषि पर आधारित है तथा कृषि मानसून पर निर्भर है। हाल ही में अल-नीनो के सक्रीय होने की घोषणा विभीन्न मोसम विज्ञानियों द्वारा की जा रही है ,इसी अलोक में अल-नीनो को भारतीय भूगोल, पर्यावरण, इकॉनमी जैसे टॉपिक से सम्बन्ध कर प्रशन पूछे जाने की अत्यधिक सम्भवनायें बन रही हैं।
क्या है अल-नीनो -------
*स्पेनी भाषा के इस अतिमहत्वपूर्ण भौगोलिक शब्द का अर्थ क्रमशः ‘छोटा लड़का’ तथा ‘छोटी लड़की’ है। अल–नीनो शब्द का अर्थ ‘शिशु क्राइस्ट’ भी है जो इस शब्द के उत्पत्ति से संबंध रखता है।
*आरंभ में, दक्षिणी अमेरिका के पश्चिम तटीय देश पेरू एवं इक्वेडोर के समुद्री मछुआरों द्वारा, प्रतिवर्ष क्रिसमस के आसपास प्रशांत महासागरीय धारा के तापमान में होनेवाली वृद्धि को अल नीनो कहा जाता था। किंतु आज इस शब्द का इस्तेमाल उष्णकटिवंधीय क्षेत्र में केन्द्रीय और पूर्वी प्रशांत महासागरीय जल के औसत सतही तापमान में कुछ अंतराल पर असामान्य रूप से होने वाली वृद्धि और इसके परिणामस्वरूप होनेवाले विश्वव्यापी प्रभाव के लिए किया जाता है।
*1960 ईस्वी के आसपास अलनीनो के प्रभाव को व्यापक रूप से आँका गया और पता चला कि यह ‘बाल शिशु’ सिर्फ पेरू के तटीय हिस्सों में नहीं घूमता बल्कि हिंद महासागर की मौनसूनी हवाएँ भी इसके इशारे पर नाचती है।
*पेरू के इस लाडले ने अपना प्रभाव संपूर्ण उष्णकटिबंधीय प्रशांत क्षेत्र की बाढ लाने वाली भारी वर्षा से लेकर आस्ट्रेलिया में पड़नेवाले सूखे तक बना रखा है।
*अल–नीनो की छोटी बहन ला–नीना ह्यळा स्वभाव में ठीक इसके विपरित है क्योंकि इसके आने पर विषुवतीय प्रशांत महासागर के पूर्वी तथा मध्य भाग में समुद्री सतह के औसत तापमान में असामान्य रूप से ठंडी स्थिति पायी जाती है।
*कई मौसम विज्ञानी इसे ‘अल वेइजो’ अथवा ‘कोल्ड इवेंट’ कहना पसंद करते हैं। विषुवतीय प्रशांत क्षेत्र में 2 से लेकर 7 वर्ष के अंतराल पर असामान्य रूप से आने वाली अल–नीनो की स्थिति के चलते समुद्र सतह का औसत तापमान 5 डिग्री तक बढ जाता है और व्यापारिक पवनों में वृहत पैमाने पर कमी आती है।
*अल नीनो की घटना हमेशा से आती रही है किंतु वैज्ञानिक तौर पर इसकी व्याख्या 1960 के आसपास की गई।* लगभग 100 वर्ष पूर्व से उपलब्ध आँकड़े यह बताते हैं कि शहरीकरण और औ.द्योगिकरण के पूर्व से ही अल–नीनो आते रहे हैं इसलिए प्रदूषण या ग्लोबल वार्मिंग को लेकर इसके बारे में चिंतित होने की जरूरत नहीं।
* 1891 इस्वी में पेरू की राजधानी लीमा में वहाँ की भौगोलिक सोसाईटी के अध्यक्ष डा• लुईस कैरेंजा ने पीटा और पैकासाम्यो बंदरगाह के बीच पेरू जलधारा के विपरित उत्तर से दक्षिण की ओर बहनेवाली प्रतिजलधारा की ओर सर्वप्रथम ध्यान आकृष्ट किया।
*पीटा बंदरगाह के समुद्री मछुआरों ने ही सबसे पहले इसे अल–नीनो नाम दिया।
हाल ही में चर्चित क्यों---
*विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) ने अल-नीनो के बारे में ताजा अनुमान जारी किया है जो भारत के लिए संकट पैदा करने वाला है।
डब्ल्यूएमओ के अनुसार अल-नीनो के कारण जून से अगस्त तक भारत, मलयेशिया, थाइलैंड, पूर्वी आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और जापान में भयानक सूखा पड़ सकता है तो दक्षिण अमेरिका के पूर्वी और पश्चिमी तटीय देश और उत्तरी अमेरिका के पश्चिमी तट और प्रशांत महासागर के मध्य भाग में जमकर बारिश होगी।
भारत पर संभवित प्रभाव------------
* डब्ल्यूएमओ ने अल-नीनो के बारे में जो बुलेटिन जारी किया है, उसमें कहा गया है कि इसका असर कितना और कहा होगा, इसका ठीक से अनुमान नहीं लगाया जा सकता है, लेकिन इसकी प्रगति को देखते हुए इसका भारतीय मानसून पर विपरीत असर पड़ेगा ।
*देश में मानसून की बारिश एक जून से 30 सितम्बर तक होती है. भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) डब्ल्यूएमओ के अनुमान पर कुछ बोलने को तैयार नहीं है.
आईएमडी का पुणो स्थित केंद्र अल-नीनो का सघन अध्ययन कर रहा है. यह अल-नीनो कमजोर रहेगा, मध्यम होगा या मजबूत होगा, इसका भी पता नहीं है. अप्रैल के अंत तक मौसम विभाग आगामी मानसून और अल-नीनो प्रभाव का अनुमान पेश करेगा ।
पूर्व में अल-नीनो-----------
*गौरतलब है कि वर्ष 1952 से अब तक 24 बार अल-नीनो प्रभाव आया है जिसमें से आठ बार कमजोर, नौ बार मध्यम और पांच बार मजबूत था. वर्ष 2002 और 2009 में मध्यम श्रेणी का अल-नीनो था. उस वक्त देश में सूखा पड़ा था।
*वर्ष 2002 में करीब 29 प्रतिशत कम बारिश हुई थी जबकि वर्ष 2009 में शुरुआती मानसून में सूखा पड़ा और बाद में ठीक बारिश हुई थी। पहले समय से वष्रा न होने के कारण किसान धान की खेती नहीं कर पाये थे।
अल -नीनो एवं अर्थव्यवस्था-------------
*वर्ष 1997 में मजबूत अल-नीनो था तब भी भारत में सूखे की स्थिति 7 में मजबूत अल-नीनो था तब भी भारत में सूखे की स्थिति थी।
*संभावित अल नीनो से मानसूनी बारिश में करीब पांच प्रतिशत की कमी हो सकती है और वित्त वर्ष 2014-15 में इससे आर्थिक वृद्धि दर 1.75 प्रतिशत तक प्रभावित हो सकती है।
*जिसका लाखों अकुशल लोगों के रोजगार पर असर होगा। यह बात ऐसोचैम की एक रपट में कही गई है। रपट में कहा गया कि बारिश की कमी से खाद्य मुद्रास्फीति भी प्रभावित हो सकती है जो नीति निर्माताओं के लिए चिंता का विषय रही है। रपट के मुताबिक ‘‘अल-नीनो के कारण बारिश पांच प्रतिशत तक कम हो सकती है जिससे सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर 1.75 प्रतिशत प्रभावित हो सकती है और इस तरह घरेलू उत्पाद का 1,80,000 करोड़ रुपए का नुकसान हो सकता है और कृषि आदि क्षेत्रों जिससे लाखों अकुशल लोगों का रोजगार प्रभावित होगा।
* देश का करीब 60 प्रतिशत कृषि क्षेत्र वर्षा पर निर्भर हैऔर बारिश यदि एक प्रतिशत कम होती है तो वृद्धि 0.35 प्रतिशत कम होगी।
सरकार की संभवित तॆयारी-----------
*सरकार मुख्यत: ,निम्न एरिया पर फोकस कर रही है-
(1) खरीब की कम समय में पकने वाले बीजों की वॆरायीटी उपलब्ध करवाना।
(2)नमी लम्बे समय तक उपलब्ध करवाए जा सकने वाले बीज उपलब्ध करवाना।
(3)फसल एवं मिट्टी की जरूरत के हिसाब से उचित फ़र्टिलाइज़र उपलब्ध करवाना।
(4)विभीन्न संगोष्ठीयों द्वारा किसानों को जागरूक बनाना।
(5) रास्ट्रीय, राज्य एवं जिला आपदा प्रबंधन को सचेत करना तथा इनके मध्य बहतर तालमेल सुनिश्चित करना।
(6)विभीन्न गॆर सरकारी संगठनों की मदद लेना।
(7)इंटरनेशनल स्तर पर अन्य देशों से सुचनाए साझा करना तथा समन्वित प्रयास करना।
(8)किसानों के संभावित नुकसान के आकलन का प्रयास करना
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