गुरुवार, 6 नवंबर 2014

जलवायु परिवर्तन और उसके प्रभाव

जलवायु परिवर्तन और उसके प्रभाव :-

ये अति संवेदनशील मुद्दे पर गंभीर लेख है 

जलवायु परिवर्तन के संबंध में आईपीसीसी का आकलन एशिया में पानी, खानपान और स्वास्थ्य से जुड़े जोखिम को रेखांकित करता है। 
जलवायु परिवर्तन पर अंतरसरकारी पैनल (आईपीसीसी) के दूसरे संस्करण की पांचवीं आकलन रिपोर्ट गत 31 मार्च को जारी की गई। इस संस्करण को 'प्रभाव, ग्राह्यता और अतिसंवेदनशीलता' का नाम दिया गया है। 

अगर हम राष्ट्रीय अथवा उप-राष्ट्रीय स्तर पर न भी जाएं तो भी उपमहाद्वीप के स्तर पर ही आकलन इस बात के महत्त्वपूर्ण प्रमाण मुहैया कराता है कि भारत इससे गहरे तक प्रभावित होने जा रहा है। कुछ प्रभाव तो जलापूर्ति और खाद्यान्न उत्पादन की पहले से ही गंभीर बन चुकी समस्याओं में और अधिक इजाफा कर देंगे। रिपोर्ट का अगला संस्करण विभिन्न प्रभाव क्षेत्रों में इसके प्रभाव को सीमित करने और ग्राह्यïता की नीतियों के बारे में केंद्रित होगा। लेकिन यह स्पष्टï है कि प्रत्येक देश को इनके बारे में व्यापक परिप्रेक्ष्य में विचार करना होगा।
रिपोर्ट के अध्याय 24 में एशिया पर पडऩे वाले प्रभाव का जिक्र है। अध्याय के अंत में उन प्रश्नों का उल्लेख है जो बार-बार पूछे जाते हैं। इनमें जल की उपलब्धता, खाद्य सुरक्षा और स्वास्थ्य से जुड़े सवाल शामिल हैं। यह आम धारणा है कि जलवायु परिवर्तन का बारिश के रुझान पर गहरा असर पड़ रहा है और भारत इस मोर्चे पर खासा संवेदनशील है। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि समूचा एशिया पानी को लेकर संकट में आ सकता है।
मोटे तौर पर यह संकट मांग के मोर्चे पर होगा क्योंकि आबादी बहुत तेजी से बढ़ रही है और भारत तथा दक्षिण एशिया के अन्य देशों का इसमें बहुत अधिक योगदान होने वाला है। लेकिन जल संसाधन की कमी भी इसकी एक वजह होगी। सतह पर मौजूद पानी बहुत तेजी से खत्म हो जाएगा जबकि भूजल के स्तर में भी कमी आएगी क्योंकि ग्लेशियर पिघलने से पानी की कमी पैदा होने लगेगी। ऐसे में बिजली सब्सिडी आदि की वजह से पानी का जो अत्यधिक इस्तेमाल हो रहा है वह उपरोक्त बातों से मिलकर एक ऐसे दुरूह चक्र का निर्माण करेगा जिससे निपटना मुश्किल होगा।
इसके विपरीत रिपोर्ट यह भी कहती है कि खाद्य सुरक्षा के मोर्चे पर जलवायु परिवर्तन के असर को लेकर अति आत्मविश्वास का माहौल बना हुआ है। इसका असर हर जगह एक समान नहीं होगा। मध्य एशिया के कुछ इलाकों में तापमान बढऩे के कारण खाद्यान्न उत्पादकता में सुधार होगा। लेकिन गंगा के मैदान समेत अन्य जगहों पर इसका असर नकारात्मक होगा। देश में खाद्यान्न उत्पादन में कमी का संकट समुद्री जलस्तर बढऩे से और विकराल होगा।
तटवर्ती क्षेत्रों को इससे बड़ा खतरा उत्पन्न होगा। बहरहाल, कृषि के मोर्चे पर बात करें तो समुद्री जलस्तर बढऩे से कृषि योग्य भूमि कम होगी क्योंकि लवणता का स्तर बढ़ेगा। संक्षेप में कहें तो बढ़ती आबादी और खपत के ठीक उलट दक्षिण एशिया में अन्न उत्पादन में कमी आएगी। खाद्य महंगाई पहले ही बढ़ी हुई है और उन हालात में यह हमारी अर्थव्यवस्था को स्थायी तौर पर प्रभावित करेगी।
जमीन की उपलब्धता और उत्पादकता पर पडऩे वाले प्रभाव के अलावा तटीय इलाकों के पर्यावास पर पडऩे वाला प्रभाव भी अच्छा खासा होगा। समुद्री खाद्य पदार्थ वहां के लोगों के लिए प्रोटीन का बड़ा जरिया हैं। इसकी उपलब्धता पर भी असर पड़ेगा क्योंकि यहां के तमाम समुद्री जीव जंतु अन्य स्थानों का रुख कर लेंगे। स्वास्थ्य के मोर्चे पर बात करें तो रिपोर्ट के मुताबिक मौजूदा जानकारी के आधार यह कहा जा सकता है कि स्वास्थ्य के मोर्चे पर भी हम बहुत गहरे तक प्रभावित होंगे।
गरम हवाओं अर्थात लू का प्रकोप और अधिक बढ़ जाएगा। शहरी आबादी इससे बहुत गहरे तक प्रभावित होगी।रिपोर्ट में यह चेतावनी भी जारी की गई है कि बांग्लादेश जैसे देश में हैजे का प्रकोप हो सकता है जो अनुकूल वातावरण मिलने पर बहुत तेजी से प्रसारित हो सकता है। हिमालय क्षेत्र में जापानी बुखार (जैपनीज इंसेफलाइटिस) का खतरा बढ़ जाएगा। एशिया के अन्य हिस्सों की बात करें तो उनमें भी जोखिम बढ़ेगा। खासतौर पर गर्मी के कारण होने वाली बीमारियों का जोखिम लगातार बढ़ता जाएगा।
कुलमिलाकर आईपीसीसी द्वारा किए गए इस अध्ययन को देखा जाए तो इस बात के प्रमाण हैं कि जोखिम बहुत अधिक है और कोई भी सरकार उनकी अनदेखी करने का खतरा नहीं मोल ले सकती है। लेकिन प्रभावी नीतियां तैयार करने के क्रम में यह बात महत्त्वपूर्ण है कि वह इन नीतियों को अल्प और दीर्घ अवधि की वृहद आर्थिक नीतियों और विकास संबंधी नीतियों के ढांचे में समाहित करे।
पांचवें आकलन का पहला संस्करण यह सुझाव देता है कि जिन घटनाओं के घटित होने का अनुमान लगाया गया है वे इस सदी के उत्तराद्र्घ में हमारे सामने मुखर होकर आएंगी। इनसे निपटने की महंगी नीतियों के क्रियान्वयन की बात की जाए तो यह आकलन उम्रदराज आबादी और युवा आबादी वाले मुल्कों के बीच भेद करता है। प्रभावी ढंग से देखा जाए तो भारत जैसे देशों के लिए विश्वसनीय विकल्प यही होगा कि वे खुद पर भरोसा करें। हालांकि यह स्पष्टï है कि इतने बड़े जोखिम से कोई देश अकेले नहीं निपट सकता लेकिन स्थानीय स्तर पर देश इसके असर को कम करने से संबंधित कदम उठाने के अलावा ग्राह्यता की दिशा में तो कदम बढ़ा ही सकते हैं।
संबंधित रिपोर्ट जोखिम के आकलन का संक्षिप्त ब्योरा पेश करती है जो ग्राह्यता के मौजूदा प्रयासों और आक्रामक प्रतिक्रियाओं पर आधारित है। इनमें से कुछ मोर्चों पर अतिरिक्त प्रयास करने से जोखिम में उल्लेखनीय कमी आ सकती है। अन्य की बात करें तो खासतौर पर कृषि उत्पादकता के मोर्चे पर ऐसे गहन प्रयास करने के बावजूद हमारे समक्ष जोखिम बरकरार रहेगा। यह जोखिम समय के साथ लगातार बढ़ता भी जाएगा। स्पष्ट है कि आर्थिक नीति से जुड़ी बहस और चर्चा में ये मुद्दे और प्रमुखता हासिल करते जाएंगे।

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