गुरुवार, 6 नवंबर 2014

दक्षिणी चीन सागर - भू राजनैतिक संघर्ष क्षेत्र

दक्षिणी चीन सागर - भू राजनैतिक संघर्ष क्षेत्रGeo Political conflic-zone :--

विस्तृत प्रशांत महासागर का एक हिस्सा दक्षिण चीन सागर है, जो करीब 36 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है और यह ‘अलीबाबा की गुफाओं’ की तरह ही है। न जाने कितना सारा तेल और गैस भंडार इसके भीतर छिपे हुए हैं, इस पर अभी कयास ही लग रहा है और इसलिए भी यह ‘विवाद का विषय’ बना हुआ है कि वहां कुछ है भी या नहीं। इसके भविष्य को न देखें, तब भी इसका वर्तमान बताता है कि इस पूरे समुद्री इलाके से दुनिया का एक तिहाई पोत-परिवहन होता है। इसकाएक वर्तमान तथ्य यह भी है कि चीन इसके बड़े हिस्से पर अपनी संप्रभुता का दावा करता है। इसकी वजह से ही यह इलाका आजकल सुर्खियोंमें रहता है।विवाद इस सागर का ही नहीं, इसके द्वीप समूहों को लेकर भी है। दक्षिण चीन सागर में चीन के अलावा, तीन बड़े ‘प्लेयर’ हैं- जापान, वियतनाम और फिलीपींस। इस विवाद को और बड़ा करके देखें, तो इसमें मलयेशिया और ब्रूनेई के दावे भी जुड़ते हैं। सबके अपने-अपने दावे और इन पर अधिकार के अपने-अपने तर्क हैं। अब अगर चीन अपना दावा सबसे आगे रखता है, तो इसका अर्थ क्या निकाला जाए? इसे ‘संप्रभुता’ के उसके दावे के अर्थ में समझना होगा।एशिया में आज क्षेत्रीय संप्रभुता के मुद्दे बड़े ही कट्टर तरीके से उठाए जाते हैं। जहां भी क्षेत्रीय विवाद के मुद्दे उठते हैं, वहां काफी कड़ा रवैया अपनाया जाता है। 30 सितंबर को अमेरिका में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा का दक्षिण चीन सागर का संयुक्त बयान आया, इस पर चीन ने भी अपना पक्ष रखा है।इसमें कोई दोराय नहीं कि दक्षिण चीन सागर में चीन की स्थिति मजबूत है और वह इस पर अपना अधिकार जताने के लिए हर तरीका अपनाता आया है। पहला तरीका कूटनीतिक है। अक्सर यह दिखा है कि दक्षिण चीन सागर के मसले पर जिन देशों के साथ चीन का विवाद है, उन सभी छोटे-छोटे देशों से चीन अलग-अलग बातचीत करता है, उनके साथ अलग-अलग समझौते करता है । वैसे भी बड़ी अर्थवयवस्था से रिश्ते बनाने में परहेज किसे होता है? बहरहाल, चीन की इस कोशिश को ऐसे देखा जाना चाहिए कि वह नहीं चाहता कि ये देश दक्षिण चीन सागर के मसले पर उसका एकजुट होकर विरोध करें या कोई गठबंधन खड़ा कर लें।इस इलाके में चीन दूसरा तरीका अपनीसैन्य शक्ति से जाहिर करता है। एक अनुमान के मुताबिक, चीन अपने रक्षाबजट में हर साल दस फीसदी से अधिक कीबढ़ोतरी कर रहा है। उसका रक्षा बजटदुनिया में दूसरे स्थान पर है और यह एक संकेत है कि देश का लक्ष्य अपनी मजबूत सैन्य उपस्थिति को दर्ज कराना है। इसका असर प्रशांत महासागरीय क्षेत्र पर साफ रूप से दिख रहा है। तभी तो इस सागर क्षेत्र को लेकर भले कुछ देशों के साथ चीन के विवाद हों, पर तनाव के हालात नहीं हैं। तीसरा तरीका इतिहास है। दक्षिण चीन सागर को लेकर पिछले दो-तीन वर्षों में चीन की तरफ से इतना इतिहास परोसा गया है और उसे प्रचारित किया गया है कि ऐसा लगता है कि यह हिस्सा चीन का हीहै। हालांकि चीन के अलावा, अन्य दावेदार देशों ने भी कमोबेश यही काम किया है। विश्व समुदाय में यह धारणा भी बनी है कि चीन संप्रभुता के मामले में एक अधिक संजीदा राष्ट्र है। इसका एक उदाहरण हांगकांग मामले में भी सामने आता है। वाशिंगटन के बयान पर चीन ने यह आपत्ति जताई थी कि यह उसका अंदरूनीमामला है। ऐसे समय में, जब एशिया कीभू-राजनीति बदल रही है (अमेरिका का जोर एशिया पिवट पर है और जापान अपनी रक्षा नीति में बदलाव ला रहा है), तब चीन इसी धारणा का इस्तेमाल अपने पक्ष में करना चाहेगा।इन सबके अलावा, दक्षिण चीन सागर के मसले पर ऊर्जा-स्रोत भी एक मुद्दा है। लेकिन यह इतना बड़ा मुद्दा नहीं कि इसे ध्यान में रखकर चीन कोई विवाद उठाए। इस क्षेत्र से तेलनिकाला जाए, इसी में सबकी भलाई है। दुनिया को आज अतिरिक्त ऊर्जा की जरूरत है और चीन यही चाहेगा कि इस काम में वह अन्य देशों का लाभ उठाए। होर्मुज से मलक्का की सी लेनस्ट्रैटजी चीन की देन है। तेल दोहनको लेकर इस क्षेत्र में चीन कई संधियां कर चुका है, जिसमें साझा अन्वेषण पर जोर है।प्रश्न यह है कि फिर चीन के साथ भारत के विवाद क्या हैं? सीमा विवाद तो है ही। लेकिन जाहिर है कि तेल खनन को लेकर वियतनाम के साथ भारत के हुए ताजा समझौते इसकी जड़ में नहीं हैं। वियतनाम ने जो पिछलाकॉन्ट्रैक्ट हमें दिया था, उससे कोई फायदा नहीं हुआ। यह साफ है कि दक्षिण चीन सागर में भारत की भी दिलचस्पी है, क्योंकि वह वहां अपनीमौजूदगी दिखाना और किसी एक शक्ति का दबदबा बनने से रोकना चाहता है। फिर उसे तेल की जरूरत है ही। इस बीचभारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अमेरिका के दौरे पर गए थे। उससे पहले वह जापान दौरे पर गए थे। अमेरिका विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, तो जापान एशिया की बड़ी अर्थव्यवस्था। हालांकि, चीन के मुकाबले भारत कम बड़ी शक्तिहै, लेकिन प्रधानमंत्री के ताजा दौरे से चीन पर किसी तरह का दबाव बना हो, तो उस बारे में विशेष कुछ कहा नहीं जा सकता।इसलिए चीन की ताजा प्रतिक्रिया को उसके स्वाभाविक रवैये से अधिक जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए और यहभी समझना होगा कि दक्षिण चीन सागर दरअसल एक विवादित क्षेत्र है, जहांअब तक कूटनीतिक समझ नहीं बन पाई है। इसलिए समय-समय पर इसे लेकर वातावरण में गरमी पैदा हो जाती हैं।

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